Wednesday, May 6, 2026
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स्त्रियों को देखने की नजर

29 1वर्ष 2019 के आखिरी महीने में जब देश के कई हिस्से संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ आंदोलित थे, 15 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने झारखंड के दुमका में एक चुनाव रैली को संबोधित करते हुए कहा था, ‘ये जो आग लगा रहे हैं, टीवी पर उनके जो दृश्य आ रहे हैं, ये आग लगाने वाले कौन हैं, उनके कपड़ों से ही पता चल जाता है।’ तब इससे उद्वेलित आंदोलनकारियों ने कई जगह उनके कथन का विरोध करते हुए बिना कपड़ों के प्रदर्शन किए थे। इतना ही नहीं, विधानसभा चुनाव से गुजर रहे झारखंड के मतदाताओं ने भारतीय जनता पार्टी के खाते में शिकस्त लिख डाली थी। लेकिन लगता है, न उन्होंने कोई सबक सीखा, न ही उनकी जमात के दूसरे नेताओं ने। यही कारण है कि उत्तराखंड के नये-नवेले मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत गत 17 मार्च को बाल अधिकारों पर एक कार्यक्रम में कुछ महिलाओं की ‘रिप्ड’ (यानी कुछ जगहों से फटी हुई) जींस से उनके संस्कारों की पहचान करने लगे। खबरों के मुताबिक रिप्ड जींस पर अपने एतराज को वे परोक्ष रूप से जेएनयू विरोध तक भी ले गये। एक दृष्टांत की मार्फत यह कहकर कि उन्होंने हवाई जहाज में अपने बगल में बैठी एनजीओ चलाने वाली जिन बहन जी को गमबूट, रिप्डजींस व कड़ों में देखा और पूछा कि ‘बच्चे साथ में हैं, उन्हें क्या संस्कार दोगी?’, उनके पति जेएनयू में प्रोफेसर हैं।

अफसोस कि इस मामले में इतनी भी गुंजाइश नहीं है कि इसे किसी एक मुख्यमंत्री या मंत्री का ओछापन मानकर आश्वस्त हुआ जा सके, क्योंकि जैसे-जैसे उनकी जमात शक्तिशाली हो़ती गई है, परंपरा से चली आती पितृसत्ता द्वारा, संविधान के शासन के सात दशकों बाद भी देश में जिसकी सत्ता का समूल नाश अभी बाकी है, स्त्रियों को कड़े नियंत्रण में रखकर उनके सारे फैसले खुद करने के पैरोकारों द्वारा गर्व से की जाने वाली इस तरह की टिप्पणियों की बाढ़-सी आई हुई है।

इस सिलसिले में यह तो बताने की बात भी नहीं कि तीरथ सिंह रावत जैसों को महिलाओं के रिप्डजींस पहनने से पितृसत्ता के दिए जिन संस्कारों के विकृत होने का डर सताता है, वही पुरुषों में महिलाओं को सम्मानपूर्वक देखने की दृष्टि के विकास के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा हैं।

चूंकि वे पितृसत्ता और उसके जाए संस्कारों से इस दृष्टि के सम्यक विकास के लिए कहने से परहेज रखना चाहते हैं, रिप्डजींस से उनकी सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उससे वस्त्रित होने के बाद कोई महिला गऊ नहीं रह जाती और पितृसत्ता को चुनौती देती लगने लगती है। उस बराबरी की मांग करती-सी, जो सत्ता उसे देना नहीं चाहती।

अन्यथा इस सवाल का क्या जवाब है कि तीरथ सिंह रावत के तथाकथित संस्कार इतने कैसे बिगड़ गए कि वे किसी महिला से मिलें तो उसके बारे में उसके विचारों या कामों के आधार पर नहीं, घुटनों के खुले या ढके होने के आधार पर धारणाएं बनाएं? एक संपादक ने यह सवाल पूछते हुए ठीक ही अनुमान लगाया है कि साढ़े पांच दशक से अधिक की तीरथ की जीवन यात्रा में उन्हें संस्कारित करने वालों ने अधिकतर साड़ी, सलवार-कमीज, धोती-कुर्ता, शर्ट-फुल पैंट या हाफपैंट ही पहने होंगे। साथ ही उन्हें श्रेष्ठ ग्रंथों से ज्ञान दिया होगा। इंसान की असल पहचान की सीख दी होगी और हिंदू धर्म की शिक्षा-दीक्षा में संत समाज से उनका परिचय कराया होगा।

फिर वे कबीरदास की ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ से अपरिचित क्यों कर रह गए? नहीं रह गए और मीराबाई द्वारा अपने पद में की गई इस घोषणा को भी जाना ‘मैं तो सांवरे के रंग राची। साजि सिंगार बांधि पग घुंघरू, लोक-लाज तजि नाची’ तो रिप्डजींस को लेकर अपनी कुंठा के पार क्यों नहीं जा पा रहे? इसलिए कि उनकी संस्कार-दीक्षा में दोष रह गए हैं तो उन्हें पहले अपने दोष दूर करने चाहिए या दूसरों पर तोहमतें लगानी चाहिए? उन्हें कम से कम इतना तो समझना ही चाहिए कि सारी सामंती, मनुवादी ओर

पितृसत्तात्मक जकड़नों के बावजूद हमारे पुरखों ने अपने वक्त में भेष को उतनी ही तरजीह दी थी, जितने से भीख मिलने में बाधा न आए। कपड़ों के रंग के आधार पर जोगी होने का दावा करने वालों को धिक्कार कर कह देते थे वे कि पहले अपने मन रंगाकर आओ मन न रंगायो रंगायो जोगी कपड़ा! फिर इक्कीसवी सदी के 21 वें साल में किसी मुख्यमंत्री को किसी महिला की उसके पहनावे के आधार पर कदर्थना करने की इजाजत क्यों कर दी जा सकती है? उनसे भले तो उत्तराखंड से योग का व्यापार शुरू करने वाले बाबा रामदेव हैं, जिन्होंने कपड़ों के व्यापार में हाथ डाले तो ‘संस्कारी जींस’ तक पहुंचने में कुछ भी अनुचित नहीं पाया था।

यकीनन, सत्ताधीशों द्वारा ऐसी कदर्थनाओं से यह अफसोस और गहरा होता है कि हमने कैसे संकार्णतावादियों को सत्ता सौंप दी है। लेकिन अगर वे समझते हैं कि इस तरह की ओछी मॉरल पुलिसिंग से वे महिलाओं के सारे संघर्षोंं को निष्फल करते हुए उन पर फिर से अपनी मध्यकालीन बर्बर आचारसंहिता थोपने में सफल हो जायेंगे तो गलती पर हैं।

इस बीच देश की नदियों में जो पानी बह चुका है, उसे किसी भी कीमत पर वापस नहीं लौटाया जा सकता, न ही समय रथ के चक्र को उलटी दिशा में घुमाया जा सकता है। सात दशकों में फूली-फली हमारी लोकतांत्रिक चेतना इतनी छुई-मुई तो नहीं ही हो सकती कि इस तरह के कुछ प्रतिगामी प्रहारों से ही भरभराकर नष्ट हो जाए।

आज की महिलाएं बखूबी समझती हैं कि अहल्या के कुसूरवार इंद्र में उस वहशत के संस्कार किसी रिप्ड जींस पहनने वाली मां से नहीं आए थे। बाद में जिसने उसे बिना कुसूर शिला बन जाने का शाप दिया, उसके संस्कार भी नहीं। इसलिए जहां भी आजादी हासिल है, महिलाएं संस्कारों के नाम पर कोई बंदिश स्वीकारने को तैयार नहीं हैं। ओटीटी प्लेटफार्मों पर तो उन्होंने सती-सावित्री वाले किरदारों का सारा बोझ झटककर नीचे गिरा दिया है।

हां, व्यापक आलोचना के बावजूद न सिर्फ अपने कहे पर अड़े बल्कि एक वीडियो में एक छात्रा के शार्ट्स पर भी एतराज जताते दिख रहे तीरथ सिंह रावत को अंतत: दबाव में ही सही थोड़ी सद्बुद्धि आ गई है और अगर-मगर के साथ ही सही उन्होंने अपनी टिप्पणी पर खेद जता दिया है तो इसे एक शुभ लक्षण के तौर पर लिया जाना चाहिए।

हां, इस खेद प्रकाश से पहले की उनकी हिचक से समझा जा सकता है कि कपड़ों से संस्कार और महिला की इज्जत का संबंध जोड़ने वाली पितृ सत्ताजनित मान्यता की जड़ें अभी भी खासी गहरी हैं और महिलाओं के दुर्भाग्य से उन्हें सत्ताधीशों का भरपूर साथ भी मिल रहा है। साफ है कि इस पोच-सोच के खिलाफ महिलाओं की लड़ाई अभी भी बहुत लंबी है।


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