जनवाणी संवाददाता ।
सहारनपुर: पवित्र माह रमज़ान के दौरान समाज में बदलती परंपराओं और बढ़ते दिखावे को लेकर उलेमा ने चिंता जताई है। मशहूर आलिम-ए-दीन मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा ने कहा कि रमज़ान की असल रूह सादगी, तक़वा और इंसानियत है, लेकिन मौजूदा दौर में कहीं-कहीं यह केवल औपचारिकताओं और दिखावे तक सीमित होता नजर आ रहा है। उन्होंने बताया कि रमज़ान का तीसरा और आखिरी अशरा चल रहा है, ऐसे में जरूरतमंदों की अधिक से अधिक मदद की जानी चाहिए। फितरा, जकात और खैरात सही हकदारों तक पहुंचे, इसका विशेष ध्यान रखा जाए, ताकि कोई भी ईद की खुशियों से महरूम न रहे।
रमज़ान की रूह को समझने की जरूरत
मौलाना ने कहा कि इस बार रमज़ान में इबादत के साथ-साथ दिखावे और रस्मों का चलन भी बढ़ता दिखाई दे रहा है। मुसलमानों को रमज़ान की असल भावना को समझना चाहिए, न कि केवल उसकी बाहरी परंपराओं तक सीमित रहना चाहिए।
इफ्तार में दिखावे से बचने की अपील
इफ्तार आयोजनों को लेकर उन्होंने कहा कि रोज़ेदार को इफ्तार कराना बहुत बड़ा सवाब है, लेकिन इसमें सबसे पहला हक़ गरीबों और जरूरतमंदों का होता है। यदि इफ्तार केवल सामाजिक प्रतिष्ठा दिखाने का माध्यम बन जाए, तो यह रमज़ान की रूह के खिलाफ है।
गलत परंपराओं पर शालीनता से सुधार जरूरी
उन्होंने कहा कि समाज में अगर कोई गलत परंपरा बढ़ती है, तो उसे हिकमत और शालीनता के साथ सुधारना चाहिए। किसी को नीचा दिखाना उद्देश्य नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज को सही दिशा देना ही असली मकसद होना चाहिए।मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा ने कहा कि रोज़ा केवल भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह सब्र, परहेज़गारी और इंसानियत सिखाता है। यदि इन मूल्यों का जीवन में असर नहीं दिख रहा, तो आत्ममंथन की आवश्यकता है।
जरूरतमंदों की मदद पर जोर
मौलाना ने अपील की कि रमज़ान के दौरान सादगी अपनाई जाए और जरूरतमंदों की मदद की जाए। उन्होंने कहा कि इसी से रमज़ान की असल भावना को जीवन में उतारा जा सकता है और समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।

