- हापुड़ रोड की बस्तियों में पसरा सन्नाटा, गत चुनाव में भी गए थे
ज्ञान प्रकाश |
मेरठ: इंसान अपनी जमीन से किस हद तक प्यार करता है उसका जीता जागता उदाहरण हापुड़ रोड स्थित बस्तियों में रहने वाले तीन हजार से अधिक बांग्लादेशी शरणार्थियों को देखकर मिल सकता है। असम और पश्चिम बंगाल में विधान सभा में वोट डालने के लिये पूरी बस्ती खाली हो चुकी है।
हापुड़ रोड पर जमना नगर के पास पेट्रोल पंप के पीछे बांंग्लादेशी शरणार्थियों की बस्ती है। इसमें करीब तीन हजार लोग रहते है। बस्ती में रहने वाले लोग शहर में पन्नी बीनने का काम करते हैं और पेट पालते हैं। गंदगी और पॉलीथिन की झोपड़ियों में रहने वाले यह लोग गरीबी की रेखा से नीचे रह कर जिंदगी गुजार रहे हैं।
इनकी दिनचर्या देखकर कोई भी हैरत में पड़ सकता है। इन गरीब लोगों की अपनी मातृभूमि के प्रति प्यार भी हमेशा कायम रहता है। 2016 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान जब इन लोगों ने असम जाने के लिये तैयारी कर रहे थे तभी इनकी बस्ती में भीषण आग लग गई थी और सैंकड़ों झोपड़ियां जलकर खाक हो गई थी। इसके बाद भी बस्ती के लोग वोट डालने असम गए थे। इस बार भी ऐसा ही हुआ है।

अस्सी वर्षीय अन्नान ने बताया कि बस्ती के करीब तीन हजार लोग असम के लिये निकल गए थे जहां उनको वोट डालना था, इसके बाद काफी लोग पश्चिमी बंगाल भी जाएंगे जहां पर उनके वोट हैं। बस्ती में बसे एक दर्जन बुजुर्ग लोगों ने बताया कि असम में वो लोग कांग्रेस के समर्थन में वोट डालते हैं।
वहां के नेताओं के फोन आने के बाद उन लोगों ने वोट डालने के लिये जाने का मन बनाया था। दरअसल इस बात का खुलासा तब हुआ जब लोग गरीब लोगों को दान करने के लिये बस्तियों में जाते थे। इस बार उनको कोई नहीं मिला। वैसे तो शहर में सात से आठ हजार लोग असम, बंगाल और बांग्लादेश बार्डर पर रहते हैं।
मार्च महीने में इन लोगों के पास दोनों राज्यों से फोन आने शुरु हो गए थे कि वोट डालने आना है। मेहनत मजदूरी करके दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने वाले इन गरीबों ने आपस में पैसा एकत्र करके ट्रेन के टिकट की व्यवस्था की और वोट डालने के लिये चले गए।
हालांकि भरोसेमंद लोगों का कहना है कि इनको राजनीतिक पार्टियों ने मदद का आश्वासन देकर बुलाया है। जाकिर कालोनी और लिसाड़ीगेट क्षेत्र में रहने वाली आबादी इसी कारण से सड़कों पर नहीं दिख रही है और पन्नी चुगने का काम भी नहीं दिख रहा है।

