जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में आज एक ऐतिहासिक बहस की शुरुआत हुई। बहस का केंद्र यह सवाल है: क्या राष्ट्रपति और राज्यपालों पर किसी विधेयक (बिल) को मंजूरी देने के लिए समयसीमा तय की जा सकती है या नहीं?
यह सवाल खुद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से पूछा है। लेकिन तमिलनाडु और केरल जैसे विपक्ष-शासित राज्य इस कदम को चुनौती दे रहे हैं और इसे “सरकार की मंशा” बता रहे हैं, न कि राष्ट्रपति की।
मामले की पृष्ठभूमि
अप्रैल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था, जिसमें कहा गया था कि राज्यपालों को मंत्रिपरिषद की सलाह माननी ही होगी। बिल रोकने का अधिकार नहीं है। राष्ट्रपति को भी 3 महीने में फैसला करना होगा।
इसके बाद राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से कुल 14 सवाल पूछे — इनमें प्रमुख यह है कि क्या कोर्ट समयसीमा तय कर सकती है?
सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया?
मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अनुपस्थिति में जस्टिस बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने कहा “जब खुद राष्ट्रपति ने राय मांगी है, तो इसमें आपत्ति क्यों?”
कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यह सुनवाई सलाहकार प्रकृति की है, कोई अंतिम निर्णय नहीं।
राज्यों की आपत्ति क्या है?
केरल (वरिष्ठ अधिवक्ता के.के. वेणुगोपाल) सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस मुद्दे पर फैसला दे चुका है। नया संदर्भ (reference) पुराने फैसले को फिर से खोलने की कोशिश है। राष्ट्रपति असल में केंद्र की सलाह पर चलती हैं, यह केंद्र सरकार की मंशा है।
तमिलनाडु (वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी) “यह पुराने फैसले के खिलाफ एक छिपी हुई अपील है। इसे खूबसूरती से पेश किया गया है, लेकिन यह सुप्रीम कोर्ट की अखंडता को प्रभावित कर सकता है।”
केंद्र सरकार का पक्ष
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने कहा यह रेफरेंस पूरी तरह वैध है। यह जानना जरूरी है कि क्या अदालत एक संवैधानिक पदाधिकारी (राष्ट्रपति/राज्यपाल) पर समयसीमा थोप सकती है।
क्या कहा जजों ने?
जस्टिस नरसिम्हा: “न्यायिक फैसला और सलाह अलग प्रकृति के होते हैं।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पूछा, “क्या ऐसा कोई उदाहरण है जहां डिवीजन बेंच के फैसले के बाद राष्ट्रपति ने रेफरेंस नहीं भेजा हो?”
क्यों है यह मामला बेहद अहम?
अगर कोर्ट तय करता है कि राष्ट्रपति या राज्यपाल को निर्धारित समय में फैसला करना होगा, तो इसका असर पूरे देश के कानून बनाने की प्रक्रिया पर पड़ेगा।
राज्यों का दावा है कि इससे राज्यपालों के जरिए बिल अटकाने की केंद्र की रणनीति को कोर्ट से वैधता मिल सकती है।
आगे क्या?
अदालत फिलहाल यह तय कर रही है कि क्या राष्ट्रपति का यह रेफरेंस स्वीकार किया जाए या नहीं। इसके बाद ही मुख्य बहस पर सुनवाई आगे बढ़ेगी।

