राजनीति में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के चलते चर्चा में बने रहने पर ही मनोवांछित लक्ष्य की प्राप्ति होती है। अन्यथा जमाने भर की उठापटक का कोई अर्थ नहीं निकलता। चर्चा मे बने रहने का एक तरीका आजकल बड़े प्रचलन में है कि विरोधी पक्ष पर अंगारे उगलती शब्दावली के साथ प्रहार करते हुए उनके तन-बदन में आग लगा दी जाएं। जिसके चलते सामने वाला अपनी ऊर्जा और चेतना बचाव में ही लगा देवें और आप मजे में अगले आक्रमण की तैयारी कर सकें। ऐसे में एक समय ऐसा भी आता है कि आपको छेड़ना बर्र के छत्ते में हाथ डालने के सामान लगे। दरअसल कभी-कभी एक ही शब्द इतना घातक सिद्ध होता है कि समय की धारा का प्रवाह भी उस शब्द से हुए घाव को भर नहीं सकता। घाव लंबे समय तक हरा रहता है।
इसलिए विशेष कर राजनीति के मैदान में डटे रहने के लिए हर छोटे-बड़े राजनेता को शब्दकोश खंगाल कर चुनिंदा शब्दों का संग्रह तैयार कर लेना चाहिए। इसके चलते राजनीति में चाहे सम परिस्थिति हो या विषम, हर एक स्थिति में आत्मविश्वास ही इस कदर प्रबल हो जाता है कि चोरी करने पर भी सीनाजोरी करने लायक पर्याप्त सामर्थ्य आ जाता है। आध्यात्मिक एवं भाषा विज्ञान की दृष्टि से भी शब्दों की महिमा को अपरंपार दशार्या गया है। इसलिए यदि हमारे पास कुछ भी नहीं हो लेकिन दिल और दिमाग में शब्दों का भंडार हो तो केवल राजनीति ही नहीं अपितु व्यापार व्यवसाय या किसी पेशे में भी अपना डंका बजाया जा सकता है। खैर।
लोकतंत्र के चलते अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दौर में तो यह और भी अधिक आवश्यक हो जाता है कि शब्दों के हथियार साथ रखे जाएं। अन्यथा राजनीति के मैदान में राह चलते हर कोई राह चलता हमें धराशाई कर सकता है। वैसे आए दिन राजनेताओं की जुबान इस कदर फिसल भी जाती है कि कुर्सी पर बैठे हुए हो तो कुर्सी फिसल जाने का अंदेशा हो जाता है। या फिर कुर्सी पाने की अभिलाषा तार-तार हो जाती है। इसलिए यह भी जरूरी है कि कुछ एक मामलों में मन की भड़ास को घुमावदार शब्दों का उपयोग करते हुए व्यक्त कर दी जाएं। लेकिन इस कला में पारंगत होने के लिए भी राजनेताओं को शब्द ज्ञानी बनाने की जरूरत है।
आजकल की राजनीति में ऐसे शब्दों के सौदागर चंद शब्द उछाल-उछाल कर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ‘हीरो’ बने हुए हैं। अब यदि चंद शब्दों का कोई एक ऐसा वाक्य बना दिया जाए, जो जुमला बनकर जनता जनार्दन को सोचने और समझने का अवसर ही नहीं दे। तब तो हुकूमत भी हासिल की जा सकती है। अब देखिए न, हर एक छोटे बड़े चुनाव में चंद वाक्य या चंद शब्द ही इस कदर धूम मचा देते हैं कि मतदाता का तो दिमाग ही घूम जाता है। उसके दिल और दिमाग में वह वाक्य या शब्द ही कुछ इस कदर बैठ जाता है कि फिर उतरने का नाम ही नहीं लेता चाहे निर्वाचित जनप्रतिनिधि या सरकार जुमले को सार्थक करें या नहीं करें।

