- एनजीटी के आदेश हवा में, प्रशासन भी फेल, बूढ़ी गंगा पर अवैध निर्माण फिर शुरू
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: ‘कल-कल गीत सुनाती गंगा। छल-छल बहती जाती गंगा। गांव, खेत, मैदान, नगर, वन। सबकी प्यास बुझाती गंगा। गंगा के इतिहास पर अगर प्रकाश डालें तो ये पंक्तियां जरूर सटीक बैठती हैं। जो गंगा पहले सिर्फ एक जलधारा नहीं बल्कि जनजीवन और लोक संस्कृति का अभिन्न अंग थी, वहीं गंगा आज अपनी बदहाली पर जार-जार है।
हस्तिनापुर पर इस समय भू-माफिया रूपी असुरों का साया है। जो गंगा मैया भारतीय सभ्यता का आधार हुआ करती थी, जो गंगा मैया संस्कृति और धर्म का आदान-प्रदान करती थी। वहीं, गंगा आज महाभारतकाली राजधानी हस्तिनापुर में बदहाल है। यहां बूढ़ी हो चुकी गंगा चीख-चीख कर अपने अस्तित्व को बचाने की गुहार लगा रही है, लकिन उसकी यह गुहार कहीं न कहीं सन्नाटे में गुम हो चुकी है।

यहां बूढ़ी गंगा पर लगातार हो रहे अवैध कब्जे गंगा के अस्तित्व को ही नकारने पर तुले हुए हैं। इसकी शिकायत स्थानीय प्रशासन से लेकर शासन तक हो चुकी है। एनजीटी से लेकर राजभवन तक इसके अस्तित्व को बचाने के लिए गुहार लगाई जा चुकी हैं, लेकिन इन सब से परे भू-माफिया अपने ‘धन्धे’ में व्यस्त हैं। जिस गंगा का पानी वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक गुणों से युक्त है उस गंगा पर शासन प्रशासन की लापरवाही भी चिंतनीय है।
गंगा नदी सिर्फ भू-माफियाओं के शिकंजे में ही नहीं कसी हुई है बल्कि इस पर ध्वनि प्रदूषण से लेकर जल प्रदूषण एवं औद्योगिक प्रदूषण तक की मार है। ‘धोती पाप ताप सब हरती, हरी भरी करती है धरती, दर्शन-मज्जन-पान मात्र से, मन पावन कर जाती गंगा’। इतनी खूबियों के बावजूद हस्तिनापुर में बूढ़ी गंगा की बदहाली खुद अपने आप में एक सवाल है
जिसका उत्तर आज न तो अधिकारियों के पास है और न ही नेताओं के पास। नेचुरल साइंसेज ट्रस्ट के अध्यक्ष व शोभित विश्वविद्यलाय के असिस्टेंट प्रोफेसर प्रियंक भारती का कहना है कि बूढ़ी गंगा पर फिर से अवैध निर्माण शुरू हो गए हैं। जिस कारण इसके अस्तित्व पर फिर से प्रश्न चिह्न लगता दिख रहा है।

