Saturday, May 25, 2024
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आयातित नेताओं की भगदड़ से सबक ले भाजपा

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Vikas Sexamaविधानसभा चुनावों से ठीक पहलेउत्तर प्रदेश की योगी सरकार के तीन मंत्रियों समेत कोई दर्जन भर विधायकों के इस्तीफे से भाजपा को खासी फजीहत झेलनी पड़ी है। लेकिन जो नेता भाजपा का साथ छोड़कर जा रहे हैं उनमें से कोई भी भाजपा या संघ की पृष्ठभूमि से नहीं है। 2014 में भाजपा के राजनैतिक उभार के समय ये लोग छद्म धर्मनिरपेक्षता को हथियार बनाकर उसके खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे। इसके बावजूद वैचारिक अन्तर्द्वन्द को दरकिनार कर तात्कालिक चुनावी लाभ की उम्मीद में भाजपा ने इन अवसरवादी नेताओं के साथ गलबहियां की थीं। सरकार पर तीखे हमले करते इन नेताओं की भगदड़ भाजपा नेतृत्व के लिए कड़ा सबक है।
स्वामी प्रसाद मौर्य का यह आचरण उनके राजनैतिक जीवन को जानने वालों के लिए हैरानी का विषय नहीं है। क्योंकि 2016 में बसपा छोड़ते समय उन्होंने मायावती पर टिकट बेचने के गंभीर आरोप लगाए थे। यहां ध्यान रखना होगा कि स्वामी प्रसाद मौर्य को प्रदेश की राजनीति में स्थापित करने में सबसे बड़ी भूमिका बसपा सुप्रीमो मायावती की ही है। बसपा के टिकट पर 1996 में पहली बार विधायक बने मौर्य को 1997 में सरकार बनने पर मायावती ने पहली बार में ही केबिनेट मंत्री बना दिया। इसके बाद जब भी मायावती मुख्यमंत्री बनी तो स्वामी प्रसाद मौर्य को कैबिनेट मंत्री बनाकर उनका कद बढ़ाया। इसके अलावा जब कभी बसपा सरकार बनाने में कामयाब नहीं हुई और उसे प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका निभानी पड़ी तो मायावती ने स्वामी प्रसाद को नेता प्रतिपक्ष का पद सौंपकर पार्टी और सदन में उनकी हैसियत बढ़ाई। लेकिन देश की राजनीति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पदार्पण के बाद 2014 के लोकसभा चुनावों में बसपा एक भी सीट नहीं जीत सकी। इससे पहले 2012 के विधानसभा चुनावों में भी उसका प्रदर्शन निराशाजनक था ऐसे में उन्हें भाजपा अपने और अपने परिवार राजनैतिक भविष्य के लिए सबसे सुरक्षित ठिकाना नजर आया।
योगी सरकार में वन एवं पर्यावरण मंत्री रहे दारा सिंह चौहान और आयुष मंत्री धर्म सिंह सैनी ने भी मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर सपा की लाल टोपी पहन ली है। सपा में शामिल होेते समय इन तीनों ही मंत्रियों ने भाजपा और योगी सरकार को पिछड़ों और दलितों का विरोधी बताया। उन्होंने तीखे हमले बोलते हुए भाजपा को खत्म कर देने तक की डींगे मारी हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य ने तो बड़बोलेपन में यहां तक कह दिया कि वह जब उन्होंने बसपा छोड़ी तो बसपा खत्म हो गई और अब उन्होंने भाजपा छोड़ दी है तो भाजपा खत्म हो जाएगी। लेकिन हकीकत यह है कि जब स्वामी प्रसाद मौर्य बसपा के कद्दावर नेता हुआ करते थे तभी से उसकी राजनैतिक पतन की शुरुआत हो गई थी। 2012 के विधानसभा चुनावों में बसपा को प्रदेश की 403विधानसभा सीटों में से सिर्फ 80 पर सफलता हासिल हुई थी। लोकसभा चुनाव 2014 में बसपा एक भी सीट नहीं जीत सकी। उसके वोट 27.42प्रतिशत से गिरकर 19.77प्रतिशत रह गए। स्वामी प्रसाद मौर्य की व्यक्तिगत राजनैतिक हैसियत का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि 2012 के विधानसभा चुनाव में उनका बेटा उत्कर्ष मौर्य रायबरेली की ऊंचाहार और बेटी संघमित्रा मौर्य अलीगंज सीट से चुनाव मैदान में थे लेकिन वह किसी को भी चुनावी सफलता नहीं दिला सके।
बसपा छोड़कर भाजपा में शामिल हुए दारा सिंह चौहान को योगी सरकार में वन एवं पर्यावरण मंत्री बनाया गया। लगभग हर चुनाव से पहले दलबदल करने वाले दारा सिंह चैहान ने अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत बसपा से की थी। बसपा ने उन्हें 1996 में पहली बार राज्यसभा भेजा। कार्यकाल पूरा होने के बाद 2000 में बसपा ने एक बार फिर उन्हें राज्यसभा भेज दिया, लेकिन राजनीति की ऊंची उड़ान के लिए सत्ता के साथ चलने की चाह में उन्होंने बसपा का साथ छोड़कर उस समय प्रदेश की सत्ता पर काबिज सपा का हाथ थाम लिया। उन्होंने सपा के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा लेकिन कामयाब नहीं हो सके। विधानसभा चुनाव 2007 के बाद प्रदेश में बसपा की सरकार बन गई तो वह एक बार फिर मायावती की शरण में आ गए। उन्होंने बसपा के टिकट पर 2009 में लोकसभा चुनाव लड़कर जीत हासिल की। 2014 में एक बार फिर बसपा के टिकट  पर लोकसभा चुनाव में उतरे लेकिन कामयाब नहीं हो सके। फिर देश और प्रदेश की राजनीति में भाजपा के बढ़ते कद को देख उन्होंने भगवा चोला पहन लिया। सवर्णों से वोट न मांगने को लेकर अपनी अलग पहचान रखने वाले दारा सिंह चौहान केराजनैतिक इतिहास पर गौर किए बिना ही उन्हें पार्टी के पिछड़ा वर्ग मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दे दी गई।
चुनाव से ठीक पहले आयातित नेताओं की भगदड़ से भाजपा नेतृत्च को सबक लेना होगा। उन्हें समझना होगा कि भाजपा का राजनैतिक पटल पर उभार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं की लगभग सौ साल की सतत साधना का प्रतिफल है। इसमें दूसरे दलों से आए नेताओं की कोई उल्लेखनीय भूमिका नहीं है। देश और प्रदेश की सत्ता पर भाजपा के काबिज होने के बाद दूसरे दलों की सरकारों के दौरान सत्ता सुख भोगते रहे नेताओं ने जिला से लेकर उच्च स्तर तक भगवा चोला ओढ़ लिया। सत्ता और नौकरशाही के गठजोड़ से लाभ उठाने के माहिर इन नेताओं ने भाजपा और संघ के समर्पित कार्यकतार्ओं को पीछे धकेल दिया। थानों और तहसीलों में इन्हीं की अपेक्षाकृत ज्यादा सुनवायी हुई। जिससे भाजपा कार्यकर्ता  खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

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