- जून माह की गर्मी से हाल बेहाल, सूरज की तपिश ने लोगों को झुलसाया
जनवाणी संवाददाता |
मोदीपुरम: जून माह में गर्मी का प्रकोप लगातार बढ़ रहा है। गर्मी कम होने का नाम नहीं ले रही है। मंगलवार को भी पारा 43 डिग्री के पार पहुंच गया है। जिसके चलते लोग पसीना पसीना हो गए सूरज की तपिश के साथ गर्मी की सुबह से ही शुरुआत हुई। जो देर शाम तक गर्मी का प्रकोप देखने को मिला। मौसम विशेषज्ञों की माने तो उनका साफ कहना है कि अभी दो-तीन दिन गर्मी का प्रकोप और रहेगा गर्मी के साथ-साथ लू के थपेड़े भी लोगों को परेशान करेंगे। इसलिए इस मौसम में सावधानी बरतनी की बेहद आवश्यकता है।
अपने घरों से कम से ही बाहर निकले अन्यथा घरों के अंदर ही कैद रहे। राजकीय मौसम वैधशाला पर मंगलवार को दिन का अधिकतम तापमान 43.1 डिग्री एवं न्यूनतम तापमान 28.0 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। अधिकतम आर्द्रता 45 एवं न्यूनतम आर्द्रता 21% दर्ज की गई। हवा का रुख सुबह शांत रहा दोपहर और शाम में छह किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से आंका गया। सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के मौसम वैज्ञानिक डा. यूपी शाही का कहना है कि अभी मौसम में गर्मी का प्रकोप रहेगा। जिसके चलते अगले दो-तीन दिन गर्मी का भयंकर रूप देखने को मिलेगा।
मासूमों पर कहर बरपा रही गर्मी, बाल रोग विभाग फुल
भीषण गर्मी की चपेट में आकर न सिर्फ बड़े बल्कि युवाओं के साथ मासूम बच्चे भी बीमार हो रहे है। एलएलआरएम कॉलेज के बाल रोग विभाग के सभी बेड फुल हो गए है। मंगलवार को गढ़ रोड स्थित मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभाग के पीकू व नीकू वार्ड समेत ओपीडी में बीमार बच्चों की भीड़ नजर आई। बताया जा रहा है पिछले कुछ दिनों से पड़ रही भीषण गर्मी का असर बच्चों पर भी पड़ रहा है। इस समय मेडिकल के बच्चा वार्ड में कुल 113 बच्चे भर्ती है। जिनमें से पीकू-नीकू वार्ड में ही भर्ती बच्चों में से 83 बच्चों की हालत नाजुक है।
बाल रोग विभाग की ओपीडी में रोजाना आने वाले बच्चों में से 15 से 18 बच्चों को एडमिट करना पड़ रहा है। यह बच्चे बुखार, उल्टी-दस्त व फूड प्वाइजनिंग से ग्रसित है। विशेषज्ञों का कहना है इस समय पड़ रही गर्मी की वजह से बच्चों को विशेष देखभाल की जरूरत है। जिनता हो सके उन्हें धूप में जाने से रोके। जबकि खाने में तरल पदार्थो का ज्यादा इस्तेमाल किया जाना चाहिए। शरीर में पानी की कमी नहीं होने दे। वहीं, बाल रोग विभाग में आने वाले पचास प्रतिशत बच्चों को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ रही है, लेकिन यहां सिर्फ 24 वेंटिलेटर ही मौजूद है।
जबकि विभाग की बिल्डिंग भी 1960 में बनी थी और यदि उस समय की आबादी और अब की आबादी की तुलना की जाए तो वह दोगुनी से ज्यादा हो चुकी है। ऐसे में मेडिकल के बाल रोग विभाग में भी अब जगह की कमी पड़ने लगी है, इसी वजह से वेंटिलेटरों की संख्या बढ़ाना संभव नहीं है। वहीं, वेंटिलेटर पर रहने वाले बच्चे की देखभाल के लिए अगल से स्टॉफ की जरूरत है, लेकिन स्टॉफ नहीं होने से भी विभाग को बच्चों के इलाज मे परेशानी कर सामना करना पड़ रहा है।

