दीप भट्ट
असरानी के जाने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा हुई शोले में निभाई उनकी जेलर की भूमिका की। जिसमें उनका एक डॉयलाग था-हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं और एक अजीब सी हंसी। यह उनके सिनेमाई सफर का उत्कर्ष नहीं बल्कि अपकर्ष था। इसके बाद वे धीरे-धीरे एक खास तरह की कॉमडी में टाइपकास्ट हो गए। जबकि असलियत यह है कि वे एक सतरंगी कलाकार थे।
उनकी शख्सियत को शोले के इस डॉयलाग से मापना उनके साथ एक बेइंसाफी की तरह है। वे एफटीआईआई से अभिनय में स्नातक थे और फिल्म इंडस्ट्री में आकर अभिनय में जितने प्रयोग उन्होंने किए वह बहुत कम अभिनेताओं ने किए हैं। वे मैथड एक्टिंग पर यकीन करते थे और मैथड एक्टिंग के उस्ताद सोवियत संघ के स्तानिस्लावस्की से बेहद प्रभावित थे। उन्होंने स्तानिस्लावस्की से बहुत कुछ सीखा और हिन्दी सिनेमा में योगदान दिया। उनके अभिनय के अलग-अलग रंग देखने हों तो आपको हृषिकेश मुखर्जी की तमाम फिल्में देखनी पड़ेंगी। और जब आप इन फिल्मों को देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि वास्तव में असरानी कितने महान और वर्सटाइल कलाकार थे।
उन्होंने महान फिल्मकार हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म-गुड्डी के एक छोटे से रोल से अपना सिनेमाई सफर शुरू किया। इस छोटे से रोल के जरिए उन्होेंने फिल्म जगत को बता दिया कि वे कितनी बड़ी रेंज के अदाकार हैं। ऋषि दा की ही फिल्म अभिमान को भला कौन भुला सकता है जिसमें उन्होंने अमिताभ बच्चन जो फिल्म में एक सिंगर की भूमिका निभा रहे थे उनके पीआरओ या निजी सचिव चंद्रू की भूमिका में कितने कमाल की स्वाभाविक अदाकारी पेश की थी। हृषि दा की ही फिल्म बावर्ची में एक बंगाली भद्र परिवार के एक ऐसे नौजवान बब्बू की भूमिका जो संगीतकार बनने की हसरत रखता है में भी उन्होंने कमाल की अदाकारी की थी। फिल्म में राजेश खन्ना के साथ उनके कई आमने-सामने के सीन थे। एक दृश्य में जब वे राजेश खन्ना यानी रघु से कोई सैड मूड का गीत सुनाने की फरमाइश करते हैं तो काका फौरन उन्हें जब एक गीत सुनाते हैं तो उनका स्वाभाविक अंदाज में कहा गया यह डॉयलाग-यार तुम बिल्कुल हसरत जयपुरी की तरह लगते हो दर्शकों को गुदगुदाता है और चमत्कृत भी करता है।
इसी तरह हृषिदा की ही फिल्म-नमक हराम में काका के साथ एक होली के गीत-नदिया से दरिया दरिया से सागर, सागर से गहरा जाम में भांग की मस्ती में चूर एक व्यक्ति की भाव-भंगिमाओं को उन्होंने जिस अद्भुत ढंग से व्यक्त किया है वह देखने लायक है। हृषिदा की चुपके-चुपके में भी उन्होंने कमाल की अदाकारी की थी। गुलजार की मेरे अपने में भी उन्होंने अद्भुत अभिनय किया था। ये वो फिल्में हैं जिनमें हृषिदा उस असली असरानी को उसके अंतर से बाहर निकालकर लाए हैं जहां उनका अभिनय खिल उठता है। वे कहीं से भी अभिनय करते नजर नहीं आते। लगता है जैसे सब कुछ स्वाभाविक सा चल रहा है।
हृषिदा के अलावा उन्होंने बासु चटर्जी की फिल्म-छोटी सी बात में नागेश के रूप में एक ऐसे नौजवान प्रेमी की भूमिका निभाई थी जो फिल्म की नायिका विद्या सिन्हा के लिए बेहद बेचैन है और उसे किसी भी कीमत पर पा लेना चाहता है। उनके सामने अमोल पालेकर जैसे मंझे हुए अभिनेता थे। पर एक भी दृश्य ऐसा नहीं है जहां असरानी कमतर साबित हुए हों।
रमेश सिप्पी ने जब असरानी को शोले फिल्म के जेलर की भूमिका के लिए कास्ट किया था तो उन्हें बताया था कि जेलर को हिटलर से प्रेरणा लेकर इस भूमिका को करना है। इसके लिए असरानी को हिटलर की स्पीच सुनाई गई और उसकी स्पीच के अलग-अलग दृश्य दिखाए गए। असरानी ने हिटलर की युवाओं को आकर्षित करने के लिए बोलने की एक विशिष्ट शैली को आत्मसात किया और उसकी बॉडी लैग्वेज को पकड़ा। उसके बाद जेलर की भूमिका अविस्मरणीय बन गई।
उन्होेंने चला मुरारी हीरो बनने फिल्म का निर्माण भी किया था। एक फिल्म हम नहीं सुधरेंगे भी थी। इसके प्रीमियर पर वे दिल्ली के एक सिनेमाघर में आयोजित कार्यक्रम में आए थे। वहां किसी ने उनकी जेब काट ली। इस पर असरानी ने दर्शकोें को संबोधित करते हुए कहा था कि देखो मैंने कहा था ना कि हम कभी नहीं सुधरेंगे। मेरी जेब किसी ने काट ली है। दिवाली की रात वे इस दुनिया को खामोशी से अलविदा कह गए। और पत्नी को यह ताकीद कर गए कि उनकी अंत्येष्टि के कुछ घंटों बाद ही लोगों को बताएं कि असरानी चला गया है। ताकि उनकी वजह से किसी की दिवाली खराब न हो। उन जैसा एक्टर सदियों में पैदा होता है।

