Tuesday, April 28, 2026
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महंगाई से लोहे के कारोबार में लगा जंग

  • पांच साल में दाम आसमान में पहुंचने से सेल रही आधी
  • प्रतिदिन 500 टन का कारोबार घटकर रह गया मुश्किल से 150 टन

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: महंगाई की मार से लोहे के कारोबारियों को भी नहीं बख्शा। आसमान छू रहे रेटों की वजह से लोहे के कारोबार को जंग लग गया है। कारोबारियों का कहना है कि बाजार में काम नहीं के बराबर है। पिछले पांच सालों में निर्माण में काम आने वाले जिन अन्य सामानों पर महंगाई की मार पड़ी है।

उनमें लोहा सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। जो सरिया आज 58 से 60 रुपये तक बिक रहा है। वह पांच साल पहले करीब 36 से 38 रुपये के भाव आसानी से बेहद उच्च क्वालिटी का मिल जाता था। हालांकि यदि काम, की बात की जाए तो काम में डाउन भी पांच छह साल से ही आया है। इसके एक नहीं बल्कि कई कारण है।

सरकारी फैसले जिम्मेदार

लोहे के कारोबार को जंग का एक बड़ा कारण कुछ कारोबारी सरकारी फैसलों को बड़ा जिम्मेदार मानते हैं। सदर बाजार के एक बडे लोहा कारोबारी जो भाजपा के नेताओं में शुमार किए जाते हैं, नाम न छापे जाने की शर्त पर बताते हैं कि नोट बंदी के सरकार के फैसले के साइड इफेक्ट जिन कारोबार पर पडे हैं।

उनमें लोहा सरिया का कारोबार भी शामिल है। कई अन्य भी ऐसे फैसले लिए गए जिनसे रियल स्टेट का कारोबार प्रभावित हुआ तो लोहे व सीमेंट का कारोबार भी बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। रियल स्टेट की बात करें या फिर स्थानीय स्तर पर जितने भी निर्माण संबंधी काम होते हैं उनकी बात की जाए।

बगैर किसी लाग लपेट के वो कहते हैं कि सोसायटी में ऐसे लोगों की संख्या बड़ी है जो मकान को अब पहली जरूरत नहीं समझते हैं या जिनके पास मकान हैं उसमें काम छिड़वाना जरूरी नहीं समझते हैं। अब पहली चिंता लोगों के लिए परिवार का पालन पोषण व बच्चों के विवाह शादी हैं।

जो हालत कारोबार की है केवल मेरठ ही नहीं बल्कि पूरे देश में यही हाल है उसके चलते अब मकान निर्माण व नया मकान खरीदना प्राथमिकता में नहीं रह गया है। अब हालत यह है कि गुजारा करना मुश्किल हो रहा है। इस तमाम बातों का असर बाजार पर पड़ता है। बेहद जरूरी होने पर ही लोग मकान दुकान में चिनाई के काम छेड़ते हैं।

बडे प्रोजेक्ट से मदद नहीं

शहर में तमाम बडे प्रोजेक्ट चल रहे हैं, लेकिन इनसे कोई मदद स्थानीय लोहा कारोबारियों को नहीं मिल रही है। जितने भी सरकारी प्रोजेक्ट चल रहे हैं, उनको बनाने वाली कंपनियां टाटा का माल यूज करती हैं और सीधे फैक्ट्री से माल मंगाती हैं। मेरठ में करीब 100 कारोबारी छोटे बडे मिलाकर हैं उनके यहां से इनका माल नहीं जाता।

बडे कॉलोनाइजर फैक्ट्री से उठाते हैं माल

शहर और आसपास बनने वाली बड़ी कालोनियों की यदि बात की जाए तो इनको बनाने वाले बिल्डर भी सीधे फैक्ट्री से माल उठाते हैं। सीधे फैक्ट्री से माल उठाने पर लोकल बाजार के अनुपात में रेट कम लगते हैं। केवल लोहा या सरिया ही नहीं बल्कि सीमेंट सरीखे तमाम माल कालोनियां बनाने वाले तमाम बडे बिल्डर्स फैक्ट्रियों से ही माल उठाते हैं।

सरकार राहत दे

कंसल स्टील के मालिक विनोद कंसल का कहना है कि लोहा व स्टील कारोबारियों को सरकार को राहत देनी चाहिए। जहां तक कारोबारी स्थिति है पहले के मुकाबले काम आधा रह गया है। यदि इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो सरिया कारोबारी बर्बाद हो जाएंगे। दरअसल अन्य चीजों की महंगाई का असर भी इस कारोबार पर बुरा पड़ रहा है।

स्थानीय प्रोजेक्ट भी बंद

लोहे के कारोबार पर महंगाई के जंग के अलावा स्थानीय बिल्डरों के जो प्रोजेक्ट बंद होने से भी बुरा असर पड़ा है। करीब पांच से छह साल पहले की यदि बात की जाए तो दर्जनों निर्माण के प्रोजेक्ट चल रहे थे, जैसे-जैसे मेटिरियल के दामों में उछाल आया और रियल स्टेट के काम पर असर पड़ना शुरू हुआ तो इसका असर भी सरिया लोहे के काम पर पड़ गया। मुजफ्फरनगर स्थित लोहे के जितने भी फैक्ट्रियां हैं, उनमें से कई बड़ी इकाइयां की भट्ठियां ठंडी हो गयी हैं।

ये कहना है अजय गुप्ता का

संयुक्त व्यापार संघ के अध्यक्ष अजय गुप्ता का कहना है कि लॉकडाउन के दौरान तमाम मेन्यूफेक्चरिंग इकाइयां बंद रहीं। इसका भी बड़ा असर लोहा व सरिये के दामों पर पड़ रहा है। सरिये के रेट का बढ़ाना चिंताजनक है। क्योंकि इससे आम आदमी भी प्रभावित होता है। छोटे-मोटे निर्माण कार्य रुक गए हैं।

ये कहना है नवीन गुप्ता का

संयुक्त व्यापार संघ के अध्यक्ष नवीन गुप्ता का कहना है कि कोरोना तो अब आया है, लेकिन जहां तक कारोबारी मंदी की बात है तो वह तो पहले से है। सरकार कुछ ऐसी नीति बनाए ताकि कारोबारियों को मदद मिल सके। लोहा या सरिया ऐसी आइटम है जो तमाम जगह प्रयोग होता है।

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