Wednesday, September 22, 2021
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Homeसंवादमंत्रालयों में राष्ट्रभाषा का प्रयोग सुनिश्चत हो

मंत्रालयों में राष्ट्रभाषा का प्रयोग सुनिश्चत हो

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उत्तर प्रदेश में हिंदी रूपी खड़ी बोली ने भले ही आधार पाया हो लेकिन आज अपने आंगन में न रो पा रही और न ही मुस्करा पा रही है। हिंदी को एक आधार देने में हिंदी साहित्य सम्मेलन, हिंदुस्तानी एकेडमी, नागरी प्रचारणीय सभा, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान तथा केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा साहित अनेक संस्थान हैं। हिंदी संस्थान के आकार लेने के पूर्व सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ने हिंदी के विकास के लिए अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थ  भाषाई सर्वेक्षणों के साथ-साथ त्रिपथगा नामक पत्रिका का प्रकाशन किया था। इस पत्रिका जैसी एक भी पत्रिका प्रदेश का कोई संस्थान आज तक नहीं निकाल सका। हिंदी भले ही अपने ही घर में बेगानी नजर आए लेकिन तथ्य बताते हैं कि भारत के बाहर 165 विश्वविद्यालयों में हिंदी के अध्ययन और अध्यापन की व्यवस्था है। आधुनिक अद्यौगिक विकास के प्रमुख केंद्र के रूप में उभर रहे भारत में औद्योगिक उत्पादन का वर्चस्व कायम करने के लिए दुनिया भर के बड़े-बड़े उत्पाद निर्माता अपनी बात हिंदी में कहने के लिए विवश हुए हैं। दुनिया भर में इंटरनेट का उपयोग करने वाले दस करोड़ लोगों में 40 फीसदी हिंदी भाषी हैं। हिंदी अनेक प्रादेशिक भाषाओं को सहोदरा और एक विस्तृत विविधता भरे प्रदेश में अनेक देशज बोलियों के साथ पलकर बड़ी हुई है। अवधी, ब्रज, भोजपुरी, मगही, बुंदेली, बघेलखंडी आदि उसकी धूल में खेलने वाली चिर सहचारियां हैं।

इनके साथ कछार और खेतों, मचान और झोपड़ियों, निर्जन और जनपदों में घूम-घूमकर उसने उजले आंसू और रंगीन हंसी का संबल पाया है। हिंदी के प्रादेशिक और भारतीय रूप से भी चर्चा के विषय बन रहे हैं। आज हिंदी में साहित्य सृजन करने वालों में कोई बिहार का मगही भाषी है, कोई मथुरा का ब्रज भाषी।

परंतु बुंदेलखंडी बोलने वाले राष्ट्रकवि मैथिलीशरण, वैसवाड़ी बोलने वाले कविवर निराला और कुमाऊंनी बोलने वाले सुमित्रानंदन जी क्या समान रूप से हिंदी के वरद पुत्र नहीं कहे जाते। यदि हिंदी को बिहार हिंदी अवधी हिंदी, बुंदेली हिंदी नही बनाया जा सकता है तो उसका कारण हिंदी का वह सोशिष्ट रूप और मूलगत गठन है, जिसके बिना कोई भाषा महत्व नहीं पाती।

इंदौर में आयोजित अंग्रेजी हटाओ सम्मेलन में पूर्व राष्ट्रपति स्व. ज्ञानी जैल सिंह द्वारा व्यक्त यह कथन अंग्रेजी ने राम को रामा और कृष्ण को कृष्णा बना दिया सिर्फ शब्द उच्चारण भेद को ही इंगित नहीं करता बल्कि हमारे नैतिक पतन को भी इंगित करता है।

कितने शर्म की बात है हमारे मार्गदर्शक भगवान राम और भगवान कृष्ण को अंग्रेजी ने कितना उपभ्रंश रूप में प्रस्तुत किया जबकि हम स्वर उच्चारण को ही ईश्वर आराधना एवं मंत्र विज्ञान में महत्वपूर्ण मानते हैं। मध्य प्रदेश के दमोह जिले में अंग्रेजी माध्यम से स्कूल सेंट जॉन की कक्षा तीन में पढ़ने वाली मानसी अपने साथियों से हिंदी में बात कर रही थी।

हिंदी बोलता देख अध्यापक ने उसकी पिटाई कर दी। अध्यापक का कहना था कि स्कूल परिसर में हिंदी में बात करना मना है। हिंदी में शपथ लेने के सवाल पर महाराष्ट्र असेंबली के भीतर मनसे विधायकों ने समाजवादी पार्टी के एमएलए अबू आजमी को पीटा था। तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सख्त लहजें में टिप्पणी की थी-‘यह मुल्क, संविधान और राष्ट्रभाषा की अस्मिता का मामला है…हिंदी की बेइज्जती बर्दाश्त के बाहर है….।’

उत्तर प्रदेश को हिंदी का हृदय-प्रदेश कहा जाता है। उत्तर प्रदेश में हिंदी भाषा, साहित्य और इसके सृजनकारों की स्थिति सम्मानजनक बनाने के लिए तेजी के साथ कार्य हुआ है।

देश के अन्य प्रदेशों की सभी हिंदी अकादमियां/संस्थान केवल मात्र अपने-अपने प्रदेश की सीमाओं में रहने वाले साहित्यकारों के हितार्थ कार्य करती हैं-उनकी कृतियों के प्रकाशन में आर्थिक सहायता देती हैं, भाषा व साहित्यिक आयोजन करती हैं व प्रदेश में होने वाले ऐसे ही आयोजनों में अपना सहयोग प्रदान करती हैं, प्रदेश के साहित्यकारों को ही सम्मान/पुरस्कार देती हैं, प्रदेश से बाहर के लोगों को बिल्कुल भी नहीं। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान देश भर के साहित्यकारों को सम्मान/पुरस्कार देती है।

उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी प्रदेश में संगीत और नाटक को संरक्षण देने के लिए इस अकादमी का गठन हुआ, लेकिन बुंदेली, भोजपुरी, अवधी तथा ब्रज भाषा के लोकसंगीत तथा नाटकों की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई है।

मध्य प्रदेश में अलखनन्दन ने नटबुंदेली भाषा में नाटक रचकर सारी दुनिया में बुंदेली भाषा का डंका बजाया था। लेकिन उत्तर प्रदेश में ऐसा प्रयास क्यों नही हो सका? बुंदेली लोक नृत्य राई से लेकर स्वाग, नौटंकी, चेता, विराह, कजली, फागे, लेद, ढिमरयाई जैसे गीत संगीत के अनेक पक्ष उत्तर प्रदेश की धरती पर मौजूद हैं, लेकिन अकादमी इनके उत्थान के लिए कुछ भी नहीं कर सकी।

आज भी हम अच्छे ज्ञान के लिए अंग्रेजी का सहारा क्यों लेते हैं? यह प्रश्न 1875 के अप्रैल अंक ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ में भारतेंदु द्वारा एवं विधिपत्रिका ‘नीतिप्रकाश’ के प्रकाशन के पूर्व छापा गया विज्ञापन ‘हिंदी में बहुत से अखबार हैं, पर हिंदुस्तानी लोगों को उनसे कानूनी खबर कुछ नहीं मिलती है और न हिंदी में से स्पष्ट होता है। जो हालत 137 वर्ष पूर्व थी, वह आज है।

आज समय रहते हिंदी प्रदेशों के मुख्यमंत्री केंद्र सरकार पर दबाव डालें कि केंद्र सरकार दोनों सदनों में तथा विभिन्न मंत्रालयों में राष्ट्रभाषा का प्रयोग सुनिश्चित करे तथा राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त करे।

साथ ही हिंदी के साथ प्रादेशिक भाषाओं के प्रति उचित सम्मान प्रदान करे। आज हमें हिंदी दिवस पर शपथ लेनी होगी कि हम अंग्रेजी रूपी चेरी को राष्ट्रभाषा सिंहासन से उतार कर हिंदी कोे उसकी जगह प्रतिष्ठित करेंगे।


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