Friday, March 13, 2026
- Advertisement -

किताबें उधार नहीं, अनुभूति होती हैं

किताबों का रिश्ता सिर्फ़ कागज और अक्षरों का नहीं होता, यह मन और आत्मा का संवाद है। आज जब लोग समाज सेवा या मित्रता के नाम पर किताबें माँगते हैं, तो यह सवाल उठता है-क्या उन्हें सच में किताबों से प्रेम है या केवल उन्हें मुफ़्त में पाने से? किताबें दान का सामान नहीं, एक अनुभव हैं। जो व्यक्ति अपने श्रम और जिज्ञासा से किताबें जुटाता है, वही उनकी असली कीमत समझता है। किताबें हमें आत्मनिर्भर बनाती हैं, हमें यह सिखाती हैं कि ज्ञान किसी की कृपा से नहीं, अपने प्रयास से अर्जित होता है।

डॉ. प्रियंका सौरभ

कभी कोई व्हाट्सएप पर लिखता है, कभी मैसेंजर पर, तो कभी ईमेल में — ‘हमने समाज सेवा के लिए एक लाइब्रेरी बनाई है, आप कुछ किताबें भेज दीजिए।’ शुरुआत में यह संदेश मुझे अच्छे लगते थे। लगा कि लोग पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देना चाहते हैं, किताबों को जीवित रखना चाहते हैं। लेकिन धीरे-धीरे यह सिलसिला कुछ ज्यादा ही बढ़ गया। अब हर कुछ दिनों में कोई न कोई संदेश आता है—वही आग्रह, बस शब्द थोड़े बदल जाते हैं। मैं हर बार विनम्रता से मना करती हूं, और कुछ दिन बाद फिर वही निवेदन लौट आता है।

कभी-कभी सोचती हूं— क्या सच में लोग किताबों से प्रेम करते हैं, या उन्हें मुफ़्त में पाने से? कुछ तो ऐसे भी हैं जो दोस्ती ही इस उम्मीद से करते हैं कि मैं उन्हें किताबें दूंगी—जैसे मेरी अलमारी किसी सार्वजनिक पुस्तकालय की शाखा हो और मैं उसकी अनिच्छुक लाइब्रेरियन। ऐसे लोगों की सोच यह होती है कि ‘आपके पास तो बहुत किताबें हैं, कुछ हमें भी दे दीजिए, समाज का भला हो जाएगा।’ लेकिन मैं सोचती हूं— समाज सेवा की शुरुआत हमेशा दूसरों की अलमारी से क्यों होती है?

अगर सच में किताबों से प्रेम है, तो अपने श्रम से उन्हें जुटाइए। किताबें पाने का आनंद तभी होता है जब उन्हें पाने में थोड़ी मेहनत, थोड़ा इंतजार और बहुत-सा लगाव शामिल हो। वो किताबें, जिन्हें आपने अपनी पहली तनख्वाह से खरीदा हो, जिनके पन्नों पर कॉफी के निशान हों या जिनमें आपकी उंगलियों के मोड़ से पन्ने मुड़े हों—वही किताबें आपके जीवन का हिस्सा बनती हैं। किताबों से प्रेम का अर्थ यह नहीं कि आप उन्हें जमा कर लें या दूसरों से मांगकर अपने रैक में सजा लें। किताबों से प्रेम का अर्थ है—उन्हें पढ़ना, उनसे प्रश्न करना, उनसे बहस करना और कभी-कभी उनसे असहमति जताना। किताबें जीवित प्राणी की तरह हैं — वे संवाद चाहती हैं, मौन नहीं।

किताबें सिर्फ कागज और शब्दों का ढेर नहीं होतीं—वे किसी व्यक्ति की यात्रा का हिस्सा होती हैं। उनमें उसकी सोच, उसकी भावनाएं, उसके समय की छाप होती है। इसलिए जब कोई किताब माँगता है, तो वह केवल एक वस्तु नहीं माँग रहा होता, बल्कि किसी के जीवन का अंश मांग रहा होता है। यही कारण है कि जब कोई कहता है, ‘आपके पास तो इतनी किताबें हैं, कुछ हमें दे दीजिए,’ तो मुझे यह एक भावनात्मक हस्तक्षेप जैसा लगता है। किताबों से जो रिश्ता बनता है, वह व्यक्तिगत होता है। वह संग्रह नहीं, संगति होती है।

लोग कहते हैं कि देश में लाइब्रेरियां नहीं हैं, इसलिए वे व्यक्तिगत संग्रहों से किताबें मांगते हैं। पर क्या सच में ऐसा है? मेरे अपने शहर में डॉ. कामिल बुल्के की लाइब्रेरी है—शब्दों और भाषाओं का अद्भुत संग्रह। राज्य पुस्तकालय और ब्रिटिश लाइब्रेरी—दोनों ही ज्ञान के खजाने से भरे पड़े हैं। मैंने अपनी पढ़ाई के दिनों में इन्हीं लाइब्रेरियों से किताबें लीं, घंटों वहीं बैठकर पढ़ा। उन पन्नों की महक, लकड़ी की अलमारियों की ठंडक और पुराने कागज की स्याही में घुली हुई खामोशी आज भी मेरे मन में जीवित है।

अब जब मैं किताबें खरीदती हूं, तो वह मेरे लिए कोई साधारण खरीदारी नहीं होती। यह मेरे भीतर की यात्रा होती है। कुछ किताबें मेरे अकेलेपन की सखी हैं —वे तब साथ होती हैं जब शब्दों की जरूरत होती है, लेकिन लोग नहीं। कुछ किताबें मेरे विचारों की हमसफर हैं—वे तब जवाब देती हैं जब दुनिया सवाल पूछती है। हर किताब मेरे मन का एक कोना है, एक स्मृति है, एक विचार का विस्तार है। कभी-कभी मैं सोचती हूं— किसी किताब को उधार देना वैसा ही है जैसे अपने दिल का एक टुकड़ा किसी को दे देना और फिर रोज यह सोचना कि क्या वह लौटेगी भी या नहीं।

कई बार किताबें लौटती नहींं। कई बार वे लौटती हैं, लेकिन उनके पन्नों से वह अपनापन गायब होता है जो पहले था। इसीलिए मैंने सीखा है कि किताबों को दान नहीं करती, बस उन्हें जीती हूँ। हमारे समाज में ‘दान’ का एक विशेष स्थान है, लेकिन हर चीज दान योग्य नहीं होती। किताबें उनमें से एक हैं। किताबें तब दान बन जाती हैं जब उन्हें देने वाला उन्हें केवल वस्तु समझता है, और पाने वाला उन्हें केवल सजावट समझता है। लेकिन जब दोनों उन्हें ‘अनुभव’ मानते हैं, तब वे आत्मा का आदान-प्रदान बन जाती हैं।

अगर सच में किसी को किताबों से प्रेम है, तो वह उन्हें पाने की कोशिश करेगा। वह अपनी तनख्वाह का थोड़ा हिस्सा किताबों के लिए रखेगा। वह बुकफेयर में जाएगा, सेकंड हैंड स्टॉल पर पुराने शीर्षक खोजेगा, या किसी लेखक से संवाद करेगा। सच्चा पाठक किताबों को उधार नहीं मांगता—वह उन्हें खोजता है, अर्जित करता है, और पढ़ने के बाद अपने भीतर उन्हें जीवित रखता है। किताबों की असली कीमत वही समझ सकता है, जिसने उन्हें अपने श्रम, अपनी जिज्ञासा और अपने प्रेम से पाया हो। वो जानता है कि किताबें सिर्फ ज्ञान नहीं देतीं, वे जीवन का नजरिया देती हैं। किताबें किसी के विचारों का संग्रह नहीं, बल्कि आत्मा का विस्तार हैं। वे हमें यह सिखाती हैं कि पढ़ना केवल जानकारी पाना नहीं, बल्कि अपने भीतर के संसार को गहराई देना है।

कभी-कभी मैं सोचती हूं—किताबों की असली ताकत यही है कि वे हमें आत्मनिर्भर बनाती हैं। वे सिखाती हैं कि ज्ञान किसी की दया पर निर्भर नहीं होता। और शायद यही कारण है कि मैं अपनी किताबें आसानी से किसी को नहीं देती— क्योंकि उन्होंने मुझे वही सिखाया है जो शायद कोई इंसान नहीं सिखा सका। किताबें दान की वस्तु नहीं, आत्मा की भाषा हैं। वे अपने भीतर हमारे विचारों, संवेदनाओं और संघर्षों का संग्रह रखती हैं। इसलिए जब कोई मुझे कहता है — ‘आपके पास इतनी किताबें हैं, कुछ दे दीजिए,’ तो मैं मुस्कुरा कर कहती हूं— ‘अगर सच में किताबों से प्रेम है, तो उन्हें खोजिए, खरीदिए, और पढ़िए।’

क्योंकि किताबों से प्रेम का असली प्रमाण उन्हें मांगना नहीं, बल्कि उन्हें जीना है। और जब आप किसी किताब को जी लेते हैं—तब वह कभी छूटती नहीं, वह आपके भीतर बस जाती है—हमेशा के लिए।

spot_imgspot_img

Subscribe

Related articles

छोटे बच्चों की करें उचित परवरिश

नीतू गुप्ता साफ-सुथरा, हंसता मुस्कुराता बच्चा सभी को अच्छा लगता...

पर उपदेश कुशल बहुतेरे

सही कहा है, दूसरों को उपदेश देने वाले एक...

मराठा कूटनीति के चाणक्य नाना फड़नवीस

मराठा साम्राज्य का संदर्भ आते ही आंखों के सम्मुख...

नीतीश कुमार का अंतिम दांव

बिहार की राजनीति में बहुविध हलचल है। मुख्यमंत्री नीतीश...
spot_imgspot_img