Monday, April 22, 2024
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कोचिंग संस्थानों में मानसिक दबाव झेलते बच्चे

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Nazariya 22


VISHESH GUPTAप्रस्तुत लेख में दो कोचिंग संस्थानों की तुलनात्मक प्रकृति, ढांचा, कार्यसंस्क्ृति और इन संस्थाओं का कुल शैक्षिक परिणाम गौरतलब है। एक ओर राजस्थान के कोटा कोचिंग संस्थान हैं जहां प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए देश के उच्च वर्गीय छात्र-छात्राओं की तुलना में मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग के छात्रों की संख्या अधिक है। अवलोकन बताते हैं कि कोटा कोचिंग संस्थान अब नाबालिग छात्रों के लिए आत्महत्याओं का हब भी बन रहे हैं। इन आत्मघाती छात्रों में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश,बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के छात्रों की संख्या तुलनात्मक रूप से अधिक है। प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव के चलते आत्मघात करने वाले छात्रों की संख्या भी इन्हीं प्रदेशों से अधिक रहती है। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में संचालित मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना है, जहां कमजोर व गरीब बच्चों के लिए नि:शुल्क उच्चस्तरीय कोचिंग व्यवस्था है। आज इस योजना के तहत अनेक छात्र बिना कोई शुल्क और बिना किसी दबाव के इस कोचिंग के जरिये उच्च सफलता प्राप्त कर रहे हैं। इस योजना का श्ुाभारम्भ 6 फरवरी 2021 को उत्तर प्रदेश की स्थापना के दिन हुआ था। खासतौर पर यह योजना कमजोर आर्थिक परिवेश के अभ्यर्थियों की कोचिंग सहायता के लिए अधिक है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले ढ़ाई साल में 15 हजार से अधिक अभ्यर्थी विभिन्न प्रतियोगी परीक्षा में सफल होकर सुनहरे भविष्य की ओर अग्रसर हैं। यहां इस कोचिंग में प्रशिक्षण प्राप्त कर 132 से अधिक अभ्यर्थियों ने पीसीएस, आईपीएस औा आईआईटी जैसी कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में बिना किसी मानसिक दबाव के सफलता प्राप्त की है।

जरा कोटा कोचिंग की बात करें तो अभी हाल ही में वहॉ नाबालिग छात्रों में लगातार आत्मघाती रुझान को देखते हुए मुबंई के डाक्टर अनिरुद्ध नारायण मालपानी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करके कोटा में छात्रों में बढ़ती आत्महत्याओं के मद्देनजर वहां तेजी से बढ़ते कोचिंग संस्थानों के नियमन की मांग की है। मगर इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ कहा कि प्रतिर्स्पधा और प्रतियोगी परीक्षाओं की कठिन तैयारी करने वाले बच्चों पर माता-पिता का दबाव बहुत अधिक है। इसी दबाव के चलते उनमें आत्मघाती रुझान देखने को मिल रहा है। मान्य उच्चतम न्यायालय ने यह टिप्पणी ऐसे समय में की है जहां कोटा लगातार कोचिंग हब के साथ-साथ आत्महत्याओं का हब भी बन रहा है। हैरत की बात है कि इस साल 16 से 19 साल के 25 से अधिक छात्र कड़ी प्रतिस्पर्धा का दबाव न झेलने के कारण आतमघात के शिकार हुए। कोटा कोचिंग से जुड़ी पड़ताल बताती है कि वहां आत्महत्या करने वाले 25 छात्रों में 13 नाबालिग बच्चे रहे हैं। शेष 12 छात्रों में चार लड़कियां और आठ युवा छात्र रहे हैं। इनमें से अधिकांश छात्र उत्तर भारत के छोटे गांव व कस्बों के मध्यम परिवारों से आए थे। आज कोटा में लगभग छोटे-बड़े 200 कोचिंग संस्थान हैं, जहां ढाई लाख से भी अधिक छात्र इन संस्थानों में नीट व जेईई जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे हैं। कोटा में रहने के लिए 400 से अधिक होस्टल हैं, जहां दूर-दराज कस्बों से आकर छात्र अकेले इन कमरों में बंद होकर रह जाते हैं। एक-एक छात्र की कोचिंग पर अभिभावक तीन लाख से भी अधिक खर्च करते हैं। देखने में आया है कि छात्रों के अभिभावक कभी कभी यह धनराशि बैंक अथवा अन्य संस्थाओं से ़उधार लेकर चुकाते हैं। अपने परिवारों की कमजोर आर्थिक स्थिति को लेकर भी ये छात्र बहुत दबाव में रहते है। दूसरी ओर माता-पिता भी अपने बच्चे की रुचि और क्षमता को नजरअंदाज करके कड़ी प्रतिस्पर्धा की दौड़ में बच्चे के सबसे आगे निकल जाने का भ्रम पाल लेते हैं। यही से बच्चों पर दबाव बढ़ता है और मान्य उच्चतम न्यायालय तक को ऐसे मामलों में दखल देना पड़ता है।

उत्तर प्रदेश की अभ्युदय योजना भी कोंचिंग देने वाली सरकारी योजना है। मगर फर्क यह है कि यहां कमजोर आर्थिक स्थिति वाले छात्रों को आईएएस, आईपीएस, एनडीएस, सीडीएस व नीट जैसी परीक्षाओं की तैयारी नि:शुल्क कराई जाती है। इस योजना में छात्रों के लिए अग्रणी कोचिंग संस्थानों से जुड़ी अध्ययन सामग्री भी नि:शुल्क उपलब्ध है। इस योजना की खास बात यह है कि इस योजना की स्थापना प्रदेश के 18 मंड़ल मुख्यालयों पर स्थापित विश्वविद्यालयों अथवा वहां के उच्च शिक्षा से जुड़े साधन संपन्न कॉलेजों में कराई गई है। साथ ही विशेषज्ञों के रूप में वहां के अनुभवी आचार्यों के साथ में उस मुख्यालय से जुड़े वरिष्ठ आईएएस व पीसीएस कैडर के अधिकारी भी कोचिगं देने के लिए उपलब्ध रहते हैं। इससे छात्रों को कोचिंग में विषय की विशेषज्ञता ही हासिल नहीं होती, बल्कि उन्हें परीक्षा और साक्षात्कार जैसी प्रक्रियाओं में सफल होने के टिप्स भी आसानी से प्राप्त हो जाते हैं। इसी कारण छात्रों की सफलता का गुणांक भी स्वत: ही बढ़ जाता है। इस कोचिंग योजना में प्रतियोगी छात्र को न तो किराये के मकान में अकेलापन झेलना पडता है और न ही उसके ऊपर किसी भी प्रकार की फीस का दबाव रहता है।

कुल मिलाकर कोटा कोचिंग व्यवस्था की तुलना में उत्तर प्रदेश की अभ्युदय कोचिंग योजना का दायरा भले ही छोटा हो, मगर पिछले ढाई सालों में प्रतियोगी छात्रों को कोचिंग देने के मामले न तो यहां छात्रों में किसी प्रकार के तनाव व दबाव की खबरें आर्इं हंै और न ही आर्थिक विसंगति देखने को मिली है। बाकी प्रदेशों के साथ-साथ कम से कम राजस्थान के कोटा कोचिंग संस्थानों को इस योजना से सीख लेने की आवश्यकता है।


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