जनवाणी ब्यूरो |
यूपी: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत एहतियाती हिरासत से जुड़े एक अहम मामले में फैसला सुनाया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने मुल्ला अफरोज की प्रिवेंटिव डिटेंशन रद्द करते हुए कहा कि किसी आरोपी का कबूलनामा अपने आप में NSA के तहत हिरासत में रखने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।
कोर्ट ने कहा कि हिरासत का आदेश पारित करने वाले अधिकारी को मामले से जुड़ी अन्य परिस्थितियों पर भी स्वतंत्र रूप से विचार करना जरूरी है। अदालत के मुताबिक, अफरोज के मामले में संबंधित अधिकारियों ने सभी परिस्थितियों पर पर्याप्त विचार नहीं किया और हिरासत की शक्ति का उचित तरीके से इस्तेमाल नहीं किया गया।
यूपी सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना
- मुल्ला अफरोज के खिलाफ उत्तर प्रदेश पुलिस ने अक्टूबर 2025 में NSA के तहत कार्रवाई की थी। उन पर संभल में नवंबर 2024 में हुई सांप्रदायिक हिंसा से कथित तौर पर जुड़े होने का आरोप था।
- सुप्रीम कोर्ट ने प्रिवेंटिव डिटेंशन के आदेश को गैर-कानूनी ठहराते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। अदालत ने कहा कि इस मामले में हिरासत की शक्ति का इस्तेमाल कानून के अनुरूप नहीं किया गया।
- फैसला सुनाते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता ने अपने लॉ क्लर्क को भी श्रद्धांजलि दी, जिनका निधन उनके 27वें जन्मदिन से चार दिन पहले हो गया था।
क्या है नेशनल सिक्योरिटी एक्ट?
नेशनल सिक्योरिटी एक्ट, 1980 (NSA) के तहत केंद्र और राज्य सरकारों को कुछ परिस्थितियों में किसी व्यक्ति को एहतियाती हिरासत में लेने की शक्ति मिलती है। इसका उद्देश्य ऐसे व्यक्ति को पहले से हिरासत में रखना है, जिसके बारे में अधिकारियों को आशंका हो कि वह भारत की सुरक्षा, राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या अन्य निर्धारित आधारों के लिए खतरा पैदा कर सकता है।
NSA के तहत हिरासत की अधिकतम अवधि सामान्य परिस्थितियों में 12 महीने तक हो सकती है, हालांकि कानून के तहत हिरासत को उससे पहले भी समाप्त किया जा सकता है।
यह सामान्य आपराधिक गिरफ्तारी से अलग व्यवस्था है। NSA के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति के मामले की समीक्षा के लिए Advisory Board की व्यवस्था है, जिसकी अध्यक्षता हाईकोर्ट के मौजूदा या पूर्व न्यायाधीश स्तर के व्यक्ति द्वारा की जाती है।
क्या है पूरा मामला?
मामला उत्तर प्रदेश के संभल से जुड़ा है। नवंबर 2024 में शाही जामा मस्जिद के सर्वे को लेकर इलाके में तनाव बढ़ गया था। यह सर्वे अदालत के आदेश के बाद उस दावे की जांच के लिए किया जा रहा था कि मस्जिद की जगह पहले हरिहर मंदिर था।
24 नवंबर 2024 को सर्वे के दूसरे चरण के दौरान प्रदर्शन कर रहे लोगों और सुरक्षा बलों के बीच झड़प हो गई। हिंसा में चार लोगों की मौत हुई और कई अन्य घायल हुए।
इसके बाद पुलिस ने हिंसा से जुड़े मामलों में कई लोगों के खिलाफ कार्रवाई की। इसी क्रम में मुल्ला अफरोज के खिलाफ भी NSA के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन की कार्रवाई की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का महत्व
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में प्रिवेंटिव डिटेंशन की शक्ति के इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी सामने आई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल किसी व्यक्ति के कथित कबूलनामे के आधार पर NSA के तहत हिरासत का आदेश उचित नहीं ठहराया जा सकता।
हिरासत का आदेश पारित करने वाले अधिकारी को उपलब्ध अन्य प्रासंगिक तथ्यों और परिस्थितियों पर भी विचार करना होगा। मुल्ला अफरोज की हिरासत रद्द करने के साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है।

