Wednesday, March 18, 2026
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महंगाई बढ़ते जाने के आसार

Samvad 52


01 13विकास की रफ़्तार को कायम रखने के लिए जरूरी है कि रेपो दर में और बढ़ोतरी नहीं की जाए, लेकिन विगत चार महीनों तक खुदरा महंगाई के लगातार घटने के बाद जून 2023 में खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेज उछाल के चलते जून महीने में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) या खुदरा महंगाई दर 4।81 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई, जबकि मई महीने में यह 4.31 प्रतिशत रही थी। वहीं, अप्रैल 2023 में यह 4.7 प्रतिशत थी, जबकि मार्च में यह 5.66 प्रतिशत रही थी। हालांकि, जून महीने में भी खुदरा महंगाई दर रिजर्व बैंक की सहनशीलता स्तर 6 प्रतिशत से नीचे है, लेकिन इस वर्ष देश के कई राज्यों में तेज बारिश से खरीफ की फसल और सब्जियों के उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ा है और आगामी महीनों में स्थिति और भी बदतर हो सकती है। अलनीनो का खतरा अभी भी बना हुआ है। ऐसे में आगामी महीनों में खुदरा महंगाई के और भी बढ़ने के आसार बने हुए हैं।

सांख्यिकी मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार जून महीने में उपभोक्ता खाद्य महंगाई दर (सीपीआई) या खाद्य महंगाई दर बढ़कर 4.49 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई, जो मई महीने में 2.96 प्रतिशत रही थी, जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह 7.75 थी। वहीं अप्रैल महीने में यह 3.84 प्रतिशतरही थी। टमाटर समेत लगभग सभी हरी सब्जियों की कीमत फिलवक्त आसमान छू रही है। उल्लेखनीय है कि सीपीआई बास्केट में लगभग आधी हिस्सेदारी खाद्य पदार्थों की होती है।

रिजर्व बैंक ने नीतिगत दरों में बढ़ोतरी करना पिछले साल मई महीने में शुरू किया था। हालांकि, इस साल अप्रैल और जून महीने में लगातार 2 द्विमासिक मौद्रिक समीक्षाओं में रेपो दर को 6.5 प्रतिशत पर यथावत रखा गया था, जिसके कारण बैंकों ने भी कर्ज दर में कोई बदलाव नहीं किया।

रिजर्व बैंक की पहले की रणनीति के आधार पर यह अनुमान जताया जा रहा है कि आर्थिक वृद्धि दर में तेजी लाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक 8 से 10 अगस्त तक चलने वाली मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठकें और 10 अगस्त को एमपीसीऔर रिजर्व बैंक द्वारा घोषित की जाने वाली मौद्रिक समीक्षा में रेपो दर को यथावत रखा जाएगा, ताकि कर्ज लेने की लागत स्थिर बनी रहे और विकास दर की तेजी भी बरकरार रहे, लेकिन यहां पर यह बताना समीचीन होगा कि अप्रैल और जून महीने की द्विमासिक मौद्रिक समीक्षा के समय देश में खुदरा महंगाई की स्थिति बेकाबू नहीं थी और इसी वजह से रेपो दर को यथावत रखा गया था।

रिजर्व बैंक मुख्य तौर पर रेपो दर में बढ़ोतरी करके महंगाई से लड़ने की कोशिश करता है। जब रेपो दर अधिक होता है तो बैंकों को रिजर्व बैंक से महंगी दर पर कर्ज मिलता है, जिसके कारण बैंक भी ग्राहकों को महंगी दर पर कर्ज देते हैं। ऐसा करने से अर्थव्यवस्था में मुद्राा की तरलता कम हो जाती है और लोगों की जेब में पैसे नहीं होने की वजह से वस्तुओं की मांग में कमी आती है और वस्तुओं और उत्पादों की कीमत अधिक होने के कारण इनकी बिक्री में गिरावट आती है, जिससे महंगाई दर में नरमी देखी जाती है।

इसी तरह अर्थव्यवस्था में नरमी रहने पर विकासात्मक कार्यों में तेजी लाने के लिए बाजार में मुद्रा की तरलता बढ़ाने की कोशिश की जाती है और इसके लिए रेपो दर में कटौती की जाती है, ताकि बैंकों को रिजर्व बैंक से सस्ती दर पर कर्ज मिले और सस्ती दर पर कर्ज मिलने के बाद बैंक भी ग्राहकों को सस्ती दर पर कर्ज दे सके। रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास के अनुसार कोरोना महामारी, भू-राजनीतिक संकट, महंगाई, वैश्विक अर्थव्यवस्था में नरमी के बावजूद बैंकिंग और गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थान (एनबीएफसी) भारत में मजबूत बने हुए हैं। बैंकिंग क्षेत्र के वित्तीय प्रदर्शन में लगातार सुधार आ रहा है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में यानी अप्रैल-जून 2023 के दौरान 12 सरकारी बैंकों का मुनाफा बढ़कर 34,774 करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जबकि भारतीय स्टेट बैंक का मुनाफा 178.24 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी के साथ 16,884.29 करोड़ रुपये रहा। वहीं,देश के औद्योगिक उत्पादन में जून के महीने में 12.3 प्रतिशतकी वृद्धि दर्ज की गई। इसके मुकाबले जून 2021 में देश के औद्योगिक उत्पादन में 13.8 प्रतिशत की वृद्धि दर देखने को मिली थी।

वित्त वर्ष 2022-23 की अंतिम तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.2 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया गया था, लेकिन यह 6.1 प्रतिशत रही। वित्त वर्ष 2022-23 की चौथी तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर में बेहतरी आने से पूरे वित्त वर्ष की वृद्धि दर में सुधार दर्ज हुआ है। वित्त वर्ष 2022-23के दौरान एमपीसीने पहले जीडीपी के 6.8 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया था, जो वास्तविकता में 7.2 प्रतिशत रही। अभी रिजर्व बैंक का लक्ष्य विकास और महंगाई के बीच संतुलन बनाना है, ताकि आम आदमी को परेशानी नहीं हो और विकास की रफ्तार में भी तेजी आए। इसलिए, खुदरा महंगाई में कमी लाना बेहद ही जरूरी है, ऐसा नहीं करने से आगामी महीनों में भारत की आर्थिक वृद्धि दर धीमी पड़ सकती है।

बता दें कि महंगाई की वजह से जीडीपी वृद्धि दर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। बीते सालों से खुदरा महंगाई लगातार उच्च स्तर पर बनी हुई थी, हालांकि, विगत कुछ महीनों में खुदरा महंगाई मेंआंशिक गिरावट आई थी और अब फिर से खुदरा महंगाई उफान पर है। लिहाजा, कयास लगाए जा रहे हैं कि आगामी महीनों में भारत का विकास दर नरम रह सकता है, जिससे अर्थव्यवस्था में भी सुस्ती आ सकती है। बेशक, रेपो दर को यथावत रखने से एक तरफ कर्जदारों को राहत मिलेगी तो दूसरी तरफ विकास की रफ्तार तेज होगी, लेकिन रिजर्व बैंक चाहता है कि खुदरा महंगाई पर पहले नियंत्रण किया जाए, क्योंकि इससे लंबे समय में अर्थव्यवस्था में सुधार और मजबूती आती है।

लिहाजा, अनुमान है कि रिजर्व बैंक 10 अगस्त को रेपो दर में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर सकता है, जिससे बैंक कर्ज दर में इजाफा करेंगे और कर्ज महंगा होने से विविध उत्पादों की मांग में कमी आएगी, जिससे खुदरा महंगाई में कमी आएगी। इससे लोगों की खर्च करने की क्षमता भी कम होगी, जिसकी वजह सेआधारभूत संरचना को मजबूत करने में निजी व्यय में कमी आएगी, जो पहले से ही कम है साथ ही साथ विकास की गति कम होने से कर संग्रह में भी कमी आ सकती है।


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