Thursday, February 22, 2024
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मृत्यु कर्मकांडों को अल्पावधि का कर देना चाहिए

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डॉ अरविन्द मिश्रा |

अब आज के युग में जहां बेहतर चिकित्सा सुविधायें, इम्युनाईजेशन आदि है, इतने लंबी अवधि के कर्मकांडों का न तो कोई औचित्य है और न ही प्रासंगिकता। इनमें कतर ब्योंत की जरुरत है। आज के जीवन की जरुरतें और आपाधापी भी इतने लंबे सयय तक की परिवार निष्क्रियता के लिए अनुमति नहीं देती। समाज को अब आगे आकर समयानुरुप इन कर्मकांडों को संशोधित कर अल्पावधि का कर देना चाहिए। वही मृतक के लिए मेरी दृष्टि में सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

मृत्योपरांत तेरहवीं का विधान जब हमारे पारंपरिक सोलह संस्कारों में नहीं है तब यह कब और क्यों वजूद में आई? यह एक सहज सवाल है जो मन में उठता रहा है। हां, सोलह संस्कारों में अंत्येष्टि संस्कार है और वह मानव वजूद का आखिरी संस्कार है। उसके बाद धर्मग्रंथों में किसी और संस्कार का प्रावधान नहीं है।हिन्दू कर्मकांड में अंत्येष्टि किस तरह हो, इसका विधान वर्णित है। यह एक दाह संस्कार है जिसमें शव को अग्नि को समर्पित किया जाता है और निर्देश हैं कि शवयात्रा में शामिल सभी जन तब तक तो अवश्य रुकें जब तक शव का आधा हिस्सा जल न जाय।

हां कालान्तर के पुराणों आदि में आत्मा के शरीर त्याग के बाद स्वर्ग /नर्क की यात्राओं का लोमहर्षक वर्णन भी है कि कैसे वह पीब गंदगी और बदबू से बजबजाती एक आकाशीय वैतरणी नदी को पार करते हुये आगे बढ़ता जाता है। अब उस नदी को निरापद रुप से पार कैसे किया जाय, इसके लिये कर्मकांडों में ‘गऊदान’ की व्यवस्था है, अर्थात महापात्र को एक गाय दान में दी जानी है, मृत्योपरांत आत्मा उसकी पूछ पकड़ेगा (आत्मा पुलिंग है) और गाय एक छलांग में वैतरणी पार करा देगी। एक कर्मकांड की मुझे याद है जिसमें महापात्र ने प्रतीकात्मक वैतरणी को भी इतने चौड़े पाट का बना दिया कि बिचारी गाय उसमें गिर गयी। अब मृत की आत्मा का क्या हुआ होगा? जाहिर है ऐसे कर्मकांड महज मूर्खता का परिचय हैं।
गरुड़ पुराण में ही कई अन्य कर्मकांडों का विधान है जिसमें पिंडदान आदि है जिसे प्रेतकर्म कहा जाता है। यह सब आत्मा की शांति के नाम पर करने का जबर्दस्त सामाजिक दबाव होता है। ये इतने सुदीर्घ और शारीरिक श्रम वाले होते हैं कि एक बार इन्हें करते हुये एक व्यक्ति ने आजिज आकर महापात्र को कह डाला था कि ‘अब इसी समय मेरा भी कर्मकांड निपटा दीजिये महराज।’

इसी क्रम में तेरहवीं का भी विधान है। जो ब्रह्म भोज से ब्राह्मण भोज और अब सर्वभोज तक का दर्जा पाता गया है। यह सब आत्मा की शांति के नाम पर है। यद्यपि अब मृत्युभोज के विरुद्ध जन मुखरता हो रही है और हरियाणा में तो 1960 से ही इसके विरुद्ध कानून भी है। राजस्थान में भी इस व्यवस्था का तीव्र प्रतिकार चल रहा है। महाराष्ट्र में मृत्योपरांत सारे कर्मकांड बस तीन चार दिनों में पूरा कर लेने की प्रथा शुरू है।

आखिर यह तेरह दिन के मृत्यु शोक का औपचारिक विधान कब अस्तित्व में आया? मैने इसके लिये जो अध्ययन मनन किया उसका नतीजा यों है – दरअसल विगत सदियों में हैजे और तावन (प्लेग /ब्लैकडेथ) जैसे भयावह संक्रामक रोगों से गांव के गांव साफ हो जाते थे। पूरा परिवार काल के गाल में समा जाता था।

हमारे पुरखों ने एक बात पर गौर किया कि छुआछूत से विकराल रुप से होने वाले इन संक्रामक रोगों से बचने का केवल एक ही भरोसेमंद तरीका है कि मृत व्यक्ति के संपर्क में आये लोगों से कम से कम तेरह दिनों की दूरी बना ली जाय। यानि पुरखों ने अपने प्रेक्षणात्मक ज्ञान से संक्रामक रोगों से बचने के ‘क्वैरेन्टीन’ के कथित आधुनिक तरीके की जानकारी कर ली थी। मतलब तेरह दिनों में रोगाणु की मारकता खत्म हो जाती थी। तब तक ‘सूतक’ रहेगा यानी लोग मृतक के संपर्क में आये लोगों से तेरहवें दिन तक दूरी बनाये रखेंगे और तेरहवें दिन ही मिलेंगे जुलेंगे। और इस तरह तरह तेरहवीं जैसी व्यवस्था वजूद में आई होगी।

यह भी सावधानी बरती जाती थी कि मृत व्यक्ति के ज्यादा घनिष्ठ संबंध में रहे सबसे उम्रदराज व्यक्ति /बेटे को भी परिवार से दूर रखने और खान पान की व्यवस्था रखी जाती थी ताकि लोग उसके करीब न जांय। लोकाचार में ऐसे व्यक्ति को मृतक का दाग लेने वाला कहा जाता है, मतलब वह दागी (स्पाटेड) है उससे दूर रहिये। यह सब तामझाम तेरहवें दिन समाप्त होता था।

अब आज के युग में जहां बेहतर चिकित्सा सुविधायें, इम्युनाईजेशन आदि है, इतने लंबी अवधि के कर्मकांडों का न तो कोई औचित्य है और न ही प्रासंगिकता। इनमें कतर ब्योंत की जरुरत है। आज के जीवन की जरुरतें और आपाधापी भी इतने लंबे सयय तक की परिवार निष्क्रियता के लिए अनुमति नहीं देती। समाज को अब आगे आकर समयानुरुप इन कर्मकांडों को संशोधित कर अल्पावधि का कर देना चाहिए। वही मृतक के लिए मेरी दृष्टि में सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


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