बनारस की उस पुरानी पुश्तैनी हवेली के दालान में गंगा की लहरों का शोर कम, नोटिफिकेशन की घनघनाहट ज्यादा थी। पंडित दीनानाथ अपनी लकड़ी की आराम कुर्सी पर ऐसे पसरे थे, जैसे आॅफलाइन दुनिया के आखिरी पुरावशेष हों। हाथ में मोबाइल ऐसे चिपका था जैसे शरीर का कोई नया अंग प्रगट हो गया हो। पोता कल्लू पास आकर बोला, ‘बाबा, बगल वाले टोले से बुआ का फोन आया था… कह रही थीं कि फुआ की तबीयत बहुतै खराब है। दवा-दारू के लिए कुछ कह रही थीं।’ दीनानाथ की उंगलियां स्क्रीन पर किसी सधे हुए तबला वादक की तरह थिरक रही थीं।
‘अरे गुरु… देते हैं। जरा ठहरो, ये जीवन के पांच अटल सत्य वाला वीडियो ग्रुप में पेल दें, दुनिया का उद्धार हो जाएगा।’ कल्लू ने माथा पीटा, ‘बाबा, फुआ को अस्पताल ले जाना पड़ेगा, बुआ घबराई हुई हैं।’ दीनानाथ ने बिना चश्मा ऊपर किए जवाब दिया, ‘अरे लल्ला, घबराने से क्या होगा? ये देख, प्राणायाम के चमत्कार वाली रील मिली है। अपनी फुआ को फॉरवर्ड कर दे, देखते ही आक्सीजन लेवल चकाचक हो जाएगा!’ कल्लू चला गया।
रात गहरा गई। दीनानाथ ने शुभरात्रि का ऐसा बम फेंका कि ग्रुप के आधे लोग पापबोध से मर जाएं कि वे अभी तक सोए क्यों नहीं। खुद दो घंटे तक जागकर ये कुंडली खंगालते रहे कि किसने सीन किया और किसने इग्नोर। ‘धत तेरे की… ये मिश्रा जी ने अभी तक ब्लू टिक नहीं दिया? कल ही अहंकार का विनाश वाली रील भेजूंगा इनको।’ अंधेरे कमरे में मोबाइल की नीली रोशनी उनके चेहरे को किसी शव की तरह धवल कर रही थी। तभी उनके फोन पर बुआ की तरफ से एक मिस्ड कॉल आई, फिर सब सन्न हो गया। पंडित जी को लगा शायद नेटवर्क चला गया। उन्होंने फोन झकझोरा। ‘अरे कल्लू, जरा देखो तो राउटर की बत्ती जल रही है क्या? इंटरनेट मर गया तो समझो हम भी मर गए।’ कोई जवाब नहीं आया। दीनानाथ को क्रोध आया। उन्होंने ग्रुप पर मैसेज डाला— ‘आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।’
सुबह का सूरज ठीक वैसा ही निकला जैसा पंडित जी की सुप्रभात वाली फोटो में था—थोड़ा धार्मिक, थोड़ा प्रखर। वे कल रात वाली परम फोटो के साथ आॅनलाइन प्रगट हुए। ग्रुप पर वही फोटो पोस्ट की— ‘अपनों को गले लगाओ, कल किसने देखा है?’ तभी कल्लू का मैसेज फ्लैश हुआ। मैसेज खोला। भीतर कोई फोटो नहीं थी, कोई सुविचार नहीं था। सिर्फ एक लोकेशन पिन थी जो श्मशान घाट की ओर इशारा कर रही थी और नीचे लिखा था— ‘बाबा, फुआ कल रात ही विदा हो गर्इं। आप आॅनलाइन होकर मोक्ष ढूंढ रहे थे, वो आफलाइन होकर घाट पहुंच गर्इं। अब ये फोटो अपने ग्रुप में डाल दीजिए, बहुत लाइक और श्रद्धांजलि वाले इमोजी मिलेंगे।’ पंडित जी के हाथ से फोन छूटकर दालान के पत्थरों पर जा गिरा। स्क्रीन कचर-कचर होकर टूट गई थी, पर भीतर से अब भी नोटिफिकेशन की टिटिहारी गूंज रही थी—‘मिश्रा जी लाइक्ड योर स्टेटस।’

