Tuesday, May 19, 2026
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एग्रो-केमिकल्स या कृषि रसायन क्या हैं?

एग्रो-केमिकल्स  या कृषि रसायन ऐसे उत्पादों की श्रेणी है, जिसमें सभी कीटनाशक रसायन एवं रासायनिक उर्वरक शामिल होते हैं। यद्यपि ये सभी रसायन किसानों के लिए अत्यंत महंगे हैं फिर भी बेहतर उत्पादन हेतु इनका उपयोग दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। यदि इनका उपयोग सही मात्रा एवं उपयुक्त विधि द्वारा किया जाए तो ये किसानों के लिए बेहतर आय के अवसर प्रदान कर सकते हैं। रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का उपयोग मिट्टी की प्रकृति और स्थानीय वातावरण पर निर्भर करता है। रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से पहले मिट्टी की जांच करवानी चाहिए ताकि केवल ह्यकमीह्ण वाले तत्त्वों का पता लगा कर उनकी भरपाई की जा सके।उदाहरण के लिए यदि मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी है तो इसकी पूर्ति यूरिया द्वारा की जा सकती है ताकि निर्धारित लक्ष्य के अनुसार फसल की उच्चतम उत्पादकता प्राप्त की जा सके।आमतौर पर उपयोग में लाए जाने वाले एग्रो-रसायनों में डाइअमोनियम फोस्फेट, यूरिया, जिंक सल्फेट, एनपीके, पोटाशियम सल्फेट, बोरेक्स, फेरस सल्फेट तथा मेगनीज सल्फेट आदि शामिल हैं। कृषि उपज बढ़ाने में रासायनिक कीटनाशकों की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि इनके उपयोग से उत्पादन बढ़ता है तथा विदेशी जिंसों के आयात में बचत भी होती है। लेकिन इनका प्रयोग देश की खेती के लिए अभिशाप बन चूका है देश की मिट्टी को बर्बार्दी की कगार पर लाकर छोड़ा है क किसानों के आत्महत्या करने के पीछे केमिकल का पूरा हाथ है

कीटनाशकों का उपयोग 

भारतवर्ष में लगभग 600 ग्राम कीटनाशक प्रति हैक्टेयर की ही खपत होती है जबकि विकसित देशों जैसे जापान तथा चीन में यह 12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से भी अधिक है। भारत में कीटनाशकों की खपत कम होने का सबसे बड़ा कारण है छोटे किसान, जिनके पास बहुत कम कृषि योग्य भूमि है। इनकी क्रय शक्ति इतनी नहीं होती कि ये अपने खेतों में उन्नत बीज एवं कृषि रसायनों का प्रयोग कर सकें। कीटनाशकों की सर्वाधिक खपत उत्तरप्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र एवं हरियाणा में होती है। हमारे देश में पंजाब एक ऐसा राज्य है जहाँ किसान हर दिन नए कीटनाशक एवं बीजों की खेती करने में अत्यधिक दिलचस्पी लेते हैं क्योंकि उन्नत कृषि एवं अधिक उत्पादन हेतु इन्हीं का महत्त्व सर्वाधिक आंका गया है।

कीटनाशकों की श्रेणी में वे सभी कृत्रिम रसायन, उपकरण अथवा जीवाणु आते हैं जिन्हें रोग फैलाने वाले कीड़ों एवं परजीवियों को मारने, भगाने अथवा नियंत्रित करने हेतु उपयोग में लाया जाता है। कीटनाशक अपने संगठन के अनुसार कार्बनिक एवं अकार्बनिक प्रकृति के हो सकते हैं। कार्बनिक कीटनाशकों में ओगैर्नो-फोस्फेट, काबार्मेट, थायोसाइनेट, ओगैर्नो-क्लोरीन तथा एंटीबायोटिक आदि सम्मिलित हैं। कीटनाशकों का प्रभाव उनके उपयोग करने की विधि पर निर्भर करता है क्योंकि विभिन्न कीटनाशकों की अवशोषण क्षमता भी अलग-अलग होती है। यह मिटटी के गुणों जैसे इसमें कार्बनिक पदार्थों की मात्रा आदि पर भी निर्भर करता है। कुछ कीटनाशक पावडर के रूप में होते हैं जिन्हें सीधे ही मिट्टी में मिला दिया जाता है। कुछ कीटनाशक स्प्रे किए जाते हैं जो स्थानीय वातावरण एवं सिंचाई व्यवस्था पर निर्भर करता है। डाइथेन एम-45 व जेड-78, फाईटोलान या ब्लिटोक्स-50 कुछ ऐसे स्प्रे हैं जिन्हें फफूंद-नाशक के रूप में उपयोग किया जाता है। कई बार विभिन्न संक्रमणों से बचाव हेतु बीजों को भी रसायनों द्वारा उपचारित किया जाता है ताकि उगने वाले पौधों को रोगों से बचाया जा सके। डाइनिकोलाजोल, प्रोपिकोनाजोल, टेबुकोनाजोल आदि कुछ ऐसे ही रसायन हैं जिन्हें 2 ग्राम या 2 मिलीलीटर प्रति किलोग्राम बीज हेतु उपयोग में लाया जाता है ताकि ये पूर्णतया रोग-मुक्त रहें। देश में हर साल अत्याधुनिक कीटनाशकों का उपयोग बढ़ता जा रहा है। इनका उपयोग पहाड़ी क्षेत्रों में कम परन्तु मैदानी क्षेत्रों में सर्वाधिक होता है। ज्ञात रहे कि मैदानी क्षेत्रों में कीटों का प्रकोप भी अधिक ही होता है क्योंकि यहाँ कि जलवायु इनके जीवित रहने हेतु अनुकूल होती है।

उपयोग के आधार पर एग्रो-रसायन कीटनाशक, फफूंद-नाशक अथवा रोग-नाशक भी हो सकते हैं।कृषि रसायनों को निश्चित मात्रा में पानी में मिला कर बीजों, मिट्टी, सींचित जल एवं फसलों पर डाला जाता है ताकि कीटों, खरपतवार, फफूंद एवं बीमारियों से बचाव हो सके। फसल सुरक्षा रसायन ऐसे कीटनाशक होते हैं जो फसलों पर पनपने वाले कीटों को नष्ट कर देते हैं। फफूंदनाशक एग्रो-केमिकल या तो फफूंद को पनपने से रोकते हैं या इसे पूरी तरह से नष्ट करने में सक्षम होते हैं। बायो-कीटनाशक ऐसे उत्पाद हैं जिन्हें पौधों, जंतुओं, जीवाणुओं तथा कुछ खनिजों द्वारा तैयार किया जाता है। ये बहुत कम मात्रा में प्रभावशाली होते हैं तथा हमारे पर्यावरण को कोई हानि नहीं पहुंचाते। कुछ ऐसे एग्रो-रसायन भी होते हैं जो भण्डारण के दौरान हमारी फसलों को चूहों आदि से बचाते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ रसायन ऐसे भी होते हैं जो पौधों में वृद्धि दर बढ़ाते हैं। दूसरी हरित क्रांति लाने के लिए हमें समन्वित कीटनाशक प्रबंधन योजना पर कार्य करना होगा जिसमें कीटों के नियंत्रण हेतु यांत्रिक, भौतिक, रासायनिक एवं जैविक उपायों को एक-साथ अपनाना होगा ताकि कृषि उत्पादन में अधिकाधिक वृद्धि हो सके।

कीटनाशकों के दुष्प्रभाव 

कई कीटनाशक मिट्टी में मिल कर नष्ट नहीं होते तथा बरसात होने पर भूमि के नीचे चले जाते हैं। इन्हें पौधों की जड़ों द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है, जिससे ये भोजन के द्वारा मनुष्यों के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। कीट-रसायन द्वारा प्रदूषित पौधों से पशुओं और मनुष्यों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कीटनाशकों द्वारा कुछ ऐसे जीव भी नष्ट हो जाते हैं जो हमारी फसलों एवं मिट्टी के लिए लाभदायक होते हैं। कई बार इनके अत्यधिक उपयोग से हमारी बहुमूल्य जैव-विविधता के नष्ट होने का खतरा भी बना रहता है। अत: यथासंभव इनका उपयोग आवश्यकतानुसार सोच-समझ कर ही करना चाहिए ताकि पर्यावरण एवं जीवों को इनके हानिकारक प्रभाव से बचाया जा सके। भारत में सर्वप्रथम उपयोग में लाया जाने वाला कीटनाशक डी।डी।टी। था, जो आज हमारी मिट्टी एवं जल को सर्वाधिक प्रदूषित कर रहा है। भारतीय किसान कीटनाशकों के उपयोग के प्रति अभी अधिक सजग नहीं हैं। इस विषय में पर्याप्त ज्ञान का अभाव, इनका स्वास्थ्य एवं पर्यावरण पर पड़ने वाला दुष्प्रभाव तथा उपयोग में लाते समय आवश्यक सावधानियों का अनुपालन न करने के कारण ये अधिक लोकप्रिय नहीं हैं। कीटनाशकों के उपयुक्त रख-रखाव, प्रबंधन एवं नियंत्रण को एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विषय समझ कर अध्ययन करना चाहिए, अन्यथा इनसे होने वाले लाभों की तुलना में हानियां कहीं अधिक हो सकती हैं।

कीटनाशकों से बचाव जरूरी है 

कीटनाशकों का भंडारण एवं विपणन उपयुक्त एजेंसियों के माध्यम से ही होना चाहिए। यदि इनका उपयोग ठीक से न किया जाए तो ये अन्य वनस्पतियों, वन्य-प्राणियों तथा भूमिगत जल-स्रोतों को भी प्रभावित कर सकते हैं। इनका उपयोग किसी कृषि-विशेषज्ञ की सलाह पर ही करना चाहिए। बचे हुए कृषि-रसायनों को उपयोग के बाद बच्चों की पहुंच से दूर संभाल कर रखें। रसायनों के छिड़काव अथवा उपयोग हेतु विशेष प्रकार के कृषि-यंत्र मिलते हैं जिनसे इस्तेमाल के दौरान न्यूनतम प्रदूषण फैलता है। छिड़काव से पहले किसानों को यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि हवा का रुख कैसा है तथा आस-पास अन्य पशु एवं बच्चे तो नहीं हैं?

कीटनाशकों के संभावित दुरुपयोग की पहचान करना भी आसान है। इनका आवश्यकता से अधिक उपयोग होने पर पत्तियाँ मुरझा जाती हैं तथा पौधे मर भी सकते हैं। किसी भी दुरुपयोग की आशंका को रोकने के लिए प्रभावित स्थान की मिट्टी एवं जल के नमूनों की जांच करवानी चाहिए ताकि प्रदूषण फैलने से रोका जा सके। कीटनाशक खरीदने से पहले उस पर लगे लेबल एवं सील की जांच कर लेनी चाहिए ताकि इसके निर्माता, निर्माण तिथि, विधि एवं इसकी उपयोगिता सम्बन्धी सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त हो सके। जो विक्रेता नकली कीटनाशक बेचते हैं या बिना पेकिंग के देते हैं, उनसे सावधान रहना चाहिए। एक अनुमान के अनुसार आजकल बाजार में मिलने वाले 40% कीटनाशक नकली हो सकते हैं। ये उत्पाद न केवल कीटों को मारने में असमर्थ होते हैं, बल्कि मिट्टी एवं पर्यावरण को भी हानि पहुँचा सकते हैं। कीट-नाशक उपयोग करने के बाद इनकी प्लास्टिक की बोतलों को फैंकना नहीं चाहिए। इन्हें पानी में धो कर ही पुन:चक्रित करने हेतु कबाड़ में भेजना चाहिए। कुछ लोग इन्हें घरेलू उपयोग में लाते हैं जो खतरनाक हो सकता है।

 


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