Friday, May 31, 2024
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अपूर्णता में पूर्णता को खोजता उपन्यास

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Ravivani 32


SUDHANSHU GUPT 1ज्ञानप्रकाश विवेक ने लगभग तीन दशक एक साधारण बीमा कंपनी में नौकरी की। उसके बाद वह पूर्णकालिक लेखन में आ गए। वह गजलें लिखते हैं, कहानियां लिखते हैं, उपन्यास लिखते हैं, कविताएं लिखते हैं और आलोचना में भी उनकी गहरी रुचि है। संभवत: पिछले वर्ष उनका उपन्यास ‘डरी हुई लड़की’ आया था। यह उपन्यास दुष्कर्म पीड़िता की कहानी है, जिसमें यह दिखाया गया है कि दुष्कर्म के बाद लड़की से किस तरह बात करनी चाहिए, उसके साथ किस तरह का व्यवहार करना चाहिए, किस तरह उससे डील करना चाहिए। यह उपन्यास खासा पसन्द किया गया। हाल ही में उनका एक और उपन्यास प्रकाशित हुआ ‘व्हीलचेयर’ (वाणी प्रकाशन)। उपन्यास पढ़कर पहले पहल यह लगा कि विवेक ने उपन्यास के लिए व्हीलचेयर को क्यों चुना? जाहिर है व्हीलचेयर कोई बहुत पठनीय, रोचक और रूमानी विषय नहीं हो सकता। बल्कि यह एक ऐसा विषय था जिसमें करुणा और दया का ही अधिक भाव हो सकता है। फिर भी ज्ञानप्रकाश विवेक ने व्हीलचेयर को ही चुना, क्यों चुना यह उपन्यास पढ़कर पता चलता है। उपन्यास की शुरुआत कुछ इस तरह होती है। पैदल चलते आकाश को एक टैम्पो ने ऐसे ‘हिट’ किया कि उछलकर दूर जा गिरा था आकाश। सड़क से अस्पताल और अस्पताल से आईसीयू। चोट पीठ पर लगी थी और स्पाइन डेमेज हो गई थी। कुछ दिन डॉक्टरों की टीम देखभाल करती रही, लेकिन अंतत: आकाश का जीवन व्हीलचेयर तक सिमट गया। फुटबाल का खिलाड़ी आकाश जिसे ‘कम्प्लीट जेंटलमैन’ कहा जाता था, खड़ा होने के लिए भी मजबूर हो गया। धीरे-धीरे सब करीबी लोग आकाश का साथ छोड़ते चले जाते हैं। यहां तक कि आकाश की पत्नी संगीता भी। अब आकाश के पास अपनी जिजीविषा को बनाए बचाए रखने के लिए उन स्मृतियों का सहारा था, जो पत्नी संगीता से जुड़ी थीं। लेकिन आकाश के अपूर्ण हो जाने से उपजी पीड़ा पूरे उपन्यास में बिखरी पड़ी है। इस उपन्यास के कुछ सतरें देखिए:

-संपूर्णता के संसार में एक अपूर्ण शख्स, व्हीलचेयर जैसी सवारी पर चला आया है, कष्ट की गठरी बगल में दबाए।
-कमरे में अजीब-सा सन्नाटा है। जैसे कि कमरा, अपने टूटे हुए वाद्ययंत्रों से खामोशी का दुर्लभ संगीत पैदा कर रहा हो।
-व्हीलचेयर कभी शोकगीत जैसी लगती है, कभी कारुणिक चुटकुले जैसी।
-जिÞन्दगी तमाशे को वो सन्दूक है जो सिर्फ उदासी की चाबी से खुलता है।
-गौर से सुनो! इस अकेलेपन में भी एक राग है, अपने आप से मुहब्बत करने का राग।!
-फर्श पर लुढ़का हुआ कप ऐसे पड़ा है जैसे पृथ्वी को अपनी आत्मकथा सुना रहा है।

उपन्यास पढ़ते समय यह भी लगता रहा कि शायद कोई नाटकीयता पढ़ने को मिले, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मुझे डीएच लॉरेंस के उपन्यास ‘द लेडी चैटर्लीस लवर’ की भी याद आती रही और मैं सोचता रहा कि शायद आकाश की पत्नी पति को व्हीलचेयर पर देखकर किसी और से प्रेम करने लगे। लेकिन उपन्यास में ऐसा भी कहीं नहीं हुआ। पूरा उपन्यास आकाश की दोबारा अपने स्तर पर जीने की जद्दोजहद के ईर्दगिर्द चलता रहा।

आकाश के अकेलेपन में रघु नाम का एक लड़का शामिल होता है। त्रासद यह है कि रघु बोल नहीं पाता। आकाश चाहता है रघु कुछ पढ़ना लिखना सीख जाए। वह सुन तो सकता है लेकिन बोल नहीं सकता। रघु आकाश के घर में रखी किताबें देखकर खुश होता है, वह टीवी देखकर भी खुश होता है। रघु के पास भाषा के नाम पर मौन संकेत भर हैं। दोनों अपनी-अपनी तरह से अपना अपना अकेलापन बांटते हैं। लेकिन यह बंटवारा भी बहुत दिन नहीं चलता। एक दिन रघु के पिता उसे वापस ले जाने के लिए आ जाते हैं। आकाश सोचता है कि अगर रघु चला गया तो वह कैसे रहेगा। रघु तो उसका सहारा है। उसके अकेलेपन का साथी। उसके हर काम का मददगार। पल पल की खबर रखने वाला। जिसके पास आवाज नहीं थी। लेकिन वो आकाश की कितनी सारी बातों को सुन सकता था। रघु को उसके पिता ले जाते हैं और आकाश एक बार फिर अकेला हो जाता है। व्हीलचेयर पर बैठा नायक बगल में दुखों की पोटली उठाए ही जीवन बिता रहा है। दरअसल वह अकेला जीने का अभ्यास कर रहा है। उपन्यास के अंत में आकाश यह भ्रम सा होता है कि संगीता उसके पास आ गई है।

मैं यह निरंतर सोचता रहा कि क्या ज्ञानप्रकाश विवेक सिर्फ व्हीलचेयर पर बैठे इंसान की तकलीफ ही उपन्यास में दर्ज कराना चाहते हैं, क्या हिंदी-उर्दू जुबान में इस तकलीफ को वर्णित करना ही विवेक का मकसद है, या वह उपन्यास में कुछ और कहना चाहते हैं। यह तय है कि ज्ञानप्रकाश विवेक ने जीवित रहने और जिजीविषा को बनाए रखने की आकाश की इच्छा को पूरी तरह व्यक्त किया है। लेकिन उपन्यास बस इतना ही नहीं है। उपन्यास का एक पाठ यह भी हो सकता है कि विवेक व्हीलचेयर पर नायक को बिठाकर ‘वाबी साबी’ के दर्शन के पक्ष में बात कह रहे हों। गौरतलब है कि वाबी-साबी एक जापानी दर्शन है, जो अपूर्णता में सुंदरता खोजने की बात करता है। यह भी संभव है कि ज्ञानप्रकाश विवेक व्हीलचेयर का इस्तेमाल एक प्रतीक के रूप में कर रहे हों। वह यह कह रहे हों कि अकेले हो जाने, व्हीलचेयर तक पहुँच जाने के बावजूद मनुष्य को अपनी जिजीविषा को बनाए रखना चाहिए। या यह भी संभव है कि विवेक व्हीलचेयर के जरिये यह कहना चाहते हों कि हमें अपनी लड़ाई अकेले ही लड़नी होती है, इसमें कहीं कोई साथ नहीं देता। इन्सान हमेशा ‘व्हीलचेयर’ पर ही रहता है!

बेहद पठनीय यह उपन्यास पाठक को भाषाई जादू के बावजूद आपके भीतर एक जीवंतता बनाए रखता है और आपमें ऊर्जा भरता है।


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