Tuesday, May 19, 2026
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5-जी की राह में चुनौतियां

 

Nazariya 16


Shambhu Sumanइंटरनेट की कनेक्टिविटी और स्पीड को लेकर चुनौतियां दोनों तरफ है। चाहे उपभोक्ता हों या फिर इंटरनेनेट सर्विस प्रोवाइडर कंपनियां! जीवनशैली के लिए अति आवश्यक अंग बन चुके इंटरनेट के बगैर स्मार्टफोन, लैपटॉप, पर्सनल कंप्यूटर, स्मार्टवाच, स्मार्टटीवी, वाईफाई, हैंडफ्री जैसे गजेट्स काम नहीं कर पाते हैं। नतीजा इन से जुड़े तमाम तरह के आनलाइन कामकाज ठप हो जाते हैं। तब ऐसी स्थिति बन जाती है मानो जिंदगी अचानक रूक सी गई हो। डिजिटल दौर की इस समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार की नजर 5जी नेटवर्क की सुविधाएं उपलब्ध करवाने पर काम पर है। इस क्रम में डिपार्टमेंट आॅफ टेलीकम्युनिकेशन (डॉट) द्वारा 13 शहरों में दिसंबर 2022 तक नई सर्विस उपलब्ध करवाने की घोषणा भी कर कर दी गई है। डॉट की आधिकारिक घोषणा के अनुसार राजधानी दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, और कोलकाता के अलावा अहमदाबाद, चंडीगढ़, गांधीनगर, गुरुग्राम, हैदराबाद, जामनगर, लखनऊ, बेंगलुरू और पूणे में इस साल के अंत तक 5जी की सर्विस मिलने लगेगी।

इसकी तैयारी तीन स्तर से की जा रही है। पहली, डॉट के जिम्मे टेक्नॉलाजी उपलब्धता की टेस्टिंग और नेक्स्ट जेनरेश इंटरनेट के स्पेक्ट्रम की निलामी है, जबकि टेलीकॉम रेगुलेटरी आॅथरिटी आॅफ इंडिया यानी ट्राई ने उपभेक्ताओं के लिए उचित प्राइस, ब्रॉडबैंड प्लान, ब्लॉक साइज, नीलामी किए जाने की स्पेक्ट्रम की मात्रा और शर्तों को संभालती है। तीसरा अहम पहलू सर्विस प्रोवाइडर हैं, जिनमें तीन बड़ी कंपनियां एयरटेल, जीयो रिलायंस और वोडाफोन हैं। इन के अतिरिक्त इस टेक्नोलॉजी के गजेट में सबसे अधिक काम आने वाला स्मार्टफोन बाजार में आ चुका है। 5जी नेटवर्क आने की राह में तकनीकी और नीतिगत चुनौतियों का सामना इन तीनों को करना है। दूसरी तरफ इस के हेल्थ पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव, रोगों के फैलाव या हवाई यात्राओं पर इस के असर को लेकर विरोध, अविश्वास और विवाद की भी अप्रत्याशित चुनौतियां हैं। सबसे बड़ी चुनौती इन्फ्रास्ट्रक्चर को दुरूस्त करने की है, ताकि भारत के कोने-कोने तक टॉवर के माध्यम से पर्याप्त मात्रा में नेटवर्क पहुंचाया जा सके। इस मामले में हमारा पिछला रिकार्ड बेहद खराब रहा है।

इसे लेकर सवाल बने हुए हैं कि हमने दो दशक से अधिक समय में 2जी से 4जी तक का सफर पूरा कर लिया, फिर भी स्पीड और कनेक्टिविटी के मामले में कई देशों से पीछे हैं। इस बीच कंप्यूटिंग का तौर-तरीका एडवांस होता चला गया। तारों से नेटवर्क बनाने की जगह क्लाउड कंप्यूटिंग और आटिफिशियल इंटेलीजंस तक का चलन आ गया, लेकिन हमारा टेलीकॉम महकमा दूसरों के भरोसे बैठा रहा। अभी तक अधिकतर जगहों पर अस्थायी टॉवर के जरिए इंटरनेट की सांसें चलने तक ही काम किए गए हैं, जबकि डिजिटल इंडिया की घोषणा 2014 में ही हो चुकी थी। उन दिनों इसके पूरे होने का सपना 4जी नेटवर्क के जरिए देखा गया था। किंतु इसके नेटवर्क मजबूत करने के लिए किए गए सारे प्रयास आधे-अधूरे ही साबित हुए। अब जबकि 5जी नेटवर्क को कई विकसित देशों में उपलब्ध करवा दिया गया है, वैसे में हमारी तैयारी चुनौतियों की भेंट चढ़ती जा रही हैं।

हालांकि टेलिकॉम सेक्टर द्वारा भारतनेट प्रोजेक्ट शुरू की गई है। उस के तहत 5.46 लाख किलोमीटर आॅप्टिकल फाइवर केबल बिछाया जाना है। मंशा 2.52 लाख ग्राम ग्राम पंचायतों तक आॅप्टिकल फाइवर बिछाने और फास्ट स्पीड ब्राडबैंड सर्विस से कनेक्ट करने की है। यह दुनिया की सबसे बड़ी ग्रामीण परियोजना है। इस परियोजना को अक्टूबर 2011 में ही नेशनल आॅप्टिकल फाइबर नेटवर्क के नाम से लांच किया गया था। साल 2015 में इस का नाम बदलकर भारत नेट प्रोजेक्ट कर दिया गया। इसके भरोसे ही 5जी नटवर्क को 2020 में आने की बात की गई थी, तब केंद्र सरकार मोबाइल फोन कंपनियों के कुछ वित्तीय और तकनीकी मामले सुलझाने में उलझी रही भारतीय मोबाइल फोन कंपनियों के संगठन सेलुलर आॅपरेटर्स एसोसिएशन आॅफ इंडिया (सीओएआई) ने बेस कीमतों में अत्यधिक बढ़ोतरी, अपर्याप्त स्पेक्ट्रम और नये बैंड्स की अनुपलब्धता को लेकर सवाल खड़े किए थे।

उसने तब इस वजह से 5जी को अगले पांच साल के लिए टालना की बात तक कही दी थी। हालांकि जब कीमत निर्धारण की समस्या सुलझा ली गई तब क्वांटम का मुद्दा सामने आ गया। आॅपरेटरों ने 100 मेगाहर्ट्ज मागे, लेकिन उन्हें सिर्फ एक मेगाहट्ज ऊंची कीमत 492 करोड़ रुपए पर देने की बात कही गई। आॅपरेटरों की निगाह में यह दोतरफा मुश्किल की तरह है। उन्हें अपने उपभोक्ताओं को कीमत और सर्विस को लेकर संतुष्ट करना है, तो अंतरराष्ट्रीय कीमतों और कर्ज के दबाव को भी कम करना है। भारत में कमर्शियल सर्विस के लिए एक मेगाहर्ट्ज काफी कम है। बहरहाल, एक तरफ सेटेलाइट के जरिए इंटरनेट दूर—दराज के इलाके में इंटरनेट पहुंचाने की तैयारी चल रही है, जबकि दूसरी तरफ इस के बेहतर स्पीड और कनेक्टीविटी को लेकर कई तरह की चुनौतियां बरकरार हैं।

शंभु सुमन


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