Tuesday, May 19, 2026
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पर्यावरण अनुकूल बने ईवी

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जलवायु परिवर्तन आज मानव सभ्यता के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। दुनिया भर में बढ़ते तापमान, चरम मौसम घटनाओं और प्रदूषण ने विकास के मौजूदा मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इस संदर्भ में परिवहन क्षेत्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यह आधुनिक जीवन का आधार भी है और प्रदूषण का बड़ा स्रोत भी। परिवहन क्षेत्र वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का एक बड़ा हिस्सा पैदा करता है। अंतरसरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल के अनुसार दुनिया के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 15 फीसदी हिस्सा परिवहन क्षेत्र से आता है, जबकि ऊर्जा से जुड़े कार्बन उत्सर्जन में इसकी हिस्सेदारी लगभग 23 फीसदी तक पहुँच जाती है। यही कारण है कि आज दुनिया के अनेक देश अपनी परिवहन व्यवस्था को पर्यावरण-अनुकूल बनाने की दिशा में तेजी से जुटे हैं।

पिछले कुछ वर्षों में यह समझ विकसित हुई है कि आर्थिक विकास तभी टिकाऊ हो सकता है जब वह पर्यावरण के साथ संतुलन बनाए रखे। इसी सोच के साथ ‘ग्रीन मोबिलिटी’ या ‘सस्टेनेबल ट्रांसपोर्ट’ की अवधारणा वैश्विक नीतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही है। इसका उद्देश्य ऐसे परिवहन साधनों और ढाँचों को विकसित करना है जो कम ऊर्जा का उपयोग करें, कम प्रदूषण फैलाएं और शहरों को अधिक रहने योग्य बनाएँ।

दुनिया में ग्रीन मोबिलिटी की दिशा में यूरोप सबसे आगे दिखाई देता है। नॉर्वे, नीदरलैंड और जर्मनी जैसे देशों ने इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए व्यापक नीतियां बनाई हैं। नॉर्वे में नई कारों की बिक्री में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी 70 फीसदी से भी अधिक हो चुकी है। इसके साथ ही यूरोप के कई शहरों ने साइकिल को शहरी परिवहन का प्रमुख साधन बनाने का प्रयास किया है। एम्स्टर्डम और कोपेनहेगन जैसे शहरों में साइकिल लेन का विशाल नेटवर्क है और बड़ी संख्या में लोग रोजाना साइकिल से ही अपने कार्यस्थल तक पहुंचते हैं। इससे न केवल प्रदूषण कम होता है बल्कि यातायात और ऊर्जा खपत भी घटती है। चीन ने भी इलेक्ट्रिक -वाहनों और सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। चीन के कई शहरों में हजारों बिजली बसें संचालित हो रही हैं और बिजली वाहनों के उत्पादन में भी वह दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार वर्ष 2022 में दुनिया भर में एक करोड़ से अधिक इलेक्ट्रिक कारें बेची गर्इं, जो कुल कार बिक्री का लगभग 14 फीसद हिस्सा थीं। यह आँकड़ा इस बात का संकेत है कि वैश्विक परिवहन व्यवस्था धीरे-धीरे लेकिन स्थायी रूप से बदल रही है।

भारत के लिए यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां तेजी से शहरीकरण और आर्थिक विकास के साथ वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार भारत में सड़क परिवहन देश के ऊर्जा-संबंधी कार्बन उत्सर्जन का लगभग 12 से 14 फीसद हिस्सा पैदा करता है, जिसमें से लगभग 90 फीसदी उत्सर्जन सड़क परिवहन से होता है। पिछले दो दशकों में इस क्षेत्र में उत्सर्जन तेजी से बढ़ा है। एक अध्ययन के अनुसार वर्ष 2001 में परिवहन क्षेत्र से कार्बन उत्सर्जन 155.9 मिलियन टन था, जो दो दशक में बढ़कर 368.2 मिलियन टन हो गया। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि यदि भारत को स्वच्छ और टिकाऊ विकास की दिशा में आगे बढ़ना है तो परिवहन व्यवस्था में व्यापक बदलाव आवश्यक होंगे। भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों ने पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में कई ठोस पहलें की हैं। केंद्र सरकार की फेम योजना के माध्यम से इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। इस योजना के तहत इलेक्ट्रिक दोपहिया, तिपहिया, कार और बसों की खरीद पर अनुदान दिया जा रहा है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और पुणे जैसे शहरों में धीरे-धीरे इलेक्ट्रिक बसों की संख्या बढ़ रही है। इसके अलावा कई शहरों में इलेक्ट्रिक बसें भी शुरू की गई हैं। इससे सार्वजनिक परिवहन को अधिक स्वच्छ और ऊर्जा-कुशल बनाने में मदद मिल सकती है।

मेट्रो रेल का विस्तार भी भारत के शहरी परिवहन में महत्वपूर्ण बदलाव ला रहा है। दिल्ली मेट्रो के बाद अब देश के कई शहरों में मेट्रो परियोजनाएं संचालित या निर्माणाधीन हैं। इससे लाखों लोगों को निजी वाहनों के बजाय सार्वजनिक परिवहन का विकल्प मिल रहा है। पर्यावरण-अनुकूल परिवहन की चर्चा में साइकिल पर बात नहीं हो तो अधूरा है। साइकिल को सबसे सरल और प्रभावी साधन माना जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित कई अध्ययनों के अनुसार साइकिल न केवल प्रदूषण को कम करती है बल्कि लोगों के स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाती है। यूरोप के कई शहरों में साइकिल आधारित परिवहन बेहद सफल रहा है। नीदरलैंड और डेनमार्क जैसे देशों में बड़ी आबादी रोजमर्रा की यात्राओं के लिए साइकिल का उपयोग करती है। एम्स्टर्डम में लगभग 40 फीसदी शहरी यात्राएं साइकिल से होती हैं।

हालांकि भारत में पर्यावरण-अनुकूल परिवहन की दिशा में पहलें शुरू हो चुकी हैं। लेकिन सबसे पहली चुनौती बुनियादी ढांचे की है। इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए पर्याप्त चार्जिंग स्टेशन अभी भी कई शहरों में उपलब्ध नहीं हैं। दूसरी चुनौती लागत से जुड़ी है। इलेक्ट्रिक वाहनों की शुरूआती कीमत अभी भी पारंपरिक वाहनों की तुलना में अधिक है। हालांकि लंबे समय में इनकी परिचालन लागत कम होती है, लेकिन शुरूआती निवेश कई उपभोक्ताओं को रोकता है। तीसरी चुनौती शहरी नियोजन से जुड़ी है। भारत के कई शहरों का विस्तार बिना दीर्घकालिक परिवहन योजना के हुआ है। परिणामस्वरूप सड़कों पर भीड़ और यातायात जाम आम समस्या बन गए हैं। इसके अलावा चौथी चुनौती शहरों में साइकिल और पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित ढाँचों का अभाव है। यदि शहरों की योजना इस तरह बनाई जाए कि सार्वजनिक परिवहन, साइकिल और पैदल मार्ग को प्राथमिकता मिले, तो प्रदूषण और यातायात दोनों में कमी लाई जा सकती है।

दरअसल पर्यावरण-अनुकूल परिवहन केवल तकनीकी बदलाव का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह जीवनशैली और नीतिगत दृष्टिकोण से जुड़ा हुआ मुद्दा है। यदि शहरों को अधिक स्वस्थ, सुरक्षित और रहने योग्य बनाना है तो परिवहन व्यवस्था में व्यापक बदलाव आवश्यक होगा। भारत के लिए यह एक अवसर भी है। देश के पास युवा जनसंख्या, तेजी से विकसित हो रही तकनीक और बढ़ता हुआ बाजार है। यदि इलेक्ट्रिक वाहनों के निर्माण, बैटरी तकनीक और नवीकरणीय ऊर्जा को जोड़कर समग्र नीति बनाई जाए, तो भारत इस क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व भी हासिल कर सकता है। याने पर्यावरण-अनुकूल परिवहन की दिशा में उठाए गए कदम केवल प्रदूषण कम करने तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि वे शहरों को अधिक मानवीय, सुरक्षित और स्वस्थ बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे।

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