Tuesday, January 20, 2026
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दवाई और पढ़ाई की लड़ाई

Ravivani 33


मेजर हिमांशु |

प्रजातंत्र में जो महंगे अस्पताल या कालेज का खर्चा उठा सकते है और इच्छुक हैं, उन्हें ये सुविधाएं मिलें इसमें किसी को आपत्ति नहीं, पर निजीकरण के लिए सरकारी अस्पतालों और कॉलेजों को बेकार कर दिया जाए या बंद कर दिया जाए और गरीब नागरिक को बीमार अनपढ़ रहने के लिए आजाद, तो यह आपत्ति जनक है। यह निकम्मी या भ्रष्ट सरकारों के लक्षण हैं। रोजी रोजगार, दवाई पढ़ाई छोड़, सम्प्रदाय और जाति पर वोट देने वाला आम नागरिक खुद पथभ्रष्ट है।
मेडिकल कालेज में पढ़ाई के दौरान पूरे साल की हमारी फीस 350 रुपये थी, बिजली पानी सहित। केंद्रीय विद्यालयों के फौजी बच्चों और सरकारी स्कूल के छात्रों को 5 रुपये या 15 रुपये रुपए महीना स्कूल की फीस याद होगी। हम और हमारे जैसे छात्र ऋणी हैं, इस देश व जनता के और शुक्रगुजार हैं, उस व्यवस्था के, जिसमें यह संभव हुआ। संभव हुआ कि सामान्य घरों के बच्चे पढ़ पाए, कुछ बन पाए अपनी योग्यता प्रतिभा के दम पर, वरना एकलव्य का अंगूठा काटना जरूरी नहीं सिर्फ शिक्षा का महंगा होना बहुत है।

लाखों की प्री मेडिकल की कोचिंग और एक करोड़ की एम.बी.बी.एस. काफी है, सामान्य घरों के योग्य प्रतिभावान बच्चों के सपनों की हत्या के लिए। चुनावी टिकट बेचने का आरोप लगभग हर राजनीतिक दल पर लगा है। 5-50 करोड तक टिकट खरीदने वाले नेताओं और एक करोड की एम.बी.बी.एस. करने वाले डॉक्टर से समाज सेवा की उम्मीद बेमानी है। इनके लिए इनका पेशा सेवा नहीं वसूली का धन्धा मात्र है। मोटा निवेश दोनों में है। नतीजन मरीज खेत, प्लाट, मकान, दुकान, किडनी तक बेचकर इलाज करा रहा है और आर्थिक तौर पर कमजोर पृष्ठभूमि के बच्चे का परिवार खेत प्लॉट बेचकर डिग्री पा रहा है।

अमीर परिवार कर भी ले, पर गरीब तो पिस ही जाता है, दवाई में भी पढ़ाई में भी। सरकारी अस्पतालों, स्कूलों, कॉलेजों को मानो एक साजिश के तहत हर पार्टी को सरकार ने निकम्मा बनाया, नकारा साबित किया और समाधान की तरह जनता के सामने निजीकरण को पेश किया। निजीकरण से प्राइवेट अस्पतालों और कालेजों की बाढ़ आई, जिनका उददेश्य सेवा नहीं मुनाफा था, मुनाफा है। अमीर लोगों के पास तो पढ़ाई दवाई में अतिरिक्त और विशिष्ट सेवा लेने की व्यवस्था तब भी थी, आज भी है। कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का आधार ही मुफ्त या सस्ती सुलभ दवाई पढ़ाई है, रोटी कपड़ा मकान की गारंटी है। सभी पार्टियों की सरकारें अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड निजीकरण के नाम पर आसान और मुनाफाखोरी का रास्ता चुनने की दोषी हैं। फिर नकारा निकम्मा बनाकर सरकारी संस्थानों व जमीनों को बेचने का खेल खेला गया। फिर जो जिम्मेदारी सरकार ही लेने को तैयार नहीं प्राईवेट अस्पताल कॉलेज क्यों लेंगे?

बेवजह नहीं आज प्राइवेट संस्थान, अस्पताल और मरीज व जनता अक्सर आमने सामने है। हिंसक घटनाएं तक हुर्इं हैं। सरकारी खर्चे पर डाक्टर या शिक्षक बने नाशुक्रे कहलाते अगर जनसेवा से मुंह मोडते। एक करोड़ खर्च कर डॉक्टर बनने वाले का समाज का शुक्रगुजार होना कतई जरूरी नहीं। समाज का उसमें निवेश नहीं है और खुद के निवेश पर मुनाफा सामान्य बुद्धि की बात है। जहां डाक्टर ‘भगवान’ कहलाता था और दवाई पढ़ाई पवित्र पेशा व सेवा था, वहां आज किसी भी अन्य पेशे की तरह विशुद्ध व्यापार भर है। डॉक्टरों ने ‘दूसरे भगवान’ की पदवी के लिए कभी अर्जी नहीं लगायी। पेशे की पवित्रता और सेवा के कारण उन्हें यह पदवी स्वत: मिली। यदि कोई डाक्टर इस गौरव पूर्ण सामाजिक पदवी के बजाय पैसे मुनाफे को महत्ता देता है तो निजीकरण के दौर में यह अपराध बिल्कुल नहीं बल्कि नितान्त व्यक्तिगत सोच है। एैसे व्यक्ति को समाज मुनाफाखोर कह सकता है पाखंडी नहीं। यही दलील कोचिंग और प्राइवेट ट्यूशन वालों की भी है। उन्हें
यह सच है कि बचपन से पढ़ाई और किताबों तक सीमित रहने और विशेषज्ञता के दौर में अस्पतालों और खास मरीजों में सिमट जाने के कारण बहुत से लोगों से रोज मिलने के बावजूद, व्यस्तता के चलते इनकी सामाजिकता सीमित ही होती है। डाक्टरों व शिक्षकों में दूसरों से ज्यादा पढ़ा लिखा होने का भाव भी रहता है डॉक्टरों और शिक्षकों का सामाजिक सरोकारों से दूर व्यक्तिवादी व विलासी हो जाना समाज हित में नहीं है। जनता का उनके खिलाफ हो जाना तो समाज हित में बिल्कुल नहीं है। पुरानी बात नहीं, जब पैसे का चलन इतना नहीं था। तब शहर गांव में डॉक्टरों और शिक्षकों की इज्जत सबसे ज्यादा थी। इसी चक्कर में हमारी माता जी ने हमें जबरदस्ती डाक्टर बनवा दिया। जनसेवी डाक्टरों और शिक्षकों को तो जनता ने चुनाव तक में बतौर स्वतंत्र उम्मीदवार भी जिताया। आज यदि जनमत इनके खिलाफ है तो यह इनके लिए चिंता का विषय होना चाहिए, आत्म आलोचना का भी। भक्त के गाली देने पर भगवान को भी अपने गिरेहबान में झांक कर देख लेना चाहिए। यह एक सड़ते खदबदाते समाज के भी लक्षण है जो सोशल मीडिया के दौर में और भी मुखर दिखते हैं।
सच यह भी है कि डॉक्टर शिक्षक भी बाल बच्चेदार, घर परिवार और जिम्मेदारियों वाले मनुष्य ही हैं। इनसे इनके रिश्तेदार, परिचित, पड़ोसी, मुलाजिम, मित्र, वीआईपी सब सिर्फ रिआयत की नहीं मुफ्त सेवा की भी उम्मीद करते हैं और वाजिब फीस भी मांग लेने पर इन्हें मानवताहीन, असामाजिक, मुनाफाखोर तक कह देते हैं। हालांकि कोई भी सेवा छोटी या बड़ी इन्हें मुफ्त छोड़िये महंगी ही देता है। नेता, अफसर और उपद्रवी तत्वों को बिल देने की देश में परम्परा है नहीं और गरीब कमजोर को बख्शने की परम्परा अब रही नहीं। कहीं कहीं रोशनी जो बची है, बस वो ही उम्मीद है।
डॉक्टर और शिक्षक जनता का विश्वास तोड़ने के पक्का दोषी हैं। सरकारी नौकरी में कोई डॉक्टर या शिक्षक यदि प्राइवेट प्रैक्टिस या ट्यूशन सरकारी काम की कीमत पर करता है तो यह अनैतिक ही नहीं कानूनी अपराध भी है। अंग चोरी और भू्रण हत्या जैसे जघन्य अपराधों का कोई बचाव संभव नहीं। महंगी खास किताब, दवाई या जांच खास जगह से लेने करवाने को जनता को बाध्य करना एकदम गलत है। अनावश्यक महंगी किताबों, दवाइयों, जांचों में कमीशन खोरी के आरोप बेवजह नहीं हैं। पर इस मकड़जाल और दुगर्ति की नींव डॉक्टर और शिक्षकों ने नहीं खुद जनता, समाज और सरकारों ने रखी है। डॉक्टर शिक्षक तो इस तंत्र के उत्पाद मात्र हैं और कई तो पीड़ित भुक्तभोगी भी जनता की ही तरह। आम नागरिक में भी मुकदमेबाजी की प्रवृत्ति बढ़ी है परस्पर विश्वास घटा है।

सत्ता इकबाल से चलती है समाज लोक लाज से और व्यापार सिर्फ लाभ से नहीं शुभ लाभ से चलना चाहिए। करोड़ों में टिकट खरीद कर, सत्ता में आने वाले नेताओं, विनिवेश और निजीकरण के नाम पर देश की सम्पत्ति बेचने लुटवाने वाली सरकारों, सम्प्रदाय जाति की राजनीति कर सफल होती पार्टियों का क्या ही इकबाल होगा? नेता तो बदनाम हैं ही पर जहां डाक्टरों और शिक्षकों तक के कपडेÞ जनता फाड़ने को आमादा हो वहां क्या ही सामाजिक लोक लाज बची है। सिर्फ हवा वाली पार्टी का टिकट खरीद दल बदल बदल कर, जाना बूझा निकम्मा, ठग, दलाल, अपराधी भी जब चुनाव जीत जाता हो तो सामाजिक विवेक कहां है? हवा, पानी, जमीन दूषित कर, अतिक्रमण कर, सबका स्वास्थ्य खराब करते व्यापार शुभ लाभ नहीं सिर्फ लाभ पर आधारित हैं। शिक्षा जब योग्य और जरूरतमंद को नहीं सिर्फ दाम लगा पाने वाले को ही मिले तो यह व्यापार और बाजार नहीं बाजारूपन ही है। शिक्षा स्वास्थ्य सिर्फ आवश्यक आवश्यकताएं नहीं हैं, मानव सभ्यता की संस्थाएं भी हैं। इनमें संवेदनाहीनता और साख का गिराना सभ्यता का पतन और इन संस्थाओं की मौत है। यही कलयुग है। इस भौतिकवादी आंधी के दौर के लिए ही गीता कुरान में कहा गया है कि जैसे जैसे वस्तुओं की कीमत अहम होती जाएगी, इंसानियत की कीमत कम होती जाएगी। वैसे कहा यह कार्ल मार्क्स ने है और इस सत्य को जानने-मानने के लिए आपका मार्क्सवादी कम्युनिस्ट होना जरूरी नहीं, सिर्फ आप में इंसानियत होना काफी है। मुफ्त पढ़ाई दवाई की बात करना मार्क्सवादी कम्युनिस्ट होना हो न हो, मानवतावादी और राष्ट्रवादी होना जरूर है, क्योंकि बीमार अनपढ़ नागरिक मजबूत राष्ट्र नहीं बना सकते। अच्छे बुरे लोग हर क्षेत्र में हैं पर स्वार्थ और वीभत्स भौतिकतावाद की कोख से जन्मी असामाजिक मनुष्यहीनता का सच ‘क्रिस हेजेज’ की कविता की निम्न पंक्तियों में समाहित है-अब हम ऐसे देश में रहते हैं/जहां डाक्टर स्वास्थ्य को नष्ट करते हैं/वकील न्याय को नष्ट करते हैं/विश्व विद्यालय ज्ञान को नष्ट करते हैं/सरकारें स्वतंत्रता को नष्ट करती हैं/प्रेस सूचनाओं को नष्ट करती है/धर्म नैतिकता को नष्ट करता है/और हमारे बैंक अर्थ व्यवस्था को नष्ट करते हैं।
दवाई पढ़ाई के लिए निजी संस्थानों के खिलाफ आंदोलन बीमारी नहीं, लक्षणों का इलाज है। स्थायी इलाज नीतिगत है, जो लोटे की सफाई से नहीं कुएं की सफाई से ही होगा। पैसे से सत्ता और सत्ता से पैसा के चक्र को तोड़ना होगा। जब तक जनता का वोट नोट से मिलता रहेगा और सांप्रदायिकता व जातिवाद पर पड़ता रहेगा, जनता को भ्रष्ट नेता और निकम्मी सरकारें ही मिलेंगी। इस भ्रष्ट आचरण की कम ज्यादा सभी पार्टियां दोषी हैं, अत: समाधान जनता जनार्दन को ही देना है, राजनीतिक पार्टियों को नहीं।


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