
ज्यों-ज्यों भौतिक सुख-सुविधाओं का बाहुल्य होता जा रहा है, त्यों-त्यों हमारी कंचन काया नाना प्रकार के रोगों से ग्रस्त होती जा रही है। नए-नए अन्वेषण हो रहे हैं और नई-नई बीमारियों को चिकित्सक हमारे सामने प्रकट करते जा रहे हैं तथा उनकी चिकित्सा के लिए औषधियां भी प्रस्तुत करते जा रहे हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में इतनी तथाकथित प्रगति होते हुए भी हम प्रतिदिन ऐसे रोगों से ग्रस्त होते जा रहे हैं जो असाध्य हो गए हैं। मनुष्य ने जो नियमित क्रम बना लिया है, वही रोगों के उपचारित न होने, बढ़ने, एक रोग समाप्त होने से पूर्व कई रोगों के उभर आने का मूल कारण है।
यदि मनुष्य स्वयं को पंच तत्वों से उपचारित करने की नैसर्गिक कला सीख ले तो शायद पंचतत्वों से निर्मित इस शरीर को किसी औषधि की आवश्यकता न पड़े। इसी के साथ ही कुछ शारीरिक-परिचालन को अपनाकर भी हम रोगों को दूर रख सकते हैं। इन्हीं क्रियाओं में एक क्रिया ताली-बजाना भी है। प्राचीन काल से मंदिरों में आरती, भजन-कीर्तन, पूजा आदि में हम ताली बजाते आए हैं। ताली बजाने से सिर्फ भक्ति भावना ही दिखाई नहीं पड़ती है अपितु शरीर को स्वस्थ रखने का उत्कृष्ट साधन है।
ताली बजाने से उत्कृष्ट प्रकार का व्यायाम हो जाता है जिससे शरीर की निष्क्रियता समाप्त होकर उसमें क्रि याशीलता की वृद्धि होती है। शरीर के किसी भाग में रक्त-संचार में रूकावट या बाधा पड़ रही हो तो वह बाधा तुरन्त समाप्त हो जाती है। ताली बजाने से शरीर के अंग सही कार्य करने लगते हैं, रक्तवाहिकाएं ठीक रीति से तत्परता के साथ शुद्धिकरण हेतु रक्त को हृदय की ओर ले जाने लगती हैं और उसको शुद्ध करने के अनंतर सारे शरीर में शुद्ध रक्त पहुंचाती हैं।
इससे हृदय रोग और रक्त नलिकाओं में रक्त का थक्का बनना समाप्त हो जाता है और भविष्य में हृदय या धमनियों की शल्य-क्रिया कराने की नौबत नहीं आने पाती। फेफड़ों में शुद्ध आॅक्सीजन की पर्याप्त मात्र होने के कारण तथा अशुद्ध हवा का फेफड़ों से पूरी तरह निष्कासन होते रहने के कारण, फेफड़ों की बीमारियों की भी समाप्ति हो जाती है। रक्त में लाल रक्त कणों की वृद्धि होती है जिससे कई रोगों से मुक्ति मिल जाती है।
किस रोग में कितनी देर तक ताली बजायी जाए या कैसे बजायी जाए, इसका निर्धारण आपकी शारीरिक शक्ति एवं रोग जिसका उपचार किया जाना है, उसका आंकलन करके ही हो सकता है। अपने शरीर की शक्ति का अनुमान लगाकर उन तालियों को जो आपके लिए सहज एवं उपयुक्त हों, अपनाए। इस सहज स्वाभाविक योग से मात्र कुछ दिनों में आप रोगों को दूर करके, शरीर को अधिक न थकाते हुए स्वयं को चुस्त, दुरूस्त एवं तन्दुरूस्त रख सकते हैं।
एक बार सही परामर्श ले लें कि आपको किस प्रकार इस ताली योग-क्रि या को करना है, कैसे करना है, कब करना है एवं कितने समय तक करना है। फिर आप इसका प्रयोग बिना किसी व्यवधान के करते रहें। मात्र एक बार इसकी सही तकनीक समझनी है। फिर तो आप तनाव से मुक्त हो, रोग दूर रख कर, उत्तम स्वास्थ्य द्वारा अपने जीवन का सदुपयोग कर सकेंगे।
परमानंद परम


