Saturday, March 28, 2026
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राहुल गांधी बन रहे नई उम्मीद?

दुनिया भर में परंपरागत पार्टियों, पार्टियों के सांगठनिक ढांचों, उनके उनके विचारों-एजेंडों को किनारे लगाकर ऐसे नेता या नायक सामने आ रहे हैं, जो लोगों के सामने खुद को ऐसे प्रस्तुत करते हैं कि उनके पास ही उनकी समस्याओं का समाधान है। वे उनकी उन सभी समस्याओं का समाधान कर सकते हैं, जिनका समाधान कई दशकों में नहीं हुआ। 2013 में ऐसे ही नेता के रूप में नरेंद्र मोदी सामने आए थे। उनके छोटे और बदले रूप में अरविंद केजरीवाल सामने आए थे। जिन्होंने खुद को ऐसे प्रस्तुत किया था कि उनके पास आजादी के बाद की उन सभी समस्याओं का समाधान है, जिनका समाधान कोई अन्य राजनीतिक दल और नेता नहीं कर पाए। इसमें खुद उनकी पार्टी (नरेंद्र मोदी के संदर्भ में भाजपा) भी शामिल है। अरविंद केजरीवाल की पार्टी तो बिल्कुल ही नई थी। 2013 में नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री पद के दावेदार बने, उसके पहले भारतीय जनता हर तरह के विचारों, एजेंडों और नीतियों वाली पार्टियों को आजमा चुकी थी। हर रूप-रंग की पार्टी और नेता केंद्र और राज्यों में सत्ता में आज चुके थे। लोग इन पार्टियों को देख चुके थे। नरेंद्र मोदी ने खुद को ऐसे प्रस्तुत किया, वे आज तक के अन्य नेताओं से बिल्कुल भिन्न हैं, वे राजनीति से हर तरह की गंदगी दूर कर देंगे। हर तरह का भ्रष्टाचार-कदाचार खत्म कर देंगे। लोगों की बुनियादी समस्याओं का समाधान चुटकी बजाते कर देंगे।

नरेंद्र मोदी ने जो सपने दिखाए थे, जो वादे किए थे, उसमें देश के करीब सभी लोगों के समस्याओं का समाधान हो जाना तय सा है, ऐसा देश के एक बड़े हिस्से को लग रहा था। नरेंद्र मोदी ने खुद को एक जादूगर के रूप में प्रस्तुत किया। जिसके पास हर समस्या का समाधान है, जो देश और जनता के हर संकट को हल कर सकता है। उन्होंने गुजरात को एक मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया, जहां हर समस्या का समाधान हो चुका है। यह भले ही झूठा रहा हो, लेकिन लोगों ने मान लिया। उन्होंने अब तक की हर पार्टी और नेता को बेकार कहा, जो किसी काम के नहीं थे। उन्होंने खुद को ऐसे प्रस्तुत किया जैसे उनके पास एक जादू की छड़ी है, जिसे घुमाते ही हर समस्या का समाधान हो जाएगा। जनता के बड़े हिस्से ने उनकी बात मान भी लिया।

नरेंद्र मोदी अपने दो तरह के वादों में ही सिर्फ सफल रहे-पहला सिर्फ हिंदू के रूप में सोचने वाले और मुस्लिम घृणा से प्रेरित लोगों को बाबरी मस्जिद की जगह रामजन्मभूमि दे दिया। कश्मीर से धारा 370 हटा दिया। इसके साथ ही उन्होंने द्विज-सवर्ण मतदाताओं के एक बड़े हिस्से को यह संतुष्टि दी कि फिलहाल उनकी वर्ण-जातिवादी वर्चस्व की स्थिति को नरेंद्र मोदी ने पिछले 11 सालों में मजबूत बनाया है। लेकिन देश का बड़ा हिस्सा सिर्फ रामजन्मभूमि और धारा 370 को हटाने या मुसलमानों को सबक सिखाने के लिए उनके साथ नहीं खड़ा हुआ था। उसे अपनी बुनियादी समस्याओं का भी समाधान चाहिए था। देश की बुनियादी समस्याओं का भी समाधान चाहिए था। कमोबेश उनकी ही भाषा, थोड़े बदले टोन और तेवर में केजरीवाल बोलते थे। दोनों की जितनी सांगठनिक ताकत थी, उसके हिसाब से लोगों ने उन्हें गले भी लगाया। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के 6 महीने के भीतर ही दिल्ली के लोगों ने नरेंद्र मोदी को बुरी तरह हराकर दिल्ली प्रदेश की सत्ता केजरीवाल को सौंप दी। जैसे-जैसे समय बीतता गया, इन दोनों जादूगरों का जादू का तिलिस्म टूटता गया या टूटता जा रहा है। केजरीवाल दिल्ली की सत्ता से बाहर हो गए, जिन्हें लगता था कि दिल्ली तो हमेशा के लिए उनकी हो ही गई है।

नरेंद्र मोदी सुबह के उगते सूरज और दोपहर को पूरे ताप के साथ चढ़ते सूरज की आभा 2024 के चुनावों में ही खो चुके हैं। वोटों की चोरी, चुनाव आयोग के मनमाने इस्तेमाल, वोटों और नेताओं को खरीदने के लिए पैसे के अकूत इस्तेमाल, कारपोरेट की उनके लिए खुली तिजोरी और कारपोरेट मीडिया के उनके चरण वंदन और आरएसएस की सारी सांगठनिक ताकत के बाद भी। भारत का दक्षिणपंथी कोर वोटर आज भी उनके साथ है। जिसकी कोई विशेष आर्थिक-सामाजिक बुनियादी समस्या नहीं है। उसे अपना विभिन्न तरह का ऐतिहासिक वर्चस्व कायम रखना है, जिसमें नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी उनके लिए सबसे मुफीद है। लेकिन यह वोटरों के 20-25 प्रतिशत से किसी हालात में ज्यादा नहीं है। जिन 15-20 प्रतिशत वोटरों ने नई उम्मीद, नए सपने, नए भारत और अपनी बुनियादी समस्याओं के समाधान के लिए नरेंद्र मोदी को वोट दिया था। वे अब नरेंद्र मोदी से उम्मीद खो चुके हैं।

राहुल गांधी अपनी तेजी से स्वीकृति बना रहे हैं। वे उन लोगों के लिए एक वैकल्पिक नेता बन गए हैं, जो हर हालात में नरेंद्र मोदी और उनके चट्टे-बट्टों से राजनीतिक मुक्ति चाहते हैं। उन्हें सत्ता से बेदखल करना चाहते हैं। इस मामले में राहुल गांधी अकेले नहीं हैं, उनके संगी-साथी के रूप में अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, एमके स्टालिन जैसे क्षेत्रीय ताकतवर नेता भी हैं। अखिलेश, तेजस्वी, स्टालिन नए सिरे से नई राजनीतिक पहचान के साथ सामने आ रहे हैं। अखिलेश और तेजस्वी अपने पिताओं की छाया से निकलकर खुद को मजबूत नेता के रूप में स्थापित कर चुके हैं। स्टालिन भी करुणानिधि की विरासत के दम पर सिर्फ नहीं बल्कि अपने दम पर राजनीति में दबदबा कायम किए हुए हैं। ममता बनर्जी की पकड़ बंगाल में ढीली पड़ती हुई नहीं दिखाई दे रही है। उद्धव ठाकरे भले ही चुनावी राजनीति में तात्कालिक तौर पर पराजित हुए हैं, लेकिन उनकी एक मजबूत जमीन और अपील बनी हुई है।

राहुल गांधी संविधान, लोकतंत्र, वोट के अधिकार, संवैधानिक संस्थाओं के बचाव, आरक्षण, जाति-जनगणना, आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी और साहस, हिम्मत, रिस्क लेने की क्षमता, हर स्तर पर नरेंद्र मोदी से टकराने की कूवत, जनता के बीच उपस्थिति के मामले में अपनी निरंतरता, लोगों के स्वत: स्फूर्त समर्थन आदि के चलते एक ऐसे नेता या नायक के रूप में सामने आ रहे हैं, जिसको देखकर भारत के एक बड़े हिस्से को अब यह लगने लगा है कि यह इंसान मोदी को टक्कर दे रहा है, यह मोदी को अपदस्थ कर सकता है।

राहुल गांधी की तेजी से जन स्वीकृति बढ़ रही है, जब समय आता है, तो हर दांव सीधा पड़ता है। राहुल गांधी के हर दांव से उनकी स्वीकार्यता बढ़ रही है। संविधान बचाओ के बाद वोट चोरी विरोधी उनके अभियान ने देश भर में उन्हें एक बड़े पैमाने की स्वीकृति प्रदान की है। संसद में उनके नेतृत्व में मोदी और उनके लोगों को बार-बार मुंह की खानी पड़ रही है। नरेंद्र मोदी का हर दांव अब उलटा पड़ रहा है। देश और वैश्विक स्तर दोनों पर। कभी वैश्विक नेता और विश्व गुरु की छवि बना रहे नरेंद्र मोदी वैश्विक स्तर पर भी बिजूका साबित हो चुके हैं। सारे मोदी विरोधी बुद्धिजीवियों को किनारे लगाकर लोगों ने नरेंद्र मोदी को अपने सपनों के राजकुमार के रूप में चुना था। यही चीज अब राहुल गांधी के संदर्भ में भी हो रही है। राहुल गांधी के रूप में एक नए सूरज का उदय हो रहा है। किसी को पसंद हो या न हो।

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