Thursday, June 4, 2026
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एक माह में मौत की बस्ती बन गए श्मशान

  • सरकारी आंकड़े 170, लेकिन हकीकत में 500 से ज्यादा लोग मरे
  • शहर और देहात के कब्रिस्तान भी दे रहे गवाही

ज्ञान प्रकाश |

मेरठ: माधवपुरम के 80 वर्षीय रामकुमार यादव की यह टिप्पणी कोरोना की दूसरी लहर से हो रही बबार्दी को सटीक दर्शाती है। इनका कहना है आठ दशक पूरे हो गए जीवन मे मौतों का सिलसिला पहले कभी नहीं देखा था। इस वक़्त शहर के श्मशान घाट और कब्रिस्तान मौत की बस्ती में तब्दील हो गए है।

सरकारी आंकड़े भले एक अप्रैल से 13 मई तक 170 मौतों का दावा कर रहे हो, लेकिन हकीकत में यह आंकड़े 500 से ज्यादा मौत की गवाही दे रहे है। गंगा मोटर कमेटी के आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं। कोरोना की दूसरी लहर किस हद तक मौत की ओर ले गई।

सात अप्रैल से लेकर 10 मई तक सूरजकुंड श्मशान घाट पर 50 से अधिक शव रोज जलाए गए। कई दिन तक यह आंकड़ा 60 से 78 तक भी संख्या पहुंची थी। अगर सिर्फ यही आंकड़े जोड़ लिए जाए तो 2000 से अधिक शवों का अंतिम संस्कार हुआ। इसमे दूसरे जनपदों के कोरोना संक्रमित शवों के अलावा अन्य मौतों को हटा दिया जाए तो अकेले अप्रैल में 500 से ज्यादा कोविड मौते हुई है।

दरअसल स्वास्थ्य विभाग मेडिकल में कोरोना से हो रही मौतों को शामिल करता है। निजी अस्पतालों में लोग रोज मर रहे हैं, लेकिन उनकी गिनती इन आंकड़ों में शामिल नहीं होती। स्वास्थ्य विभाग से अलग हटकर जरा नगर निगम के जन्म और मृत्यु विभाग पर नजर डाले तो एक अप्रैल से लेकर 10 मई तक 950 से अधिक लोगों ने प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया हुआ।

शहर के बड़े कब्रिस्तान में से एक बाले मियां के कब्रिस्तान में अब भले शवों के आने की संख्या में थोड़ी कमी आयी हो, लेकिन एक दिन में 38 शव भी सुपुर्दे खाक किये गए हैं। इन कब्रिस्तानों में हालात इस कदर खराब हो गए थे कि कब्र खोदने वालों ने तौबा कर ली थी। इस कारण खुद परिजनों को कब्र खोदनी पड़ी थी। शहर में सूरजकुंड के अलावा कंकरखेड़ा, मलियाना और रिठानी में अंतिम संस्कार होते हैं।

इसके अलावा हर गांव में श्मशान घाट है। वहीं, शहर में पांच बड़े कब्रिस्तान है। छोटे और बिरादरी वाले कब्रिस्तानों की संख्या कहीं ज्यादा है। जिस तरह से निजी अस्पतालों में लोग कोरोना और आॅक्सीजन कंट्रोल न होने के कारण मर रहे हैं। उसके आंकड़े एकत्र करने की जरूरत स्वास्थ्य विभाग जरूरी नही समझता है।

ऐसा कोई निजी अस्पताल नहीं है, जहां रोज मौते न हो रही हो। इतने गंभीर हालात पहले कभी नहीं थे। कोरोना की दूसरी लहर में मौतों के रोज के आंकड़े लोगों को दहशत में डाल रहे हैं। लचर हेल्थ सिस्टम और कालाबाजारी इसमे आग में घी का काम कर रही है।

दूसरी लहर के 42 दिन गुजर जाने के बाद भी लोगों को बेड और आॅक्सीजन न मिलने से श्मशान घाट और कब्रिस्तान मौत की बस्ती में तब्दील होते जा रहे हैं। अगर आपको विश्वास न हो तो सड़कों पर खड़े हो जाइए हर मिनट में एम्बुलेंस का सायरन दहशत पैदा कर देगा।

सूरजकुंड में अपनी मां सोनिया सिंह का अंतिम संस्कार कराने आये अभिषेक सिंह का कहना था कि जितनी देर मां पंचतत्व में विलीन हुई तब तक सात एम्बुलेंस शव लेकर दाखिल हो चुकी थी। गौरतलब है कि एक अप्रैल को कोरोना से एक मौत हुई थी और बुधवार को सर्वाधिक 16 मौते सरकारी आंकड़ों में दर्ज हई हुई थी।


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