Tuesday, May 21, 2024
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नए कानून का न हो दुरुपयोग

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Samvad 15


Dr Shrinaath Sahayराज्य सभा ने बुधवार को दंड प्रक्रिया (शिनाख्त) विधेयक, 2020 को पारित कर दिया। दो दिन पहले लोकसभा ने इस विधेयक को मंजूरी दी थी। इस विधेयक की वजह से जांच अधिकारियों को दोषियों और अपराध के मामले में गिरफ्तार लोगों और बंदी बनाए गए लोगों की पहचान के लिए बायोमेट्रिक और उनके विभिन्न शारीरिक विवरणों के नमूने लेने का प्रावधान किया गया है जिसकी विपक्ष ने जनविरोधी कहते हुए आलोचना की है। हालांकि सरकार का कहना है कि इस विधेयक को दोषसिद्धि की दर बढ़ाने और कानून का पालन करने वाले नागरिकों की अधिकारों की रक्षा करने के इरादे से लाया गया है। इसमें दो राय नहीं कि वक्त के साथ अपराध का चेहरा बदला है और शातिर तौर-तरीकों से अपराधी पुलिस को चकमा देने की कोशिश में रहते हैं।

समय के साथ अपराध की प्रकृति बदलने से उत्पन्न चुनौती का मुकाबला करने के लिए अब पुलिस अपराधियों व संदिग्ध लोगों की जैविक कुंडली बना सकेगी। आधुनिक विज्ञान तथा नई तकनीक से अपराधियों पर जल्दी शिकंजा कसा जा सके, इसकी तैयारी में सरकार जुटी है। काबिलेगौर हैं कि दक्षिण अफ्रीका, ब्रिटेन, आॅस्ट्रेलिया, कनाडा, अमेरिका जैसे देशों में ज्यादा कड़े कानून हैं, यही वजह है कि उनकी सजा की दर बेहतर है।

यह विधेयक औपनिवेशिक कानून (कैदियों की पहचान अधिनियम, 1920) की जगह लेगा जो अपराध और कानून को लागू कराने में तकनीकी प्रगति के लिहाज से अपर्याप्त है। यह विधेयक कानून प्रवर्तन एजेंसियों को आपराधिक मामले में दोषियों और अन्य व्यक्ति की पहचान और जांच के लिए डेटा एकत्र करने और रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने के लिए अधिकृत किया जाता है।

इसके प्रावधान के मुताबिक डेटा में, हिरासत में रखे गए, गिरफ्तार किए गए या फिर दोषी ठहराए गएलोगों के बायोमेट्रिक के साथ-साथ शारीरिक और जैविक नमूने भी शामिल होंगे। इसके तहत उंगलियों के निशान, हथेली के निशान, पैरों के निशान, फोटो, आंखों की पुतली, रेटिना के माप लेने के साथ ही लिखावट के नमूने का विश्लेषण करने की कानूनी मंजूरी भी मिलेगी।

नए विधेयक में संग्रह किए जाने वाले डेटा के प्रकार में विस्तार किया गया है और साथ ही किन-किन व्यक्तियों से विवरण मांगा जा सकता है, उनके दायरे में भी विस्तार किया गया है। साथ ही यह बात भी तय की गई है कि डेटा कौन-कौन संग्रहित कर सकता है। 1920 के कानून के तहत जो डेटा एकत्र किया जा सकता था वह उंगलियों के निशान, पैरों के निशान और तस्वीरों तक ही सीमित था। पहले बताए गए विवरणों के अलावा, नए विधेयक में व्यवहार संबंधी विशेषताओं (हस्ताक्षर, लिखावट) और आपराधिक दंड संहिता की धारा 53 और 53 ए के तहत की जाने वाली जांच (रक्त, बाल के नमूने, वीर्य, स्वैब, डीएनए प्रोफाइलिंग जैसे विश्लेषण) में भी विस्तार किया गया है।

एक और महत्त्वपूर्ण अंतर यह है कि पहले के कानून में पुलिस को उन लोगों से डेटा एकत्र करने की अनुमति थी जो एक वर्ष या उससे अधिक समय के लिए कठोर कारावास की सजा वाले दंडनीय अपराधों के लिए दोषी हों या गिरफ्तार किए गए हों। नया विधेयक किसी भी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए या गिरफ्तार किए गए लोगों पर लागू होता है। साथ ही यह महिलाओं तथा बच्चों के खिलाफ अपराध करने पर गिरफ्तार किए गए किसी व्यक्ति से जबरन जैविक नमूने जुटाने की अनुमति देता है।

इसके अलावा अगर किसी अपराध में न्यूनतम सात साल कैद की सजा है तो उसमें भी यह विधेयक लागू होगा। सरकार की दलील है कि यह विधेयक जांच एजेंसियों की मदद करने के साथ ही अभियोजन प्रक्रिया को गति देगा, जिससे अदालतों में अपराधी का दोष साबित करने की दर में वृद्धि होगी। साथ ही इसके जरिये अपराधियों का डेटा देर तक सुरक्षित रखा जा सकेगा ताकि भविष्य में होने वाली आपराधिक घटनाओं में उनकी संलिप्तता का खुलासा शीघ्र किया जा सके।

दरअसल, 102 साल पहले बने बंदी शिनाख्त अधिनियम की अपनी सीमाएं थीं, जिसके जरिये सीमित जानकारी ही मिल पाती थी। वहीं दूसरी ओर अपराधियों के अपराध करने के तौर-तरीके आधुनिक तकनीक के जरिये घातक साबित हो रहे हैं जिन्हें एक सदी पुराने कानून के जरिये नियंत्रित करना कठिन है। ऐसे में नये विधेयक के कानून बनने के बाद अदालत में अपराधियों के अपराध साबित करने के प्रतिशत में वृद्धि होने की उम्मीद है।

इसमें आधुनिक प्रौद्योगिकी सहायक बनेगी। इस विधेयक को हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल की अनुमति मिलने के बाद ही लोकसभा में पेश किया गया है। वैसे अब तक लागू बंदी शिनाख्त अधिनियम 1920 में दोषी, गिरफ्तार व पकड़े गये ऐसे लोगों की जांच का अधिकार पुलिस व जेल अधिकारियों को था, जो या तो दोषी न सिद्ध किये गये हों अथवा महिला या बच्चों के खिलाफ किए गए संगीन अपराध में गिरफ्तार न हुए हों।

दरअसल, पुराने कानून में सिर्फ फिंगर व फुटप्रिंट लेने की ही अनुमति थी। इतना ही नहीं, अभियुक्त के फोटो लेने के लिये मजिस्ट्रेट की अनुमति लेनी होती थी। निस्संदेह, इस विधेयक के कानून बनने से पुलिस के अधिकारों में वृद्धि होगी, जिसको लेकर विपक्षी दल चिंता जता रहे हैं। उनका मानना है कि क्रिमिनल प्रॉसिजर बिल-2022 से नागरिक अधिकारों का हनन होने की आशंका बनी रहेगी।

अपराध जब समाज में चौतरफा मुसीबत का सबब बनता है, तब इसे खत्म करने के लिए कानूनों को सशक्त करना ही होता है। यह बात शायद ही कोई भूल पाया होगा कि वर्ष 2018 में जम्मू-कश्मीर के कठुआ में एक नाबालिग बच्ची की दुष्कर्म के बाद हत्या कर दी गई थी। इसके अलावा भी दूसरे कई मामले तेजी से उभार लेने लगे। यही वह वक्त था जब डाटाबेस को तैयार करने का निर्णय लिया गया।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2016 में वर्ष 2015 की तुलना में महिलाओं के प्रति अपराध और दुष्कर्म के मामले में 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। कोरोना महामारी से प्रभावित वर्ष 2020 के दौरान अपराधों के मामले में 2019 की तुलना में 28 फीसद की वृद्धि दर्ज हुई।
इसमें दो राय नहीं कि बदलते वक्त के साथ अपराध का चेहरा बदला है, जिसके लिए सख्त कानून जरूरी हैं लेकिन आम नागरिक के अधिकारों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो। फिलहाल अंग्रेजी हुकूमत के समय बने मौजूदा कानून में अब खामियां आ चुकी थी। तकनीकी रूप से बहुत कुछ बदल चुका है।

ऐसे में घिसे-पिटे तौर-तरीके के तहत बढ़ते अपराध पर लगाम लगाना मुश्किल तो है। बावजूद इसके विपक्ष की उन बातों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जो मूल अधिकार के अंर्तनिहित बिंदु उन्होंने उठाए हैं। हालांकि कानून कितने भी सशक्त क्यों न हो, जब तक उसका सही अनुपालन संभव न किया जाए, तब तक देश और समाज को न तो पूरा न्याय मिलता है और न ही सुशासन को मजबूती।


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