Friday, April 3, 2026
- Advertisement -

अमन के लिए आशनाई

Ravivani 34

भारती दीवान

पिछले कुछ सालों से हम अपने आसपास कुछ ऐसी भाषा, शब्द या घटना सुनते/देखते हैं जिसमें नफरत की बू आती है। तथाकथित हिंदुत्ववादियों ने आम लोगों के मन में मुस्लिमों के प्रति नफरत और द्वेष की भावना पैदा कर दी है। ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं, जैसे मेरी पड़ोसन जो कहती हैं कि ‘मैं अपने बेटे को सेंट जेवियर्स स्कूल से निकालूंगी, वहां मुस्लिम बच्चों की संख्या बढ़ रही है।’ मेरी पहचान की महिला का कहना है कि ‘मैं ऊपर के रास्ते पर नहीं जाती, वहां काले कपड़े वाली (बुर्का) रहती हैं, मुझे उनसे डर लगता है।’ बिल्डिंग की एक रहवासी के मुताबिक, ‘दूध की दुकान में मुस्लिम लड़का बहुत ही गंदा है, उससे कुछ बोलने में डर लगता है, रात में कुछ कर दिया तो!’

घर किराये पर देना है तो पहली शर्त मुस्लिम को नहीं देना होती है। लव-जिहाद, गौमांस, बुर्का, हिजाब किसी भी नाम से देश भर में मुस्लिम द्वेष स्पष्ट दिखाई दे रहा है। हम सभी को, जो थोड़े भी संवेदनशील हैं, इन घटनाओं से पीड़ा होती है, मन विचलित होता है। हम तर्क सहित कोई भी बात इन कट्टरपंथियों से नहीं कर सकते, क्योंकि इतना धैर्य और तर्क इनके पास नहीं है। सवाल उठता है कि ऐसे माहौल में हम क्या कर सकते हैं?

नफरत के इस दौर में हमारी एक मित्र मेधा कुलकर्णी ने पास की एक मुस्लिम बहुल बस्ती ‘पठानवाड़ी’ में जाना शुरू किया है। कभी सैर के बहाने, कभी सब्जी लेने के लिए, कभी कुछ और काम से वहां के लोगों से पहचान बनाना शुरू की है। पहले तो स्थानीय लोगों में थोड़ी झिझक हुई, लेकिन जल्दी ही लोग सहजता से बात करने लगे। मेधा ने हम कुछ मित्रों को ‘पठानवाड़ी’ के बारे में जानकारी दी और तय हुआ कि ईद के दिन ‘ईद मुबारक’ कहने और पहचान बनाने के लिए हमें मस्जिद में जाना चाहिए। हम कुछ महिला-पुरुष मित्र ‘नूरानी मस्जिद’ पहुंचे और वहां के मुस्लिम भाइयों को ईद मुबारक कहा। उन्होंने बहुत ही उत्साह से हमारा स्वागत किया और हमें मस्जिद के अंदर ले गए। अंदर से मस्जिद कैसी है, यह हमें पहली बार देखने मिला। हम सभी के लिए यह अनोखा अनुभव था। अब हमारा ‘पठानवाड़ी’ के लोगों के साथ दोस्ती का सिलसिला शुरू हुआ।

आपसी समझ बनाने और देश भर के अनुभवों को साझा करने के उद्देश्य से हम मिलते रहे। हमारे एक युवा साथी ने स्कूल के ग्रीष्म-कालीन शिविर में बच्चों के साथ खेल व अन्य मजेदार गतिविधियां शुरू कीं। हमारी दोस्ती ने वहां के लोगों के मन में हमारे प्रति विश्वास बनाया। तय हुआ कि बकरीद के उपलक्ष्य में हम ऐसा ‘ईद मिलन’ कार्यक्रम रखते हैं, जिसमें सभी धर्मों के लोग शामिल हों। 15 जून को ईद मिलन के उपलक्ष में हम साथ आए और हमारे बीच दोस्ती की शुरूआत हुई। इस कार्यक्रम में तकरीबन सौ लोग शामिल हुए।

हम मानते थे कि प्रगतिशील महाराष्ट्र राज्य में हिंदू-मुस्लिम द्वेष हो ही नहीं सकता। यहां संतों की परंपरा रही है, प्रगतिशील साहित्यकार, कलाकर, सामाजिक कार्यकर्ताओं का जमघट रहा है, स्त्री मुक्ति आंदोलन की अगुवाई रही है। यहां नफरत कैसे हो सकती है? यह द्वेष सिर्फ उत्तर-भारत के राज्यों में ही दिखाई/सुनाई देता है, लेकिन हम गलत थे। छोटी-बड़ी घटनाओं और आसपास की टिप्पणियों से इस जहर की व्यापकता का अहसास होता है। ऐसा ही एक उदाहरण महाराष्ट्र के अहिल्यानगर (अहमदनगर) जिले के गुहा गांव ( तहसील राहुरी) का है, जहां की कुल जनसंख्या पांच हजार है जिनमें 120 परिवार मुसलमानों के हैं। गुहा गांव में पिछले दो साल से वातावरण तनावपूर्ण है, कारण है सदियों पुरानी दरगाह। यह दरगाह रमजान बाबा शाह माही की है। इस दरगाह को 1857 में अंग्रेजों ने मंजूरी दी थी। जहां हर त्यौहार मिल-जुलकर मनाये जाते थे वहां अब मंदिर-दरगाह को लेकर द्वेष का माहौल है। इस मुद्दे को लेकर दोनों धर्मों के कट्टरपंथियों ने स्थानीय लोगों को भड़काया है।

नतीजे में दोनों धर्म के लोगों में पिछले दो साल से तनाव का वातावरण है। इस विवाद के चलते मुस्लिम समाज का आर्थिक/सामाजिक बहिष्कार किया गया है। मोची उनके जूते नहीं सिल सकते, नाई उनके बाल नहीं काट सकते, अगर काटें तो दो हजार रुपए जुर्माना देना पड़ता है। मुस्लिम परिवार अपनी ही जमीन में खेती नहीं कर सकते। पिछले कुछ सालों से इस तरह की तमाम छोटी-बड़ी घटनाएं महाराष्ट्र के अलग-अलग इलाकों से सुनाई दे रही हैं। संवेदनशील लोग चिंतित हैं, उनके मन में सवाल है-‘हमारा महाराष्ट्र तो ऐसा नहीं था?’कहीं-कहीं इस साम्प्रदायिक घटाटोप से निपटने की कोशिशें भी शुरू हुई हैं। महाराष्ट्र के अलग-अलग शहरों में धार्मिक भाईचारा बनाने की छोटी-बड़ी कोशिशों में पूना का ‘सलोखा’ नामक समूह है जो मुस्लिमों की मदद करता है।

आज हमारे देश के मूल सवाल क्या हैं? बेरोजगारी, मंहगाई, गरीबी, महिलाओं की असुरक्षा, बिगड़ती हुई शिक्षण व्यवस्था, स्वास्थ्य व्यवस्था और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सवाल। आम जनता का ध्यान देश के इन सवालों से हटाने का सबसे आसान तरीका है – हिंदू-मुस्लिम द्वेष बनाये रखना। हमारी और हमारे जैसे लोगों की जिम्मेदारी है कि इन तनावों से परे जाकर मूल सवालों पर काम करें।

janwani address 206
spot_imgspot_img

Subscribe

Related articles

उत्पाती होते बच्चों की मानसिकता

उषा जैन ‘शीरीं’ बच्चों का अधिकतम समय शिक्षा ग्रहण करते...

नफरत किस से करू…कैसे करूं?

क्या जमाना आ गया है, जहां कभी फोटो खिंचवाने...

क्या ममता करेंगी फिर से धमाल?

अब जब चुनाव की तारीखें घोषित हो चुकी हैं...

ईरान के मामले में चूक गए ट्रंप

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने जॉर्ज विल्हेम फ्रेडरिक हेगेल के...

Raza Murad: रजा मुराद ने मां को याद कर लिखा भावुक संदेश, कहा- ‘सबसे बड़ा आशीर्वाद’

नमस्कार, दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत...
spot_imgspot_img