Tuesday, March 24, 2026
- Advertisement -

केन-बेतवा परियोजना से संवरेगा बुंदेलखंड

NAZARIYA


ARVIND JAYTILAKयह सुखद है कि डेढ़ दशक के इंतजार के बाद आखिरकार केन-बेतवा परियोजना को हरी झंडी मिल गयी है। केंद्र सरकार ने इस महत्वकांक्षी परियोजना पर मुहर लगा दी है जिससे बुंदेलखंड में विकास और प्रगति का एक नया सूर्योदय होना तय है। दशकों से पेयजल और सिंचाई संकट का सामना कर रहे बुंदेलखंडवासियों के लिए यह परियोजना किसी वरदान से कम नहीं है। ऐसा इसलिए कि इस परियोजना से कृषि उत्पादन बढ़ेगा और लोगों की आय में वृद्धि होगी। कृषि पर आधारित उद्योग-धंधे विकसित होंगे और अर्थव्यवस्था का पहिया घुमेगा। आय बढ़ने से समृद्धि का नया द्वार खुलेगा। इस परियोजना से मध्यप्रदेश के पन्ना, टीकमगढ़, छतरपुर, सागर, दमोह, दतिया, विदिशा, शिवपुरी तथा उत्तर प्रदेश के बांदा, महोबा, झांसी व ललितपुर जिले जलसंकट से मुक्त होंगे। उल्लेखनीय है कि इस परियोजना को आकार देने के लिए मध्यप्रदेश व उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गत मार्च माह में विश्व जल दिवस के अवसर पर केंद्र सरकार के साथ एक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किया गया। इस समझौते के मुताबिक इस परियोजना पर तकरीबन 44,605 करोड़ रुपए खर्च होंगे। इसका 90 फीसद खर्च भार केंद्र सरकार द्वारा उठाया जाएगा जबकि उत्तर प्रदेश एवं मध्यप्रदेश दोनो ंमिलकर दस फीसद यानी पांच-पांच फीसद खर्च करेंगे।

केंद्र सरकार ने इस योजना को पूरा करने के लिए आठ साल का समय सुनिश्चित किया है। इस परियोजना का उद्देश्य उत्तर प्रदेश के सूखाग्रस्त बुंदेलखंड में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने हेतु मध्यप्रदेश की केन नदी के अधिशेष जल को बेतवा नदी में हस्तांतरित करना है। उल्लेखनीय है कि केन नदी मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र की एक प्रमुख नदी है जिसकी कुल लंबाई 470 किमी है। यह नदी मध्यप्रदेश के कटनी जिले से निकलकर उत्तर प्रदेश में यमुना नदी में मिलती है। केन नदी 292 किमी मध्यप्रदेश में बहती है। लेकिन उसके जल का उपयोग मध्यप्रदेश नहीं कर पाता है। अब केन-बेतवा परियोजना के तहत दौधन के पास एक बैराज बनाकर केन नदी के जल को रोका जाएगा।

दौधन बांध से 221 किमी लंबी एक लिंक नहर का निर्माण कर केन बेसिन के 1074 मिलियन क्यूसेक मीटर अधिशेष जल को बेतवा बेसिन में पहुंचाया जाएगा। बेतवा नदी की भौगोलिक स्थिति पर दृष्टि डालें तो यह मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश दोनों राज्यों में बहती है। इसे यमुना नदी की उपनदी भी कहा जाता है। यह मध्यप्रदेश के रायसेन जिले से निकलकर भोपाल, विदिशा, झांसी, ललितपुर जिलों से गुजरती हुई तकरीबन 480 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए यमुना नदी में मिलती है। अगर यह परियोजना जमीन पर उतरती है तो जल संकट का मार झेल रहे बुंदेलखंड के लोगों की प्यास बुझेगी तथा कृषि योग्य भूमि लहलहाएगी।

उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड का तकरीबन 2.51 लाख हेक्टेयर असिंचित भूमि पानी से संतृप्त होगा। यानी देखें तो इस परियोजना से उत्तर प्रदेश एवं मध्यप्रदेश की तकरीबन 1062 लाख हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी। उत्तर प्रदेश के इन चार जिलों में रहने वाले तकरीबन 65 लाख लोगों की प्यास भी बुझेगी। झांसी को 14.66 एमसीएम, ललितपुर को 31.98 एमसीएम तथा महोबा को 20.13 एमसीएम पेयजल मिलेगा। इस परियोजना के तहत उत्तर प्रदेश में दो बैराज भी बनने हैं जिससे 103 मेगावाट जल ऊर्जा और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकेगा। इस परियोजना से झांसी को प्रेशराइज्ड पाइप सिस्टम एवं माइक्रो-इरीगेशन सिस्टम का फायदा मिलेगा। इस परियोजना का मुख्यालय भी झांसी में
ही होगा।

ध्यान दें तो बुंदेलखंड में पानी की कमी का मुख्य कारण नदी-नीति की विफलता ही रहा है। इस कारण आज तक चंबल, सिंध पहुज, बेतवा, केन, धसान, पयस्वनी इत्यादि उद्गम स्रोत होते हुए भी समूचा विंध्य क्षेत्र जलविहिन है। अगर इन नदियों के जल का संचय और सदुपयोग किया गया होता तो बुंदेलखंड में जल की कमी नहीं होती। लेकिन सच्चाई यह है कि बुंदेलखंड में पानी की समस्या दूर करने के लिए जितनी भी योजनाएं गढ़ी-बुनी गर्इं, वे परवान नहीं चढ़ सकीं। एक आंकड़े के मुताबिक बुंदेलखंड में औसतन 70 हजार लाख टन घनमीटर पानी प्रतिवर्ष वर्षा द्वारा उपलब्ध होता है। लेकिन विडंबना है कि इसका अधिकांश भाग तेज प्रवाह के साथ निकल जाता है।

बेतवा नदी का प्रभाव ठुकवां बांध पर वर्षा ऋतु में 16800 घन मीटर प्रति सेकेंड होता है जो ग्रीष्म में घटकर 0.56 घन मीटर प्रति सेकेंड रह जाता है। इसी तरह पयस्वनी का प्रभाव वर्षा ऋतु में 2184 घन मीटर प्रति सेकेंड रहता है जबकि ग्रीष्म ऋतु में यह 0.42 घन मीटर प्रति सेकेंड रह जाता है। अगर इन प्रवाहों को संचित कर उपयोग में लाया जाए तो इस क्षेत्र की भूमि को लहलहाते देर नहीं लगेगी।

यह बुंदेलखंड की विडंबना है कि एक सांस्कृतिक और सामाजिक एकरुप भौगोलिक क्षेत्र होने के बावजूद यह दो राज्यों में बंटा हुआ है। बावजूद इसके बुंदेलखंड विकास की असिमित संभावनाओं को अपनी कोख में संजोए हुए है। उसके पास इतने अधिक संसाधन है कि वह अपने बहुमुखी उत्थान की आर्थिक व्यवस्था स्वत: कर सकता है। लेकिन यह तभी संभव होगा जब उसका कोख जल से संतृप्त होगा।

उल्लेखनीय है कि बुंदेलखंड की दुर्दशा को ध्यान में रखकर ही 1956 में गठित प्रथम राज्य पुनर्गठन आयोग द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में बुंदेलखंड को अलग राज्य बनाए जाने का वकालत की गई थी। बुंदेलखंड के अलग राज्य का सपना तो दूर है, लेकिन केन-बेतवा परियोजना से उम्मीद की आस बंधी है।


SAMVAD 1

spot_imgspot_img

Subscribe

Related articles

UP Cabinet Decisions 2026: किसानों को MSP में बढ़ोतरी, गोरखपुर बनेगा सोलर सिटी

जनवाणी ब्यूरो | लखनऊ: उत्तर प्रदेश सरकार की कैबिनेट बैठक...

हमारी धार्मिक अवधारणाएं विज्ञान सम्मत

राजेंद्र बज वर्तमान दौर में सारी दुनिया हमारी अपनी गौरवशाली...

गैस को देखने का अपना अपना नजरिया

समस्या गैस की हो, तो प्राथमिक स्तर पर परीक्षण...
spot_imgspot_img