Friday, May 1, 2026
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कैंसर मरीजों के लिए उम्मीद की एक किरण

  • 12 साल, 12 दिन बाद मेडिकल में शुरू हुई कोबाल्ड थैरेपी
  • निजी अस्पतालों में थैरेपी की कीमत दो लाख, जबकि मेडिकल में महज 35 रुपये

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: कैंसर के मरीजों के लिए जीवनदाइनी कोबाल्ट थैरेपी मशीन सात साल बाद चलनी शुरू हो गई। मशीन से पहले दिन एक मरीज को थैरेपी का लाभ दिया गया, जिसके बाद सात साल से खामोश पड़ी मशीन एक बार फिर से काम करने के लिए तैयार हो गई। इससे न केवल मेरठ बल्कि पश्चिम उत्तर प्रदेश के सभी जिले के कैंसर मरीजो को लाभ मिलेगा।

वहीं, इस संबंध में रेडियोलॉजी विभाग के हेड डा. सुभाष सिंह का कहना है कि कोबाल्ट थैरेपी के लिए मरीजों को महज एक रुपये की पर्ची लेनी होती है। जिसके बाद मरीज को 35 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से थैरेपी उपलब्ध है। गरीब मरीजों को अब निजी अस्पतालों में महंगी कीमत नहीं चुकानी होगी, जो बड़ी उपलब्धि है।

क्या है कोबाल्ट थैरेपी?

कैंसर के मरीजों की मृत पड़ चुकी कोशिकाओं को साफ करने व अल्सर जैसी बीमारियोें को बढ़नें से रोकने के लिए कोबाल्ट थैरेपी दी जाती है। इस थैरेपी से मरीज के शरीर को कैंसर जैसी घातक बीमारी से हुए नुकसान से बचाया जा सकता है। साथ ही कैंसर को बढ़ने से भी रोका जा सकता है।

बे्रन-ट्यूमर को बढ़ने से रोकने के लिए भी कोबल्ट थैरेपी दी जाती है। जन्म-जात शरीर में बने नसों के गुच्छे को भी इसी थैरेपी से साफ किया जाता है। साथ ही शरीर के किसी भी आर्गन के पास हुए ट्यूमर को भी इसी थैरेपी से बढ़ने से रोका जाता है। जिसके बाद मरीज का इलाज किया जाता है।

निजी अस्पतालों में काफी महंगी है कोबाल्ट थैरेपी

कोबाल्ट थैरेपी की कीमत की बात की जाए तो निजी अस्पतालों में यह दो लाख से अधिक में मिलती है जबकि मेडिकल में यह मात्र 35 रुपये प्रतिदिन की कीमत पर उपलब्ध है। यानी एक माह की थैरेपी की कीमत एक हजार से भी कम है, जबकि निजी अस्पतालों में यह लाखों रुपये होती है। पहले जहां गरीब मरीज कैंसर जैसी बीमारी से अपनी जान गवां देते थे, अब वह मेडिकल कॉलेज में इसका लाभ लेकर अपना पूरा जीवन जी सकते हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इकलौती मशीन

लाला लाजपत रॉय मेडिकल कॉलेज में लगी कोबाल्ट थैरेपी मशीन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में जिनमें नौ जिले शामिल है इकलौती मशीन है। मेडिकल कॉलेज में इन जिलों से बड़ी संख्या में कैंसर के मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं, लेकिन कोबाल्ट थैरेपी मशीन के काम नहीं करने से इन मरीजों कोे हताश होना पड़ रहा था। मगर अब यह हताशा दूर हो चुकी है।

एक साल में 700 मरीज पहुंचते हैं मेडिकल

कोबाल्ट थैरेपी का लाभ लेने के लिए एक साल में 700 से अधिक मरीज मेडिकल कॉलेज पहुंचे हैं। यह ऐसे मरीज होते हैं, जिनकी माली हालत ज्यादा अच्छी नहीं होती और वह सस्ते व सुलभ इलाज की आस में यहां पहुंचते हैं। पिछले सात सालों में पांच हजार कैंसर मरीज कोबाल्ट थैरेपी का लाभ लेने पहुंचे, लेकिन मशीन के नहीं चलने से उन्हें वापस लौटना पड़ा। अब न जानें उन मरीजों में से कितने मरीज जीवित होंगे, कुछ कहा नहीं जा सकता।

2015 में भाभा परमाणु अनुसंधान ने मशीन को बंद करने को कहा था

कोबाल्ट थैरेपी में गामा रेंज का प्रयोग होता है जिसके लिए रेडियो एक्टिव सबस्टैंसों की जरूरत पड़ती है। 2015 में भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र ने कोबाल्ट थैरेपी मशीन को बंद करने को कहा था, क्योंकि उस समय मशीन की पावर कम होने लगी थी। जिसके लिए रेडियो एक्टिव सबस्टैंसों की जरूरत थी जो अब सात सालों के बाद पूरी हुई है।

75 लाख है सोर्स की कीमत

कोबाल्ट थैरेपी के लिए जिस रेडियोे एक्टिव सोर्स की जरूरत पड़ती है उसकी कीमत 75 लाख है। इसे भारत सरकार से लिया गया है, जिसको इंस्टॉल करनें की कीमत ही 15 लाख रुपये आई है। अब मशीन शुरू होने के बाद मरीजों का इलाज किया जा रहा है, पहले दिन बच्चा नाम के मरीज को कोबाल्ट थैरेपी दी गई। इस मरीज के खानें की नली में कैंसर है, जिसको लेकर वह पिछले कई महीनों से मशीन शुरू होने का इंतजार कर रहा था। थैरेपी मिलने के बाद अब इस मरीज का जीवन और बढ़ सकता है।

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