Friday, March 13, 2026
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ज़माना बीत जाता है रिश्ते मायने नहीं खोते

मनोज अभिज्ञान

काम जल्दी निपट गया था। हल्की राहत थी मन में, जैसे कोई अधूरा वादा पूरा हो गया हो। सोचा, थोड़ी देर आराम कर लूं। बिस्तर पर लेटा तो कमरे में सिर्फ पंखे की हल्की आवाज थी। वह घूम रहा था, अपने नियत चक्र में, बार-बार, बिना थके। मैंने उसकी ओर देखा—और कुछ देर बाद लगा कि मैं उसे नहीं, बल्कि किसी शून्य को देख रहा हूं। पंखे का घूमना, समय के घूमने जैसा था—वही गति, वही दोहराव, वही एकरसता, और फिर भी, उसमें जीवन की स्थिरता छिपी थी।

मुझे लगा, शायद जीवन भी ऐसा ही है। हम सभी किसी न किसी अदृश्य धुरी पर घूमते रहते हैं —काम, रिश्ते, इच्छाएं, यादें। सब कुछ गति में है, पर केंद्र में गहन सन्नाटा है।

उसकी कॉल ने तंद्रा भंग की। वही आवाज, जो अब भी उतनी ही साफ थी, जैसे किसी पुराने गीत की धुन जिसे बरसों बाद भी कान पहचान लेते हैं। हम दोनों के बीच लगभग दस साल का फासला हो चुका है, और फिर भी वह ऐसे बात करती है, जैसे कल ही बिछड़कर गई हो। हम बीते दिनों की बातों पर मुस्कुरा रहे थे—वो दिन जब दुनिया थोड़ी सरल थी, जब किसी के इंतजार में समय ठहर जाया करता था। बीच-बीच में उसकी हंसी स्क्रीन के पार हवा में हल्की धड़कन सी फैला रही थी। उसने कहा, ‘रुको जरा।’

कुछ देर खामोशी रही। मैंने सोचा शायद सिग्नल चला गया हो। फिर देखा, उसके कमरे की बत्तियां बुझ चुकी थीं। कुछ पल बाद एक मोमबत्ती जली—छोटी सी, जैसे किसी बच्चे ने किसी पुराने विश्वास को फिर से लौटा दिया हो।

वह बोली, ‘तुम्हें पता है, मुझे तारीखें ज्यादा याद नहीं रहतीं। पर कुछ दिन ऐसे होते हैं जिन्हें भूलना मुमकिन नहीं होता। जैसे कुछ लोग।’

मैंने कुछ नहीं कहा। बस देखा कि उसकी आँखों में मोमबत्ती की लौ झिलमिला रही थी, और वह उस लौ को जैसे मेरे नाम समर्पित कर रही हो। उसने स्क्रीन के करीब आकर बहुत धीरे से कहा, उस पल में उसकी सच्ची मौजूदगी थी। ऐसा एहसास कि समय चाहे जितना बीत जाए, कुछ रिश्ते अपने अर्थ नहीं खोते। वह लौ कुछ देर तक जलती रही। और मुझे लगा, शायद यह लौ उसके कमरे में नहीं, मेरे भीतर जल रही है—उन सब यादों के बीच जो बुझी नहीं, बस धूल में छिपी थीं।

मैंने कहा, ‘तुम अब भी वैसे ही हो—थोड़ी सी रहस्यमयी, थोड़ी सी भावुक।’ वह मुस्कुराई, ‘और तुम अब भी वैसे ही, जो हर भावना को शब्दों से ढकने की कोशिश करता है।’ कुछ देर हम दोनों चुप रहे। उस चुप्पी में जो कहा नहीं गया, वह कहा गया सब कुछ था। मैं सोच रहा था, कैसी अजीब बात है—कभी-कभी जिन लोगों को हम सबसे दूर मान लेते हैं, वही हमें सबसे पास मिलते हैं। वे हमें उन लम्हों में ढूंढ लेते हैं जब हम खुद को भूल चुके होते हैं। उस वक़्त मुझे एहसास हुआ कि कोई हमें याद रखता है, यह बात भी किसी उत्सव से कम नहीं होती। दुनिया में जहां सब कुछ बदल जाता है—चेहरे, जगहें, और विश्वास तक—वह एक याद जो किसी के मन में जीवित रहती है, वही अमरता का सबसे सच्चा रूप है।

वह बोली, ‘तुम अब भी वैसे ही बोलते हो, जैसे शब्दों से दुनिया को समझाने निकले हो। लेकिन बताओ, क्या तुमने खुद को कभी समझा?’

मैंने कहा, ‘कभी-कभी लगता है समझ गया हूं, फिर किसी याद की छाया सब बदल देती है। जीवन शायद समझने की चीज नहीं, बस जीने की आदत है।’

वह कुछ पल चुप रही। फिर बोली, ‘याद है तुम कहा करते थे, रिश्ता दो लोगों के बीच नहीं होता —वह समय के साथ होता है। आज लगता है, तुम सही थे। शायद हमारा रिश्ता भी किसी तिथि या बातचीत से नहीं बंधा। यह तो समय के उस हिस्से में है जहां सब थम जाता है।’
मैंने उसे देखा। उसकी आंखों में चमक थी। उसने कहा, ‘तुमसे बात करके लगता है, मैं खुद को फिर से पहचान रही हूं। जैसे कोई पुराने घर लौटकर देखे कि दीवारें अब भी सांस ले रही हैं।’
स्क्रीन बंद हो गई, लेकिन कमरे में उसकी उपस्थिति बाकी रही—जैसे कोई सुगंध जो दिखाई नहीं देती, पर हवा का हर अंश उससे भर जाता है।

कुछ रिश्ते, चाहे जितने दूर चले जाएं, अपना समय खुद तय करते हैं। कभी-कभी वे लौटते हैं, सिर्फ़ यह याद दिलाने कि जीवन में जो सबसे सच्चा है, वह कैलेंडर पर नहीं लिखा होता—वह बस किसी के दिल में दर्ज होता है।

पंखे की हवा मेरे चेहरे पर पड़ रही थी, जैसे कोई पुराना दोस्त बिना बोले कह रहा हो—‘चलो, कुछ देर बस यूं ही रहो। कुछ मत सोचो, कुछ मत करो।’ और सच में, उस पल कुछ करने को बचा नहीं था। बस मैं था, और मेरे भीतर फैलता हुआ वह शून्य—जो खाली नहीं था, बल्कि गहराई से भरा था।

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