
भारतीय लोकतंत्र की सबसे अहम कसौटियों में से एक है राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव। यह चुनाव केवल संवैधानिक औपचारिकता नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश देने का बड़ा मंच भी बन जाता है। साल 2025 में हुए उपराष्ट्रपति चुनाव ने इस तथ्य को और भी मजबूती से सामने रखा कि किस प्रकार संसद के भीतर की राजनीति, गठबंधनों का गणित और अदृश्य समझौते भारतीय लोकतांत्रिक संरचना को दिशा देते हैं। इस चुनाव में सत्तारूढ़ एनडीए के उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन ने विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक के उम्मीदवार को बड़े अंतर से हराया। परिणाम ने यह स्पष्ट कर दिया कि संख्याबल के लिहाज से एनडीए पहले से ही मजबूत स्थिति में है, लेकिन साथ ही यह भी सामने आया कि विपक्ष की एकजुटता अपनी पूरी ताकत के साथ मैदान में मौजूद थी।
चुनाव के दौरान कुल 788 सांसदों के पास मतदान का अधिकार था। इनमें लोकसभा के 543 और राज्यसभा के 245 सांसद शामिल थे। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार इस बार 767 सांसदों ने मतदान किया, जबकि कुछ सांसद अनुपस्थित रहे। परिणामों के अनुसार एनडीए उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन को 452 वोट मिले। वहीं विपक्षी उम्मीदवार को 300 वोट प्राप्त हुए। इस प्रकार राधाकृष्णन को भारी बहुमत से जीत मिली और वे भारत के 15वें उपराष्ट्रपति निर्वाचित हो गए। मतदान के दौरान 15 वोट अवैध घोषित किए गए। अगर शुद्ध संख्याओं का विश्लेषण करें तो यह साफ दिखता है कि विपक्ष ने अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया क्योंकि उसे 300 वोट मिले, जो उनकी वास्तविक गणना के लगभग बराबर थे। दूसरी ओर एनडीए के पक्ष में भी अप्रत्याशित स्थिति बनी क्योंकि उन्हें 14 अतिरिक्त वोट मिले।
एनडीए का मूल आंकड़ा 438 का था, लेकिन परिणाम में 452 वोट मिले। यह बताता है कि कुछ स्वतंत्र सांसदों और संभवत: विपक्ष की कुछ छोटी पार्टियों के विधायकों ने क्रॉस-वोटिंग की और सत्ता पक्ष का साथ दिया। इस परिणाम से यह भी साफ हुआ कि भले ही विपक्ष एकजुट होकर मैदान में उतरा हो, लेकिन संसद के भीतर अभी भी एनडीए का दबदबा कायम है। विपक्ष ने दावा किया था कि इस बार सभी दल मिलकर एकजुट ताकत पेश करेंगे और सत्ता पक्ष को कड़ी टक्कर देंगे। निस्संदेह विपक्षी एकता ने मुकाबला दिलचस्प बनाया और चुनाव को औपचारिकता से आगे बढ़ाकर वास्तविक प्रतिस्पर्धा में बदल दिया, लेकिन अंतत: सत्ता पक्ष की संख्यात्मक बढ़त ने ही निर्णायक भूमिका निभाई।
विपक्ष को इस बात का श्रेय दिया जा सकता है कि उसने राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों चुनावों में एकजुटता दिखाई। यह पहली बार था जब इतने बड़े पैमाने पर विपक्षी दल एक मंच पर आए और एक ही उम्मीदवार को समर्थन दिया। कांग्रेस, टीएमसी, समाजवादी पार्टी, राजद, डीएमके, लेफ्ट पार्टियां और अन्य दलों ने मिलकर वोटिग के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की। लेकिन विपक्ष के सामने सबसे बड़ी समस्या यही रही कि संसद के भीतर उनकी संख्या कम थी। लोकसभा में भाजपा के पास पूर्ण बहुमत है और राज्यसभा में भी उसका संख्याबल पिछले वर्षों में लगातार बढ़ा है। ऐसे में विपक्ष भले ही राजनीतिक संदेश देने में सफल रहा हो, लेकिन चुनावी परिणाम को पलटना उसके बस में नहीं था।
चुनाव का एक और अहम पहलू यह रहा कि इसने यह साबित कर दिया कि भारतीय राजनीति में विपक्ष अभी भी जनता के सामने खुद को सशक्त विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने की जद्दोजहद में है। यदि विपक्ष को वास्तविक चुनौती पेश करनी है तो उसे केवल एकजुटता दिखाने से आगे बढ़कर संसद के भीतर भी संख्या जुटानी होगी। दूसरी तरफ सत्ता पक्ष ने यह चुनाव जीतकर यह संदेश दिया कि अभी उसकी पकड़ मजबूत है और विपक्ष को लंबे संघर्ष के लिए तैयार रहना होगा। उपराष्ट्रपति चुनाव का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि उपराष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति होते हैं। इस लिहाज से यह पद केवल औपचारिक नहीं बल्कि संसदीय राजनीति के लिए बेहद अहम होता है। राज्यसभा में विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण है और वहां सभापति की निष्पक्षता अक्सर चर्चा का विषय रहती है। ऐसे में सी. पी. राधाकृष्णन की कार्यशैली आने वाले समय में केंद्र बिंदु बनेगी। क्या वे विपक्ष की आवाज को समान महत्व देंगे या फिर सत्ता पक्ष के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाले बनकर उभरेंगे, यह देखना दिलचस्प होगा।
कुल मिलाकर, उपराष्ट्रपति चुनाव 2025 भारतीय राजनीति के उस सच को उजागर करता है जिसमें संख्याबल और रणनीति का संतुलन ही जीत का रास्ता बनाता है। विपक्ष ने अपनी एकजुटता से यह दिखा दिया कि वह अभी भी प्रासंगिक है, लेकिन सत्ता पक्ष ने यह साबित कर दिया कि संसद के भीतर उसकी ताकत अडिग है। 452 बनाम 300 का यह परिणाम केवल अंकगणित नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र की वर्तमान दिशा का आईना है।

