
पिछले कुछ वर्षों से यह समस्या और भी व्यापक रूप से सामने आई है। दिल्ली, मेरठ, हल्द्वानी, कानपुर सहित देशभर के अनेक राज्यों व शहरों में इस प्रकार की घटनाएं लगातार देखने को मिली हैं। क्षेत्रीय समाचार पत्रों में यह खबरें भले सीमित रूप से प्रकाशित होती हों, परंतु यह एक राष्ट्रीय स्तर की गंभीर समस्या बन चुकी है। हर बार कानून के नाम पर वही व्यक्ति दोषी ठहराया जाता है, जो 20-30 वर्षों से 50-100 गज के छोटे से भूखंड पर अपना आशियाना या फिर कारोबार का एक मात्र आधार बनाकर अपने परिवार का भरण पोषण कर रहा था। इन कॉलोनियों में आम नागरिकों ने अपनी जीवनभर की कमाई लगाकर घर खरीदे, बिजली-पानी के कनेक्शन लिए और नियमित रूप से हाउस टैक्स भी चुकाया। जहां शहरी कमर्शियल क्षेत्र थे, वहां कमर्शियल चार्ज, कमर्शियल मीटर और कमर्शियल हाउस टैक्स भी वसूले गए।
स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब वर्षों बाद एक सुप्रीम आदेश आता है। अचानक इन्हीं कॉलोनियों को अवैध घोषित कर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू कर दी जाती है। बुलडोजर जब चलता है, तो वह केवल ईंट-पत्थर का भवन नहीं गिराता, बल्कि उन परिवारों के सपनों, सुरक्षा और भविष्य को भी कुचल देता है, जिन्होंने उस भूखंड को भरोसे के आधार पर अपने आशियाने या फिर स्व-रोजगार हेतु कदम बढ़ाया था। ऐसे उदाहरण हाल के वर्षों में कई बार सामने आए हैं—जैसे फरीदाबाद के खोरी गांव में हजारों घरों को हटाया गया, हल्द्वानी में रेलवे भूमि पर बसे हजारों परिवारों को हटाने का मामला न्यायालय तक पहुंचा, मेरठ में भी सार्वजनिक भूमि एवं मार्गों से अतिक्रमण हटाने को लेकर न्यायालयीय निर्देशों के बाद व्यापक स्तर पर कार्रवाई हुई, तथा दिल्ली के तुगलकाबाद क्षेत्र में भी सरकारी भूमि से बड़े स्तर पर अतिक्रमण हटाया गया। इन सभी घटनाओं में एक समान स्थिति यह रही कि वर्षों तक बसावट होती रही और बाद में अचानक व्यापक स्तर पर कार्रवाई की गई।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है—जब यह सब हो रहा था, तब प्रशासन कहां था? यदि यह निर्माण पूर्व नियोजित आवंटित विभागीय सार्वजनिक जगह पर निर्माण हो रहे थे और ये अवैध थे, तो प्रारंभिक स्तर पर ही इन्हें क्यों नहीं रोका गया? क्या यह केवल नागरिकों की भूल है या फिर प्रशासनिक लापरवाही? किंतु आज जब वही विभाग वर्षों बाद एक सुप्रीम आदेश लेकर आता आता है। अचानक इन्हीं कॉलोनियों को अवैध घोषित कर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू कर दी जाती है। क्या एक सामान्य नागरिक से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह 30-40 वर्षों पुराने भूमि अभिलेखों की गहराई से जांच करे? यदि वह ऐसा नहीं कर पाता, तो क्या वह अपराधी बन जाता है? या फिर असली दोषी वे लोग हैं जिन्होंने इस पूरे तंत्र को संचालित किया—माफिया, दलाल और वे अधिकारी, जिन्होंने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया?
एक मूलभूत प्रश्न यह भी है कि क्या सरकार अपनी ही भूमि और सड़कों की चौड़ाई का नियमित संरक्षण और चिन्हांकन नहीं कर सकती? जब देश में जनगणना जैसे व्यापक कार्य संभव हैं, तो क्या प्रत्येक एक या दो वर्ष में सार्वजनिक भूमि का भौतिक सत्यापन असंभव है? यदि समय-समय पर उत्तरदाई स्थानीय विभाग—चाहे वह म्यूनिसिपल कमेटी हो, पीडब्ल्यूडी हो या कोई अन्य विभागों द्वारा—सीमांकन के सूचना पट लगाए जाते, तो क्या कोई व्यक्ति उस भूमि को अपना अधिकार बताकर बेच पाता?
अभी भी समय है जब भू एवं राजस्व विभाग में प्रत्येक स्तर पर इस समस्या पर गंभीरता से विचार किया जाए और प्रशासनिक सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं। इस समस्या की जड़ में एक बड़ी कमी यह है कि अधिकारियों के स्थानांतरण के साथ जिम्मेदारी भी धुंधली हो जाती है। हर नया अधिकारी पूर्ववर्ती अधिकारी की ओर संकेत कर स्वयं को उत्तरदायित्व से अलग कर लेता है। इसे रोकने के लिए आवश्यक है कि प्रशासन में भी बैंकिंग प्रणाली की तरह ‘हैंडओवरटेकओवर उत्तरदायित्व मॉडल’ लागू किया जाए।
स्थानांतरण के समय कार्यक्षेत्र की भौतिक और अभिलेखीय स्थिति का अनिवार्य सत्यापन हो। जाने वाला अधिकारी लिखित रूप से प्रमाणित करे कि उसके कार्यकाल में कोई अनियमितता लंबित नहीं है, और पदभार ग्रहण करने वाला अधिकारी भी यह सुनिश्चित करे कि उसने सभी रिकॉर्ड और स्थल की स्थिति की जांच कर ली है। यदि भविष्य में कोई अनियमितता सामने आती है, तो उसकी जिम्मेदारी केवल पूर्व अधिकारी तक सीमित न रहकर उस अधिकारी पर भी तय हो, जिसने हस्तांतरण के समय स्थिति को संतोषजनक बताया था। यह परस्पर उत्तरदायित्व की व्यवस्था अधिकारियों को एक-दूसरे से जोड़ेगी और लापरवाही तथा मिलीभगत पर प्रभावी अंकुश लगाएगी। बुलडोजर से पहले व्यवस्था सुधारी जाए।

