Wednesday, August 19, 2026
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UP News: भाजपा की नई टीम में दो मुस्लिम चेहरे, जानें तारिक मंसूर और बासित अली का सियासी सफर

जनवाणी ब्यूरो |

यूपी: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने राष्ट्रीय स्तर पर अपने संगठन में बड़ा फेरबदल करते हुए 65 पदाधिकारियों की नियुक्ति की है। नितिन नवीन के नेतृत्व वाली नई टीम में सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने की कोशिश दिखाई दे रही है। धार्मिक प्रतिनिधित्व की बात करें तो पार्टी ने दो मुस्लिम चेहरों को भी अहम जिम्मेदारी दी है। इनमें डॉ. तारिक मंसूर को दोबारा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है, जबकि कुंवर बासित अली को भाजपा राष्ट्रीय अल्पसंख्यक मोर्चा का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।

दोनों नेता उत्तर प्रदेश से आते हैं। ऐसे में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए इन नियुक्तियों को पार्टी की यूपी रणनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है। आइए जानते हैं दोनों नेताओं के बारे में और भाजपा के लिए उनकी राजनीतिक अहमियत क्या है।

कौन हैं डॉ. तारिक मंसूर?

डॉ. तारिक मंसूर भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम में एक बार फिर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालेंगे। वह उत्तर प्रदेश से आते हैं और फिलहाल उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य (एमएलसी) हैं। अप्रैल 2023 में योगी आदित्यनाथ सरकार ने उन्हें विधान परिषद के लिए नामित किया था।

20 सितंबर 1956 को अलीगढ़ में जन्मे तारिक मंसूर का परिवार शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र से जुड़ा रहा है। उनके पिता प्रोफेसर हफीजुल रहमान अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के कानून विभाग के संस्थापक डीन थे। उनकी पत्नी हामिदा तारिक जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर हैं।

तारिक मंसूर ने एएमयू के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से 1978 में एमबीबीएस और 1982 में सर्जरी में एमएस की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने मेडिकल कॉलेज में रजिस्ट्रार और फिर मुख्य चिकित्सा अधिकारी के तौर पर काम किया।

1985-86 के दौरान उन्होंने सऊदी अरब के किंग फहद टीचिंग हॉस्पिटल में सर्जिकल स्पेशलिस्ट के रूप में सेवाएं दीं। भारत लौटने के बाद उन्होंने एएमयू में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर काम शुरू किया। बाद में वह एसोसिएट प्रोफेसर और फिर प्रोफेसर बने।

एएमयू के कुलपति से भाजपा की राजनीति तक

तारिक मंसूर को 2017 में एएमयू का कुलपति नियुक्त किया गया था। एएमयू के एक सदी से अधिक लंबे इतिहास में वह ऐसे कुलपतियों में शामिल हैं, जिन्होंने अपने कार्यकाल के बाद सक्रिय राजनीति में कदम रखा और भाजपा से जुड़े। अपने करियर के दौरान वह मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया, आईआईएम लखनऊ के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स, मौलाना आजाद एजुकेशन फाउंडेशन की शासी निकाय और केंद्र सरकार की पद्म पुरस्कार समिति जैसी संस्थाओं में भी विभिन्न जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। 2023 में उन्होंने औपचारिक रूप से भाजपा की सदस्यता ग्रहण की। उन्हें भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शीर्ष नेतृत्व के करीब माना जाता है।

कौन हैं कुंवर बासित अली?

कुंवर बासित अली को भाजपा ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक मोर्चा का अध्यक्ष बनाया है। इससे पहले वह उत्तर प्रदेश भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। अब राष्ट्रीय स्तर पर नई जिम्मेदारी मिलने के बाद वह पार्टी के प्रमुख मुस्लिम चेहरों में शामिल हो गए हैं।

बासित अली मुस्लिम राजपूत समुदाय से आते हैं। उनका जन्म मेरठ जिले के कायस्थ बड्ढा गांव में हुआ था, जो किठौर विधानसभा क्षेत्र में आता है। उन्होंने यूपी बोर्ड से हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की पढ़ाई की। इसके बाद 2005 में होटल मैनेजमेंट में ग्रेजुएशन किया। पढ़ाई के दौरान उन्होंने पार्ट-टाइम काम किया और बाद में मेरठ में होटल कारोबार शुरू किया।

जमीनी कार्यकर्ता से राष्ट्रीय जिम्मेदारी तक

बासित अली ने करीब डेढ़ दशक में भाजपा संगठन में जमीनी कार्यकर्ता से राष्ट्रीय स्तर के नेता तक का सफर तय किया है। वह पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय दर्शन से प्रभावित होकर भाजपा से जुड़े। उन्होंने 2011 में उत्तर प्रदेश भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के मंडल अध्यक्ष के रूप में राजनीतिक सफर शुरू किया। इसके बाद मेरठ जिले में मीडिया प्रभारी और 2012 में जिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। वह मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के क्षेत्रीय संयोजक भी रहे।

बासित अली ने अल्पसंख्यक मोर्चे के क्षेत्रीय समन्वयक और पश्चिमी क्षेत्र के समन्वयक के तौर पर भी काम किया। भाजपा सरकार बनने के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी का सदस्य बनाया गया। इस दौरान उन्होंने स्कूलों और कॉलेजों में उर्दू भाषा को बढ़ावा देने के लिए सेमिनार और मुशायरों का आयोजन कराया। 20 जून 2021 को उन्हें उत्तर प्रदेश भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। करीब पांच साल बाद अब पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर की बड़ी जिम्मेदारी दी है।

भाजपा ने दोनों नेताओं को क्यों दी अहम जिम्मेदारी?

उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनावी राज्यों में से एक है। राज्य में विधानसभा की 403 और लोकसभा की 80 सीटें हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन 2019 की तुलना में कमजोर रहा था। पार्टी की लोकसभा सीटें 62 से घटकर 33 रह गई थीं।

ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा ने अपनी राष्ट्रीय टीम में उत्तर प्रदेश को खास प्रतिनिधित्व दिया है। पार्टी ने राज्य से आठ नेताओं को राष्ट्रीय संगठन में जगह दी है। इनमें दो मुस्लिम चेहरों को शामिल किया जाना भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भाजपा पिछले कुछ वर्षों से मुस्लिम समुदाय को एकसमान वोट बैंक के तौर पर देखने के बजाय उसके भीतर मौजूद अलग-अलग जातीय और सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। तारिक मंसूर और बासित अली को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

पसमांदा और मुस्लिम राजपूत समीकरण पर नजर

तारिक मंसूर को पसमांदा मुस्लिम समुदाय से जुड़ा प्रमुख चेहरा माना जाता है, जबकि बासित अली मुस्लिम राजपूत समुदाय से आते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, दोनों नेताओं के जरिए भाजपा मुस्लिम समाज के अलग-अलग सामाजिक और जातीय वर्गों तक अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर सकती है। पार्टी की रणनीति खासतौर पर पिछड़े और पसमांदा मुस्लिम मतदाताओं के बीच राजनीतिक आधार मजबूत करने की दिशा में देखी जा रही है। भाजपा लंबे समय से पसमांदा मुस्लिमों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करती रही है।

कौन होते हैं पसमांदा मुस्लिम?

‘पसमांदा’ फारसी शब्द है, जिसका अर्थ ‘पीछे छूटा हुआ’ होता है। भारत के कई हिस्सों, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े मुस्लिम समुदायों के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया जाता है।

भारतीय मुस्लिम समाज के भीतर भी अलग-अलग जातीय और सामाजिक समूह मौजूद हैं। आम तौर पर मुस्लिम समाज को अशरफ, अजलाफ और अरजाल जैसे सामाजिक वर्गों के संदर्भ में समझा जाता है। अशरफ वर्ग में सैयद, शेख, पठान और अन्य उच्च सामाजिक स्थिति वाली बिरादरियां मानी जाती हैं, जबकि अजलाफ और अरजाल वर्गों में पिछड़े और वंचित समुदायों को रखा जाता है।

पसमांदा आंदोलन का उद्देश्य मुस्लिम समाज के इन पिछड़े और वंचित वर्गों को राजनीतिक और सामाजिक प्रतिनिधित्व दिलाना रहा है। बीते कुछ वर्षों में यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति में भी चर्चा का विषय बना है। भाजपा इसी सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखते हुए पसमांदा समुदाय के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाने की कोशिश करती रही है।

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