लागू करते समय जीएसटी का फायदा गिनाया गया था और अब उसी को कम करके फायदा बताकर गिनाया जा रहा है। पूरी सरकार विधायक, मंत्री और संतरी सब लाभ बता -बता कर अघा रहे हैं। बाजार में टकला इंसान परेशान है, क्योंकि शैम्पू बड़ा सस्ता और सरसों का तेल महंगा है। दाल-चावल के जुगाड़ में बिगड़ रहा माहौल है। कितने लोग हैं, जिनकी महत्त्वाकांक्षा होती है कि जीएसटी की बीमारी से न मरें, पर सरकार अब पता चल गया कि लोग गरीबी से मर रहे हैं। इसलिए जीएसटी को कम किया गया है। सांसद भैया दहाड़ दिए कि तीन हजार का कपड़ा पंद्रह सौ में ले जाएं। जीएसटी हटने से सारी वस्तुएं आधी दाम पर बिक रही हैं। इससे बाजार में बूम आ गया, लेकिन दाम के दावा में जमीन-आसमान का अंतर है। बेचारे मध्यम वर्गीय मायूस होकर लौटे। गरीब तो खैर पहले से ही मायूस है। माननीय है तो कुछ भी बके, लेकिन बुके देकर ही स्वागत होगा। जीएसटी स्लेब की जानकारी भले न हो लेकिन उसका फटाखा फोड़ना बनता है। भले उनके विवेक का घंटा बज जाए।
युवा रोजगार मांगने गए तो पुराने जीएसटी को हटा के सस्ता का मस्का लगा दिया है। युवा खुशी से झूम उठे। लेकिन पढ़े-लिखे युवा भांप गए। विपक्ष भी उन्हें भांप गए। रोजगार मांगने वाले और देने वाले एक-दूसरे के चाल-चरित्र बखूबी पहचानते हैं। फिर भी दोनों पक्षों को अपना कर्तव्य तो निभाना ही है। वैसे तो जीएसटी टैक्सों के मारे मर रहे हैं। किसी ने तो सोचा, जीएसटी की बीमारी मध्यम वर्ग के लिए बड़ी खराब है। बीमारियां बहुत देखी हैं-डेंगू, हार्टअटैक, कोरोना और कैंसर; जिनसे लोग मरते हैं। मगर यह जीएसटी की कैसी बीमारी है, जिससे मध्यम वर्ग मर रहा था! गरीब तो पहले से ही भूख-प्यास से मर रहा है। इस कलमुंहे जीएसटी के हटने से माननीय पूरी तरह से स्वस्थ और प्रसन्न हैं। तो क्या इस बीमारी में गरीब को मजा आता है? यह अच्छी लगती है, जिससे गरीब का बैंक बैलेंस तगड़ा हो जाता है।
भयंकर महंगाई कर दीजिए और गरीब से पूछिए फायदा मिला तो पहले जान लीजिए कि सरकारी कर्मचारियों का महंगाई भत्ता मिलता है। क्या इत्ता सरकार को पता नहीं है? सरकार समझती है महंगाई बित्ताभर की है। गरीब आदमी मरता है तो मरे, महंगाई की बला से। कभी-कभी नुमाइंदों की बेईमानी की बीमारी से भी मरा जाता है। फ्री का राशन लेने में बेईमानी घातक नहीं होती, बल्कि संयम से साधी जाए तो लाभवर्द्धक होती है। विपक्ष जिनने पहले भ्रष्टाचार को समर्पित कर दिया वे सब रो रहे हैं।अब दूसरी पार्टी आदर्श लेकर सत्ता में है। पहले वाले भ्रष्टाचार में गए ही क्यों? उनका भ्रष्टाचार आदर्श है। क्योंकि ज्यादातर दूसरे दल से भागे हुए हैं। तरह-तरह के टैक्स में तरह-तरह के दुख हैं। एक अपने जीवन-स्तर को सुधार न कर पाने का दुख है, एक विलासिता का सुख न भोग पाने का दुख है। माननीय का अलग ही दु:ख है। जीएसटी के दायरे में रहने वाले या बाहर वाले दुखों को लेकर मध्यम वर्ग असमंजस में हैं। इधर जीएसटी का तड़का और उधर नुमाइंदो का अंग फड़का है।

