
पूनम दिनकर |
त्वचा की सफाई की ओर विशेष रूप से ध्यान देना आवश्यक होता है। सफाई रखने के लिए यह आवश्यक है कि दिन में दो बार औषधियुक्त साबुन से त्वचा को धोया जाए। तैलयुक्त त्वचा को किसी अत्यधिक प्रभावशाली ब्यूटीग्रेन से धोना चाहिए, जिससे त्वचागत अतिरिक्त तेल निकल जाये और चेहरे के रोमकूप बंद न हो सकें। तैलयुक्त त्वचा के होने पर चर्मरोग विशेषज्ञ से सलाह अवश्य ले लेनी चाहिए, तभी तीव्र औषधियुक्त साबुन का प्रयोग करें। चेहरे पर निकलने वाले ब्लैक हैड्स इस उपचार से साफ हो जाते है तथा भविष्य में नये खूंट नहीं निकलते।
मुहांसे एक ऐसा रोग है जो त्वचा की सुन्दरता पर ग्रहण लगा डालते हैं। यह रोग चमड़ी का सौंदर्य नष्ट कर डालता है। इसका सबसे अधिक प्रकोप चेहरे पर ही होता है। कुछ लोग इसके प्रति लापरवाह रहते हैं और सोचते हैं कि यह अपने आप ही ठीक हो जाएंगे परन्तु समय पर सावधानी न बरतने के कारण कभी-कभी इस रोग का उपचार असाध्य भी हो जाता है। मुहांसे के प्रकोप से सुन्दर त्वचा दाग-धब्बों से भर जाती है और कुरूप हो जाती है।
मुहांसे का प्रभाव शरीर के अन्य भागों जैसे छाती, पीठ और गर्दन पर अधिक न होकर चेहरे पर ही अधिक होता है। इसका कारण यह है कि चेहरे पर तैल-ग्रंथियों का जाल बिछा रहता है जो त्वचा को तैलयुक्त बनाए रखता है। हारमोन असंतुलन के कारण भी मुहांसे निकलते हैं। इसमें सबसे पहले चमड़ों में छोटे-छोटे खूंट निकलते हैं और जब यह खूंट बड़े हो जाते हैं तो यह चेहरे पर स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं। सामान्यत: ये सफेद रंग के ही होते हैं पर जब यह वृद्धि पाते हैं और चमड़ी की सतह पर उभर आते हैं तो बाह्य प्रभाव से काले खूंट बन जाते हैं।
मुहांसे संक्रामक रोग नहीं है। इसका बैक्टीरिया न तो शरीर में फैलता है और न ही शारीरिक संपर्क से दूसरे व्यक्ति को प्रभावित करता है। यह तेल गं्रंथियों के अधिक सक्रिय और असंतुलित हो जाने के कारण होने वाला त्वचा रोग है। जब तेल नलिका में अधिक तेल बनने लगता है तो यह ‘तेल सैक’ यानी थैली में प्रवेश करता है और यह थैली फैलकर अपने में तेल एकत्रित करती रहती है। त्वचा के रोम छिद्र जब अधिक तेल नहीं ले पाते तो वे अधिक दबाव के कारण चौड़े हो जाते हैं और ऐसी स्थिति में चेहरे पर मुहांसे (मुंहासे) निकल जाते हैं।
तेल-ग्रंथि की जमावट से और ग्लैण्ड कैनाल के बंद होने से मुहांसे का आरंभ हो जाता है। जब तेल-ग्रंथि से बहने वाला तरल पदार्थ गाढ़ा हो जाता है तो इससे रोमछिद्र बंद हो जाते हैं तो ऊपर एक कड़ा ढक्कन या आवरण बन जाता है। इसकी ऊपरी नोक जब हवा से प्रभावित होती है तो ‘आक्सीकरण’ के प्रभाव के कारण काली पड़ जाती है। काले पड़ने के बाद ये ‘ब्लैक’हेड्स’ कहलाते हैं। अगर इन काले खंूटों को ऐसे ही छोड़ दिया जाया तो आसपास की त्वचा के तन्तुओं में विकार उत्पन्न होकर त्वचा में सूजन आ जाती है और सूजा हुआ भाग मुहांसे का कारण बन जाता है। इन काले खूटों को निकालने की अपेक्षा तेल ग्रंथि का उपचार करना चाहिए क्योंकि जब तक तैल-ग्रंथियां सक्रिय रहेंगी, ये काले खूंट बनते ही रहेंगे।
मल, मूत्र एवं रक्त का परीक्षण
मल-मूत्र एवं रक्त परीक्षण करा लेने से मुहांसे के संक्रमण या पेट के कीड़ों, पेट की कब्जियत आदि की जानकारियां मिल जाती हैं और उपचार का सही दिशा निर्देश भी प्राप्त हो जाता है।
आहारगत नियंत्रण
असंतुलित भोजन करने से, पानी का कम प्रयोग करने से, चॉकलेट, आइसक्र ीम और अत्यधिक वसायुक्त भोजन करने से भी त्वचा पर प्रभाव पड़ता है। संतुलित एवं सुपाच्य पौष्टिक आहार लेते रहकर मुहांसे पर काबू पाया जा सकता है। विटामिनों से युक्त भोजन, अल्पवसायुक्त भोजन, फल और हरी सब्जियों का आहार में अधिक प्रयोग करना चाहिए। यद्यपि उक्त भोजन से ही मुहांसे पर नियंत्रण नहीं पाया जा सकता तथापि ये मुहांसेरोधी होते हैं।
त्वचा की स्वच्छता
त्वचा की सफाई की ओर विशेष रूप से ध्यान देना आवश्यक होता है। सफाई रखने के लिए यह आवश्यक है कि दिन में दो बार औषधियुक्त साबुन से त्वचा को धोया जाए। तैलयुक्त त्वचा को किसी अत्यधिक प्रभावशाली ब्यूटीग्रेन से धोना चाहिए, जिससे त्वचागत अतिरिक्त तेल निकल जाये और चेहरे के रोमकूप बंद न हो सकें। तैलयुक्त त्वचा के होने पर चर्मरोग विशेषज्ञ से सलाह अवश्य ले लेनी चाहिए, तभी तीव्र औषधियुक्त साबुन का प्रयोग करें। चेहरे पर निकलने वाले ब्लैक हैड्स इस उपचार से साफ हो जाते है तथा भविष्य में नये खूंट नहीं निकलते।
प्रसाधनों के प्रयोग पर रोक
मुहांसे पीड़ित लोगों को तरल प्रसाधन प्रयोग में लाने चाहिए। तेलयुक्त फेस क्र ीम या क्लीनजिंग क्रीम या कोई अन्य चिकनाईयुक्त लोशन नहीं लगाना चाहिए। सौन्दर्य प्रसाधनों के अधिक प्रयोग से रोमकूप बंद हो जाते हैं। परिणाम स्वरूप तैल और कीटाणु चमड़ी के नीेचे एकत्र हो जाते हैं और त्वचा को हानि पहुंचाते हैं। मुहांसे से पीड़ित लोग जब त्वचा को नया निखार देने के लिए फेशियल करवाते हैं तो मुहांसे और भी भयंकर रूप धारण कर लेता है। फेशियल के समय तेलीय क्रीम से मालिश करने से तेल ग्रन्थियां अधिक सक्रिय हो जाती हैं। मुहांसे से पीड़ित लोग यदि फेशियल कराने की अपेक्षा औषधियुक्त मॉश्चराइजर प्रयोग में लायें तो अधिक उचित होता है। फूलों का अर्क, खीरा, शहद आदि का लेप मॉश्चराइजर का काम करता है। फाउंडेशन से रोमकूप बंद हो जाते हैं जिससे त्वचा के लचीले तन्तु नष्ट होने लगते हैं और असमय ही झुर्रियां पड़ जाती हैं।
मुहांसे से पीड़ित चेहरे के लिए शहद, दही और अंडे की सफेदी से बना फेशियल कंडीशनर प्रयोग में लाया जा सकता है। शहद तो प्राकृतिक मॉश्चराइजर होता है। दही में लैक्टिक एसिड होता है जिसके कारण त्वचा का रंग निखरता है तथा अंडे की सफेदी में तन्तु बनाने और त्वचा को कसावदार बनाने वाले तत्व होते हैं।
डर्माब्रेजन उपचार
मुहांसे के निशान को हटाने के लिए डर्माब्रेजन कराया जाता है परंतु इसे किसी कुशल चर्म विशेषज्ञ द्वारा ही कराया जाना चाहिए अन्यथा रोग के बढ़ने और घाव होने की संभावना अधिक रहती है।


