Saturday, May 23, 2026
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सीएम ने भेजे आक्सीजन सिलेंडर, हो गए ठेकेदार के

  • कोरोना काल में सीएम ने भेजे थे 150 आक्सीजन सिलेंडर,
  • सिलेंडरों पर ठेकेदार ने लिख दिया अपनी कंपनी का नाम

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: कोरोना की दूसरी लहर के दौरान आॅक्सीजन की भारी कमी हो गई थी। उस समय हालात बेहद गंभीर थे, लोग अपने मरीजों को बचाने के लिए भटक रहे थे। इन हालातों से निपटनें के लिए सीएम ने 2020 में मेरठ मेडिकल कॉलेज को 150 आॅक्सीजन सिलेंडर भेजे थे। यह सिलेंडर आगरा से मेरठ पहुंचे थे, लेकिन अब मेडिकल के ही एक कर्मचारी का दावा है कि इन सिलेंडरों पर मेडिकल में आॅक्सीजन सप्लाई करने वाले ठेकेदार ने अपना कब्जा कर लिया है।

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यह मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। मेडिकल कॉलेज में कोरोना मरीजों के लिए सीएम राहत कोष से 2020 में 150 आॅक्सीजन सिलेंडर आगरा की एक फर्म से आए थे। इन सिलेंडरों को कोरोना संक्रमितों की जान बचाने के लिए भेजा गया था। क्योंकि उस समय आॅक्सीजन की भारी किल्लत हो गई थी

इसलिए शासन स्तर से मेडिकल कॉलेज को यह राहत दी गई थी, लेकिन मेडिकल के ही एक कर्मचारी का दावा है कि जिस ठेकेदार के पास मेडिकल के आॅक्सीजन सिलेंडर भरवाने का ठेका है उसने इन सिलेंडरों पर अपना नाम लिखवा दिया है। इससे अब यह सिलेंडर उस ठेकेदार के ही कहे जा रहे हैं। दावा है कि जिन आॅक्सीजन सिलेंडरों को शासन ने मरीजों के लिए भेजा था।

अब उन सिलेंडरों पर नाइट्रस लिख दिया गया है। साथ ही ठेकेदार की कंपनी का नाम भी लिखा है। जिससे यह सिलेंडर अब मेडिकल कॉलेज के नहीं कहे जा सकते। जबकि जिन सिलेंडरों पर ठेकेदार ने अपनी कंपनी का नाम लिखवाया है। उन पर अब भी वही सन् अंकित है, जिस सन् 2020 में यह सीएम द्वारा भेजे गए थे।

एक सिलेंडर की कीमत 13 हजार रुपये

यह भी दावा है कि जिन आॅक्सीजन सिलेंडरों पर ठेकेदार ने अपना नाम लिखवाकर कब्जा किया है। उनमें से एक सिलेंडर की कीमत करीब 13 हजार रुपये है। ऐसे में 150 सिलेंडरों की कीमत 19 लाख पचास हजार रूपये बैठती है। इतनी बड़ी राशि का घोटाला किया गया है जिसको लेकर यह मामला प्रशासन के भी संज्ञान में है।

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नाइट्रस गैस की रिफिलिंग केवल चंडीगढ़ में होती है, ऐसे में दावा है कि ठेकेदार के पास नाइट्रस गैस के सिलेंडर कम होने पर उसने मेडिकल के आॅक्सीजन सिलेंडरों पर अपना कब्जा जमा लिया। अब चंडीगढ़ से नाइट्रस गैस भरवाते समय वह एक ही बार में बड़ी संख्या में गैस भरवा सकता है।

ये बोले-जिम्मेदार

डा. विपिन धामा, तत्कालीन इंचार्ज एनिस्थिसिया विभाग का कहना है कि उस समय डी-टाइप के आॅक्सीजन सिलेंडर शासन से आए थे, गणेश ट्रेडर्स के पास ठेका है। मेडिकल प्रशासन द्वारा हर समय सिलेंडरों की गिनती की जाती है। कोविड के समय में हमने आॅक्सीजन की कमी नहीं होने दी थी। अब इस प्रकरण में उन्हें ज्यादा कुछ जानकारी नहीं है कि सच क्या है? जो दावा कर रहा है, वह कितना सही है। इसके बारे में हम कुछ नहीं कह सकते।

ठेकेदार गणेश ट्रेडिंग, अजय त्यागी का कहना है कि यह सब कोविड कॉल में हुआ था, उस समय आॅक्सीजन का सारा चार्ज प्रशासन के हाथ में था। आॅक्सीजन को लेकर मारामारी थी, कई कंपनियों के सिलेंडर भरे जाते थे। जिस दौरान सिलेंडरों की पहचान करने के लिए उन पर अपनी कंपनी का नाम लिखा गया था। हमारे खुद 100 सिलेंडर गायब है। जिनका अभीतक पता नहीं चला है। कॉलेज के किसी भी सिलेंडर को हमने नहीं लिया है, कई अस्पतालों में सिलेंडर जाते थे तो ऐसे में यह बदल न जाए उससे बचने के लिए सिलेंडरों पर पहचान लिखी गई है। मेडिकल के नाइट्रस सिलेंडर मेडिकल में ही रखे गए हैं, जिसने भी आरोप लगाया है वह गलत है।

प्रिंसिपल मेडिकल कॉलेज डा. आरसी गुप्ता का कहना है कि मेडिकल के कुछ सिलेंडर है। जिस पर कंपनी ने अपना नाम लिख दिया है। हम अभी इस प्रकरण की जांच करा रहे है, कोविड काल में प्रशासन ने भी अपने स्तर से कुछ सिलेंडर इधर-उधर भिजवाए थे। उस समय हालात काफी खराब थे, जितने भी सिलेंडर भरकर आते थे। उन्हें अलग-अलग जगहों पर भी भेज दिया जाता था। हमने गणेश ट्रेडर्स से पूछा है कि मेडिकल कॉलेज के कितने सिलेंडर कहां-कहां गए हैं। हमें इसकी पूरी जानकारी उपलब्ध करा दे। लगभग 100 सिलेंडर उस समय आए थे।

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