Thursday, February 22, 2024
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सामाजिक न्याय का शापित नायक

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Nazariya


dr mejar himanshuआजाद भारत के सामाजिक राजनैतिक परिदृश्य को जैसा पूर्व प्रधान मंत्री स्व. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रभावित किया, वैसा किसी ने नहीं, वो भी बहुत ही छोटे कार्यकाल में। आप उन्हें खलनायक बताएं या मसीहा, लेकिन नजरअंदाज नहीं कर सकते, यह तय है। एक दशक में ही बिना किसी खास पृष्ठभूमि के मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश से प्रधान मंत्री, भारत सरकार तक का सफर अपने दम पर करने का एक सफल राजनैतिक कैरियर भी अकेले उन्हीं का है। एक पत्रकार के कड़वे सवाल के जवाब में उन्होंने कहा भी, ‘धक्के से अथवा बने या धोखे से या पुरूषार्थ से महत्वपूर्ण यह नहीं, बनकर क्या किया वो महत्वपूर्ण है।’ इसका जवाब भी उनकी कविता की ही एक पंक्ति में है, ‘उसने जिंदगी गंवा दी, वक्त नहीं गंवाया।’ 2006 में रिलायंस कार पॉवर प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसान आंदोलन के नेतृत्व टैक्ट्रर चलाते हुए मुझे अपने सर पर उनके हाथ का आशीर्वाद मिला। किसानों के साथ जेल में गंभीर धाराओं में जेल में बंद होने पर वो जेल में हमसे वहां मिलने भी आए। बढ़ती उम्र और गिरती सेहत में यह उनकी आखिरी लड़ाई थी। हमारा सौभाग्य हम उस लड़ाई में शरीक थे। पंूजीपतियों के खिलाफ बोलने की नेताओं की हिम्मत नहीं थी और वो हफ्ते में दो-दो बार डायलीसिस और बुखार के बावजूद गांव आकर धरना किसानों के बीच बैठने की दृढ़ इच्छा रखते थे।

उनका अच्छा बुरा सब सार्वजनिक है। उनका अवदान, योगदान, बलिदान सब। मंडल कमीशन के फैसले को चुनावी हथकंडे से आगे ना देख पा रहे विरोधियों को भी वीपी सिंह ने बहुआयामी सामाजिक न्याय से परिचित कराया। भ्रष्टाचार का आरोप उन पर कभी उनके विरोधी भी नहीं लगा पाए और गरीब, कमजोर, वंचित के साथ वो हमेशा खड़े हुए। सवाल यह है कि जिनके लिए उन्होंने जीवन और राजनीति दांव पर लगाए क्या वो उनके साथ खडेÞ हुए या खडेÞ हैं? मंडल के कारण अगड़ों और मन्दिर मस्जिद विवाद में नाराज धर्मांध हिंदू तत्वों की नाराजगी समझ आती है पर उनके बलिदान के लाभार्थी लोगों ने अपनी-अपनी जाति जमात के भगवान पूजने के लिए चुने और वीपी सिंह की कुर्बानी को भुला दिया। ये सभी नायक जातियों के ही नेता बने रहे और कोई बड़ी पहचान, निशान नहीं छोड़ पाए। शरद यादव और रामविलास पासवान की पहचान फिर नहीं चमकी और राजनीति निपटी नहीं तो सिमट जरूर पक्का गई। मुलायम, लालू सिर्फ चुनावी राजनीति के कुशल योद्धा ही बन पाए। मुलायम सिंह क्षेत्रीय नेता ही रह गए और विदा हुए। इन सबने सामाजिक न्याय के मुद्दे पर संघर्ष तो किया पर उसकी पूरी-पूरी सामाजिक राजनीतिक कीमत भी वसूली। कीमत सिर्फ विश्वानाथ प्रताप सिंह ने चुकाई, सामाजिक राजनीतिक और व्यक्तिगत बलिदान देकर। जातिवाद से ऊपर उठकर सामाजिक न्याय के प्रति कर्पूरी ठाकुर जैसे नेताओं की सोच और प्रतिबद्धता बड़ी थी, पर फलक बड़ा नहीं हो पाया। सामाजिक न्याय को अंबेडकर के अगर हम किसी चेहरे में ढालना चाहें, तो वो चेहरा माननीय वीपी सिंह का ही है।

विडम्बना यह कि आज जातिगत जनगणना को सामाजिक न्याय से जोड़कर बात करना फैशन में है, पर सामाजिक न्याय के सबसे बडेÞ चेहरे वीपी सिंह को श्रेय देना नहीं। कांग्रेस का उन्हें कुल द्रोही मान, श्रेय या मान्यता न देना समझा जा सकता है, पर जिनकी राजनीति ही इनके कारण चमकी और जमी उनका अपनी सुविधा से वीपी सिंह भुला देना या दूरी बना लेना, अवसरवाद और राजनीतिक द्वेष ही है। जहां वीपी सिंह जोखिम उठाकर न्याय के साथ थे वही बहुत सी ताकते गुस्से या लालच में इस मुद्दे के पक्ष, विपक्ष में जातिवादी ही थी और है। यही कारण है मंडल सिफारिशों से पिछड़ों को लाभ तो मिला पर जातिवाद घटा नहीं। सामाजिक सद्भाव घटा और जातिगत वोटबैंक उग्र हुआ। आरक्षण का मतलब बहुसंख्यक की समझ में आज भी अवसरों का छिनना और मिलना ही है, वो भी जाति के आधार पर। विघटन अब जमात से जाति और जाति से उपजाति तक का है। मंडल सिफारिशो के 10 वर्ष बाद हालांकि विश्वनाथ प्रताप ने खुद कहा था कि यह कदम सामाजिक न्याय का औजार है, एम्पलायमेंट एक्सचेंज नहीं। अब बात न्यायपूर्ण सहभागिता और प्रतिनिधित्व की नहीं, जनसंख्या के आधार पर अवसरों और नौकरियों के बंटवारे की हो रही है। आज इस सामाजिक न्याय के महामानव की 16वीं पुण्यतिथि पर यदि वह हमारे बीच होते तो सामाजिक न्याय की इस परिभाषा पर वो क्या कहते यह जानना खासा रोचक होता।

अगर सामाजिक न्याय का मतलब, ‘जिसकी जितनी संख्या भारी उतनी उसकी हिस्सेदारी’ बताया जा रहा है तो हमें तैयार हो जाना चाहिए जातियों की अपनी-अपनी जनसंख्या बढ़ाने की होड़ के लिए। हमें बहुसंख्यकवाद को ही प्रजातंत्र का भविष्य मान लेना चाहिए और जो आग जमातों के बीच लगी है, उसे चुनावी नेताओं के हाथों से जातियों और उपजातियों के बीच देखने को भी तैयार रहना चाहिए। आरक्षण का आधार धर्म मजहब आज भले ना हो, लेकिन इस दिशा में कल हो ही जाएगा कि धर्मावलम्बियों की संख्या आरक्षण और हिस्सेदारी का आधार हो। सच्चर कमेटी ने तो मुसलमानों के बहुसंख्यक वर्ग की हालत दलितों से भी खराब आंकी है। शैक्षणिक पिछड़ापन सर्वशिक्षा से मिटता है। मुफ्त या सस्त, शुलभ व गुणवत्तापूर्ण अनिवार्य शिक्षा उसका समाधान है, शिक्षा का निजीकरण नहीं। भारतीय राजनीति और समाज की अद्भुत समझ रखने वाले इस कवि हृदय क्रांतिकारी व्यक्तित्व को उनकी 16वीं पुण्यतिथि पर सादर नमन।


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