Tuesday, May 5, 2026
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पशु-पक्षियों के संकेत आज भी कारगर

पशु-पक्षियों के व्यवहार से मौसम का पूवानुमान लग जाता है। उनका वैज्ञानिक अध्ययन पक्षियों के व्यवहार, प्रवास, प्रजनन और शारीरिक विशेषताओं को समझने में इंसान की पूरी तरह से मदद करता है। हमें केवल इस ज्ञान की समझ होने और इसके वैज्ञानिक प्रयोगों को समझने की जरूरत है। पक्षियों से जुड़ा पारंपरिक ज्ञान कई प्रकार का है। यह जीवन के हर क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। अगर केवल पर्यावरण की बात करें तो पक्षियों का अध्ययन (पक्षी विज्ञान) पारिस्थितिकी संतुलन को समझने में मदद करता है, क्योंकि वे कीट नियंत्रण, परागण और बीज प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पक्षी पर्यावरण में हो रहे बदलाव के शुरूआती संकेत देते हैं। उनकी आबादी में गिरावट आवासों के क्षरण या जलवायु परिवर्तन का संकेत हो सकती है।

अमित बैजनाथ गर्ग

हाल ही में राजस्थान के जोधपुर के जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के जीव विज्ञान विभाग ने एक अध्ययन में यह साबित किया कि पक्षियों के घोंसले बनाने के तरीके से लेकर जानवरों के व्यवहार तक, मौसम के संकेतों को समझा जा सकता है। यह शोध इंटरनेशनल जर्नल आॅफ एनवायर्नमेंटल साइंस में प्रकाशित हुआ है। इसमें बताया गया है कि जानवरों के व्यवहार में 80 प्रतिशत तक सटीकता देखी जाती है। यह शोध सिद्ध करता है कि पुराने समय से चली आ रही यह पारंपरिक जानकारी, जो ग्रामीणों द्वारा इस्तेमाल की जाती रही है, अब वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हो चुकी है। उदाहरण के लिए मोर का नृत्य या कूजन मानसून की शुरूआत का संकेत देता है। इसी प्रकार चींटियों का भोजन इकट्ठा करना सूखा पड़ने का संकेत है।

विभाग के एचओडी डॉ. गेमराराम परिहार और उनके शोध दल का कहना है कि प्रकृति के संकेत आज भी कारगर हैं। पशु-पक्षियों के व्यवहार से मौसम का पूवार्नुमान लग जाता है। उनका दावा है कि वैज्ञानिक शोध में इन बातों और तथ्यों की पुष्टि हो चुकी है। उनके शोध में पुरानी प्रथाओं के वैज्ञानिक प्रमाण साबित हुए हैं। शोध का निष्कर्ष है कि पशु-पक्षियों का व्यवहार आज भी मौसम के संकेत बताने में पूरी तरह सक्षम है। शोध में बताया गया है कि पशु-पक्षियों के व्यवहार से मौसम के संकेत सटीक मिलते हैं। यह बात करीब 80 प्रतिशत तक सही साबित हुई है। शोध में दावा किया गया है कि पारंपरिक ज्ञान का आज भी कोई तोड़ नहीं है। इसके संकेत आज भी वैज्ञानिक कसौटी पर भी पूरी तरह कारगर हैं।

इस शोध में यह भी बताया गया कि कैसे पुराने समय में लोग पारिस्थितिकी तंत्र के सदस्यों के व्यवहार से मौसम की भविष्यवाणी करते थे। लोमड़ी, सियार और अन्य जानवरों का व्यवहार भी इस प्रणाली का हिस्सा था। उदाहरण के लिए लोमड़ी खेतों में चूहों की संख्या को नियंत्रित करती है, जो कृषि के लिए अच्छा संकेत है। शोध के अनुसार, राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में जैसे भील, मीणा और बंजारा समुदायों के लोग अभी भी पशु-पक्षियों के संकेतों का पालन करते हैं। उदाहरण के लिए लाल चींटियां जब अपने अंडे इधर-उधर ले जाती हैं, तो यह बारिश के करीब आने का संकेत होता है। यह पारिस्थितिकी तंत्र के इन जानवरों की सूझबूझ को दर्शाता है, जो मौसम की सटीक जानकारी देते हैं।

असल में राजस्थान के मारवाड़ के गांवों में आज भी मौसम के पूवार्नुमान के लिए प्रकृति के संकेतों का अनुसरण किया जाता है। जहां एक ओर विज्ञान ने मौसम की भविष्यवाणी के लिए अत्याधुनिक तकनीकों का विकास किया है, वहीं दूसरी ओर ये पारंपरिक तरीके आज भी बड़े काम आते हैं। विश्वविद्यालय का ताजा अध्ययन यह साबित करता है कि पशु-पक्षियों के व्यवहार में मौसम के महत्वपूर्ण संकेत छिपे होते हैं। पशु-पक्षियों और अन्य जानवरों के व्यवहार पर आधारित यह पारंपरिक ज्ञान न केवल ग्रामीणों के लिए, बल्कि वैज्ञानिकों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन चुका है। यह पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्राचीन समय से चली आ रही यह पद्धतियां अब आधुनिक विज्ञान के माध्यम से और अधिक प्रमाणित हो रही हैं।

शोध कहता है कि पक्षियों के पारंपरिक संकेतों के कुछ अर्थ होते हैं। मोरों का नृत्य मानसून की शुरूआत का संकेत देता है। चींटियों का भोजन इकट्ठा करना सूखा पड़ने का संकेत है। सांप का पेड़ों पर चढ़ना बारिश की संभावना का पूवार्नुमान है। वहीं लोमड़ी की उपस्थिति खेतों में चूहों का नियंत्रण होने का संकेत देती है। मौसम के साथ जीवन से भी पक्षियों के संकेत जुड़े हुए हैं, जैसे चिड़िया अथवा गौरैया का घर में घोंसला बनाना खुशहाली और तरक्की का संकेत है। तोता का घर में आना धन लाभ, रुके हुए काम पूरे होने और मां लक्ष्मी की कृपा का सूचक है। उल्लू का घर में दिखाई देना जल्द ही कुछ शुभ होने का संकेत है, क्योंकि यह माता लक्ष्मी का वाहन है। कौवे का घर में आना मेहमानों के आगमन का संकेत देता है। मोर, नीलकंठ और सफेद कबूतर का सुबह-सुबह दिखना पूरे दिन के अच्छा बीतने का संकेत माना जाता है।

इसी तरह पक्षियों के मौसम के संकेत में उनकी उड़ान की ऊंचाई (कम ऊंचाई पर उड़ना बारिश का संकेत है, जबकि ऊंची उड़ानें अच्छे मौसम का संकेत देती हैं), उनकी आवाजें (जैसे उल्लू का बोलना या मोर का नाचना बारिश का संकेत माना जाता है) और उनका भोजन व्यवहार (तूफान से पहले खूब खाना) शामिल है। कुछ प्राचीन और ग्रामीण परंपराएं पक्षियों के घोंसले बनाने की जगह को भी मौसम का सूचक मानती हैं। जब पक्षी जमीन के करीब उड़ते हैं, तो यह बारिश का संकेत माना जाता है। मोर का नाचना, उल्लू का चीखना और गौरैया का धूल में लोटना बारिश का संकेत माना जाता है। यदि कौवे कांटेदार पेड़ों पर घोंसला बनाते हैं, तो बारिश कम होने की संभावना है। वहीं आम या करंज जैसे पेड़ों पर घोंसला बनाना अच्छी बारिश का संकेत है। लाल चींटियों का अपने अंडों को इधर-उधर ले जाना भी बारिश के आने का संकेत है।

इसी तरह पक्षियों का आसमान में ऊंची उड़ान भरना अच्छे मौसम का संकेत होता है। वहीं जोड़े में उड़ने वाले कौवे अच्छे मौसम का संकेत देते हैं। इसी तरह तूफान से पहले पक्षी वसा जमा करने के लिए अधिक सक्रिय हो जाते हैं और खूब खाना खाते हैं। बारिश आने पर मुर्गियां बेचैन हो जाती हैं या धूल में रगड़ती हैं। हंस की छाती की हड्डी का लाल या गहरे रंग का होना ठंडी और तूफानी सर्दी का संकेत हो सकता है। यदि सारस आकाश में गोलाकार परावलय बनाकर उड़ते हैं, तो यह शीघ्र वर्षा का संकेत है। पेड़ों पर दीमक का तेजी से घर बनाना अच्छी वर्षा का संकेत है। जब पक्षी एक साथ इकट्ठा होते हैं और अपने पंख फड़फड़ाते हैं, तो मौसम में बदलाव की उम्मीद की जा सकती है। वहीं चातक को बारिश का पक्षी माना जाता है। इसका आगमन मानसून के मौसम का संकेत है। इस तरह पशु और पक्षियों की हरकतों को देखकर मौसम का काफी हद तक पूवार्नुमान लगाया जा सकता है।

असल में यह हमारा पक्षियों से जुड़ा पारंपरिक ज्ञान है, जिसे हमारे पूर्वजों ने पूरा मान और सम्मान दिया है। मनुष्य लंबे समय से पक्षियों के व्यवहार को बदलते मौसमों के बैरोमीटर के रूप में इस्तेमाल करता रहा है। कई लोक कथाएं और किस्से हैं, जो बताते हैं कि पक्षियों की बढ़ती या घटती गतिविधि एक अध्याय के अंत और एक नए अध्याय की शुरूआत का संकेत देती है। हममें से ज्यादातर लोग इस जुड़ाव को भूल चुके हैं, लेकिन कोई भी पक्षी प्रेमी आपको सर्दियों के आखिरी नीरस दिनों में पक्षियों को रंग-बिरंगे रंग में रंगते देखने के उत्साह के बारे में जरूर बता देगा। सामान्य पक्षियों की तरह प्रवासी पक्षी भी कई अनुमान बताते हैं, जैसे मॉकिंगबर्ड और ब्लैकबर्ड का रात भर चहचहाना बताता है कि गर्म दिन आने वाले हैं। कई प्रवासी पक्षी सर्दियों के आगमन अथवा जाने के बारे में इशारा करते हैं।

पक्षियों से जुड़ा पारंपरिक ज्ञान कई प्रकार का है। यह जीवन के हर क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। अगर केवल पर्यावरण की बात करें तो पक्षियों का अध्ययन (पक्षी विज्ञान) पारिस्थितिकी संतुलन को समझने में मदद करता है, क्योंकि वे कीट नियंत्रण, परागण और बीज प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पक्षी पर्यावरण में हो रहे बदलाव के शुरूआती संकेत देते हैं। उनकी आबादी में गिरावट आवासों के क्षरण या जलवायु परिवर्तन का संकेत हो सकती है। पक्षी कीटों को नियंत्रित करते हैं, बीज फैलाते हैं और परागण में मदद करते हैं, जो मानव द्वारा उपयोग किए जाने वाले कई पौधों के लिए महत्वपूर्ण है। पक्षी मृत जीवों और कचरे को साफ करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पक्षियों का वैज्ञानिक अध्ययन पक्षियों के व्यवहार, प्रवास, प्रजनन और शारीरिक विशेषताओं को समझने में इंसान की पूरी तरह से मदद करता है।

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