Friday, May 1, 2026
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स्वास्थ्य के प्रति पढ़े-लिखे भी कम लापरवाह नहीं

 

Sehat


आधुनिक युग में चिकित्सा सेवा जरूर आधुनिक हो गई किन्तु स्वस्थ समाज का निर्माण नहीं हो पाया। उल्टे नई-नई बीमारियों ने आक्रमण कर समूचे विश्व को चौंका दिया। पहले लोग चिकित्सा सेवा के उपलब्ध न होने से असामयिक मौत का शिकार होते थे। आज बेहतरीन चिकित्सा सेवा उपलब्ध होते हुए भी लोग आकस्मिक मौत का शिकार हो ही रहे हैं।

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आज युवा वर्ग बुढ़ापे की बीमारियों से जूझने को बाध्य है। स्कूली उम्र में फास्ट फूड की आदत, युवावस्था में गुटखा, खर्रा, तंबाकू, सिगरेट से दोस्ती और कॉलेज छोड़ते-छोड़ते बीयर-विस्की से दोस्ती अब आम बात हो गई है।

करियर के प्रति सजग रहने वाली युवा पीढ़ी अपने ही स्वास्थ्य के प्रति उतनी अधिक लापरवाह क्यों होती जा रही है, यह चिन्तन का विषय है। एक तरफ युवतियां स्लिम जोन से हैल्थ क्लब तक जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाली युवतियों में ड्रग्स का सेवन एक भयावह समस्या का रूप धारण कर चुका है।

बढ़ती हुई स्वच्छंद प्रवृत्ति और गिरता हुआ स्वास्थ्य

समय से पहले और भाग्य से ज्यादा किसी को न मिला है और न ही मिलने की संभावना है। बच्चे टीवी से आज ऐसे चिपक गए हैं मानो वही उनकी दुनिया है, और कुछ है ही नहीं। प्रतिदिन आधे घंटे से ज्यादा टीवी देखना बच्चों के लिए घातक है लेकिन स्थिति यह है कि वे आधा-एक घंटे से ज्यादा पढ़ना नहीं चाहते। तीन से चार घंटा टीवी देखना जरूर पसंद करने लगे हैं। सोने में सुहागा बच्चों को उनके पालक ने खतरे की घंटी बजाने वाला मोबाइल फोन भी पकड़ा दिया है।

धूम्रपान की लत या लात?

सिगरेट तो लोग ऐसे पी रहे हैं मानो अमृत का रसपान कर रहे हैं। दारू-शराब भी लोग पानी की तरह पीने लगे हैं। खान-पान में मिर्च-मसाले वाला तैलीय पदार्थों का सेवन बढ़ रहा है। पौष्टिक तत्वों का भोजन में अनुपात घट रहा है। जंक फूड के चलन ने तो रही सही कसर भी पूरी कर दी। भारी नाश्ते की जगह लोगों ने हैवी लंच और डिनर की आदत पाल रखी है।

सोना ही तो है अत: खींचकर खाओ। मोटापा बढ़ रहा है और बढ़ रहे हैं दिल के रोग। कोलेस्ट्रॉल बढ़ रहा है। डायबिटिज तो अब बच्चों को भी सताने लगा है। लिवर और किडनी समय से पहले खराब हो जाना आम बात हो गई है। यही वजह है कि 30 से 40 के बीच मरने वालों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है।

कैल्शियम की कमी से जहां हड्डियां कमजोर हो रही हैं वहीं बाल भी सफेद हो रहे हैं। नमक का बढ़ता हुआ प्रयोग कितना नुकसानदेह है, जानते हुए भी पढ़े-लिखे लोग नमक ज्यादा खाएं तो इसे उनकी नासमझी ही तो कहना पड़ेगा। लापरवाहियां बढ़ रही हैं।

जानबूझ कर जीवन से खिलवाड़

सभी पढ़े-लिखे भलीभांति जानते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं, क्या खाना चाहिए और क्या नहीं। कैसा खान-पान होना चाहिए। कैसी जीवनशैली होनी चाहिए, यह सब कुछ स्कूली शिक्षा के दौरान ही प्राप्त हो जाता है। बावजूद उसके हम अपनी जिंदगी से खिलवाड़ करने का कोई भी अवसर गंवाना नहीं चाहते। स्वयं का इलाज स्वयं करना, डॉक्टर से परामर्श बगैर ही दवाएं लेना, फिर पूरा कोर्स किये बिना ही दवा का सेवन बंद कर देना हमारी आदत बनती जा रही है।

बीमारी के उग्र रूप धारण करने तक दवा न खाने की जिद भी महंगी है। सौ बचाने के चक्कर में लाखों गंवाना पड़ता है। जान जाती है सो अलग। इलाज से परहेज बेहतर है। अनपढ़, गरीब, असहाय अथवा मजबूर इंसान इलाज करवाने से कतराए और जागरूकता के अभाव में स्वास्थ्य से खिलवाड़ करे तो बात समझ में आती है किंतु पढ़ा लिखा जागरूक इंसान भी लापरवाहियां बरते तो यही लगता है कि हम दुर्भाग्य के काल से गुजर रहे हैं।

विलासितापूर्ण जीवन जीने की चाहत

ऐशो-आराम की जिंदगी किसे रास नहीं आएगी। आज कल तो साधु-संत भी भौतिकवाद से निकटता किये हुए नजर आने लगे हैं। सुख-सुविधाएं जुटाने की स्पर्धा घातक सिद्ध हो रही है। आमदनी अठन्नी खर्चा रुपया कहावत चरितार्थ हो रही है। किश्तों में सब कुछ पाने के चक्कर में हम अनावश्यक कर्जग्रस्तता के शिकार होते जा रहे हैं।

घर को साफ-सुथरा रखना अलग बात है और इंटीरियर डेकोरेशन के नाम पर घर को शोरूम बनाने की बढ़ती हुई प्रवृत्ति भी घातक है। अनावश्यक सामान बटोर कर हम अच्छे खासे मकान को गोदाम बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। बेडरूम को मिनी थिएटर बना कर हमने पहले ही देर रात तक बेवजह जागने की बीमारी पाल रखी है। घंटों टी.वी. देखने का ही परिणाम है कि नेत्ररोग बढ़ रहे हैं। स्मरण शक्ति भी दिनों दिन कमजोर होती जा रही है।

मोबाइल से नजदीकियां कम खतरनाक नहीं

मोबाइल फोन का दुरुपयोग सर्वत्र जारी है। राह चलते हुए भी मोबाइल पर बातें करना, गाड़ी चलाते समय मोबाइल पर लगातार बातें करना। समय मिला नहीं कि मोबाइल से खेलना शुरू हो जाना भी स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ ही कहा जाएगा। स्कूली विद्यार्थियों द्वारा किए जा रहे शर्मनाक किस्से भी स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रहे हैं। पढ़े-लिखे ही मोबाइल का दुरुपयोग ज्यादा कर रहे हैं। गर्दन के रोग बढ़ रहे हैं। मोबाइल फोन ने ही हमें झूठ बोलने की कला भी सिखाई है। अंत में इतना ही कहना चाहूंगा कि आपका स्वास्थ्य आपके हाथ है। स्वास्थ्य से खिलवाड़ न ही करें तो अच्छा होगा। भूलिये मत-जान है तो जहान है।

राजेन्द्र मिश्र ‘राज’


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