Saturday, June 15, 2024
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लाल किले में दूसरों का भी योगदान

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AMITABH S 1पंद्रह अगस्त मौका है, और दस्तूर भी है, लाल किले पर चर्चा का। 1947 से हर 15 अगस्त की सुबह लाल किला स्वतंत्रता दिवस के जश्न का मुख्य केंद्र जो बन रहा है। ज्यादातर लोग समझते हैं कि आज जैसा लाल किला है, वैसा सारा का सारा मुगल बादशाह शाहजहां ने ही बनवाया था। लेकिन वास्तविकता ऐसी नहीं है। ‘इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर कल्चर हेरिटेज’ (दिल्ली चेप्टर) की किताब ‘दिल्ली द बिल्ट हेरिटेज’ में दर्ज है कि शाहजहां ने 1639 से 1648 के बीच लाल किले के निर्माण के दौरान लाहौरी दरवाजा, दिल्ली दरवाजा, छत्ता चौक, नक्कार खाना, दीवान-ए-आम, मुमताज महल, रंग महल, हमाम, दीवान-ए-खास, हयात बख्श बाग, शाह बुर्ज और सावन-भादो मंडप बनवाए थे। जफर महल, फौजी बैरक, हीरा महल, मोती मस्जिद, दिल्ली दरवाजा व लाहौरी दरवाजा की सुरक्षा दीवारें, भीतर जाने का पक्का पुल वगैरह बाद में दूसरे बादशाहों और हुकूमनामों ने अपने-अपने शासनकाल में बनवाए। लाल किले से सदियों पहले ही फिरोज शाह तुगलक निर्मित बावली आज भी मौजूद है। मुगल काल के दौरान लाल किला लाल किला नहीं, बल्कि ‘किला-ए-मुबारक‘ और ‘किला-ए-शाहजहांनाबाद’ कहलाता था। यह हिंदुस्तान की नई मुगलिया राजधानी का दिल था।

इंटेक की हेरिटेज वॉक एक्सप्लोरर सपना लिडन अपनी किताब ‘दिल्ली 14 हिस्टोरिक वॉक्स’ में लाल किले के बारे में लिखती है, ‘बादशाह शाहजहां ने 16 अप्रैल 1639 को शाहजहांनाबाद के निर्माण की नींव रखी। उस्ताद हामिद और उस्ताद अहमद दो नामी-गिरामी भवन निर्माताओं को जिम्मा दिया गया। सारा निर्माण कार्य मकरमत खान की देखरेख में सम्पन्न हुआ। तब लाल किया बनाने में करीब 1 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। और 17 मई 1648 को लाल किले में शाहजहां का पहला दरबार लगा।’

बनने के दसेक साल बाद लाल किले के सुनहरे दिन लदने लगे। दरअसल, 1658 में शाहजहां को उनके छोटे बेटे औरंगजेब ने बंदी बना कर, खुद की ताजपोशी कर ली। इसी दौरान, शाहजहां के लाल किले में सबसे पहला निर्माण जोड़ा गया मुंहाने पर ही। शुरुआती दौर में, लाल किले का मुख्य दरवाजा ऐन चांदनी चौक के सामने खुलता था। बादशाह औरंगजेब (1658 से 1707) ने 1665 में, असल दरवाजे के आगे बाहरी सुरक्षा दीवार खड़ी करवा दी। इस दीवार से किले में प्रवेश का रास्ता उत्तर दिशा की तरफ से हो गया। आज इसी दीवार के दरवाजे से गुजर कर, लाहौरी दरवाजे तक पहुंचते हैं। हालांकि औरंगजेब के दरवाजे का कोई अलग नाम नहीं है, इसलिए लाहौरी दरवाजा ही कहलाता है।

दरवाजे का नाम लाहौर पड़ा, क्योंकि यह पश्चिम की ओर है और इसी दिशा में मशहूर मुगलिया शहर लाहौर है। नए दरवाजे की दीवार की ऊंचाई 10.5 मीटर है और इसका दरवाजा 12.2 मीटर ऊंचा और 7.3 मीटर चौड़ा है। आगरा में कैद शाहजहां को जब इस बाबत पता चला, तो उन्होंने खत लिखा, ‘तुमने किले को दुल्हन बना दिया और दुपट्टे से ढक दिया।’ उधर दिल्ली दरवाजे के आगे भी ऐसी ही सुरक्षा दीवार औरंगजेब ने बनवाई थी। और तो और, लाहौरी दरवाजे के प्रवेश द्वार से सटा पुल 1811 में बना है। इसी के ऊपर से चल कर, लाल किले में दाखिल होते हैं। पहले यह लकड़ी का था, फिर अकबर द्वितीय के शासनकाल में पक्का बनाया गया। यही पुल आज भी मौजूद है और शाहजहां द्वारा बनाए लाल किले का हिस्सा नहीं था।

लाल किले को मोती मस्जिद का तोहफा भी बादशाह औरंगजेब की देन है। हमाम के पश्चिम में दूधिया सफेद रंग की मोती मस्जिद है। इसे भी शाहजहां ने नहीं, बल्कि औरंगजेब ने अपने निजी उपयोग के लिए बनवाया था। बादशाह शाहजहां दिल्ली दरवाजे से निकल कर, जामा मस्जिद में नमाज अदा करने जाते थे। उनके बेटे औरंगजेब ने ताजपोशी के बाद किले के भीतर ही अपने नमाज अदा करने के लिए मोती मस्जिद का निर्माण करवाया। तमाम पहरों में इबादत करने के लिए उसे अपने शयन कक्ष से महज चंद ही कदम चल कर जाना पड़ता था। मोती मस्जिद में शाही घराने की औरतें भी नमाज पढ़ती थीं।

मस्जिद ऊंचे चबूतरे पर सफेद संगमरमर से बनी है। आमतौर पर बंद रहती है, फिर भी, झरोखों से झांक कर भीतरी सजावट का अंदाजा लगा सकते हैं। नायाब नक्काशी हुई है-फर्श पर ‘मुसाल्लह’ यानी नमाज अदा करने के चकौर गलीचे की शक्ल के डिजाइन बने हैं। आंगन ऊंची दीवारों से घिरा है। आंगन के बीच में फव्वारे वाली हौज-ए-वजु (इबादत से पहले हाथ-पैर धोने की हौज) है। शुरुआती दौर में, मोती मस्जिद के ऊपर ताम्बे के गुंबद थे। 1857 की पहली जंग-ए-आजादी में गुंबदों को भारी नुक्सान हुआ। बाद में, इसे संगमरमर का बनाया गया। खास बात है कि ज्यादातर लाल किला लाल पत्थरों का है, जबकि मोती मस्जिद सफेद।

अन्तिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने भी लाल किले में यहां-वहां अपने निर्माण की निशानियां छोड़ीं हैं। हमाम के उत्तर में, छोटा-सा संगमरमरी मंडप है-हीरा महल। यह बहादुर शाह जफर के शासन काल के दौरान बना है। यहीं मोती महल नाम का एक और मंडप भी बनाया गया। आजादी की पहली लड़ाई के बाद मोती महल हटा दिया गया, लेकिन हीरा महल ज्यों का त्यों कायम है। उधर हयात बख्श बाग के दक्षिण और उत्तर दिशा में सावन और भादो नाम के दो संगमरमरी मंडपों के साथ लाल पत्थरों के निर्मित एक मंडप और है, जो बड़े जलकुंड के मध्य में है। यही जफर महल कहलाता है।

मुगलों ने ही नहीं, अंग्रेजों ने भी लाल किले के भीतर इमारतों का निर्माण करवाया। 1857 की जंग-ए-आजादी के बाद अंग्रेजों ने किले से आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को खदेड़ दिया और अपना कब्जा जमा लिया। फिर अंग्रेजों ने अंदर कई इमारतों को ढहा दिया। जो जगह खाली हुई और पहले से खाली जगह पर, 1860 के दशक में कई बैरक बनाए गए। छत्ता बाजार पार करते ही, बार्इं तरफ बैरक आज भी मौजूद हैं। इन बैरकों में फौजी रहते रहे हैं।

लाल किले में उत्तरी दौर पर, सेंट्रल इंडस्ट्रियल फोर्स के दफ्तर के सामने एक प्राचीन बावली है। ‘इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चर हेरिटेज’ (दिल्ली चेप्टर) के मुताबिक बावली लाल किला बनने से सदियों पहले दिल्ली सल्तनत के सुल्तान फिरोजशाह तुगलक के जमाने की है। उल्लेखनीय है कि फिरोजशाह तुगलक ने 1351 से 1388 के बीच शासन किया था।

दूसरे शब्दों में, बावली लाल किला बनने से करीब 300 साल पहले से मौजूद है। प्राचीन बावली 14 मीटर गहरी अष्टकोणीय दंडाकर संरचना की है। यह 6.1 मीटर चौड़े और 6.1 मीटर लंबे चकौर कुंड से जुड़ी हुई है। उत्तर और पश्चिम में दोनों तरफ मेहराबदार इधर-उधर कमरों वाली सीढ़ियां हैं। बावली पर लगी पट्टिका पर लिखा है कि 1945-46 में, आईएनए के अधिकारियों शाहनवाज खान, पीके सहगल और जीएस ढिल्लों को कैद किया गया था।


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