Monday, April 22, 2024
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जल्दी कम नहीं होगी महंगाई

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SATISH SINGHमहंगाई पर काबू पाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने 0.50 प्रतिशत का इजाफा किया है। इसके पहले रेपो दर में 0.40 की बढ़ोतरी की गई थी। रेपो दर में ताजा बढ़ोतरी के साथ यह बढ़कर 4.90 प्रतिशत पर पहुंच गया है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास के अनुसार महंगाई पर काबू पाने के लिए केंद्रीय बैंक को आगामी महीनों में भी नीतिगत दरों में इजाफा करना पड़ सकता है। मई के आंकड़ों के अनुसार कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (सीपीआई) या खुदरा महंगाई अप्रैल महीने में बढ़कर 7.79 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो विगत 8 सालों में सर्वाधिक है।मौद्रिक समीक्षा में कहा गया है कि आगामी तिमाहियों में महंगाई दर 6 प्रतिशत से ऊपर रह सकती है। वित्त वर्ष 2023 के लिए महंगाई के अनुमान को 5.7 प्रतिशत से बढ़ाकर 6.7 प्रतिशत कर दिया गया है। रिजर्व बैंक के गवर्नर के अनुसार वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में महंगाई 7.4 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 6.2 प्रतिशत और अंतिम तिमाही में 5.8 प्रतिशत रह सकती है। बढ़ती महंगाई की वजह से बॉन्ड यील्ड 2019 के बाद बढ़कर 7.5 प्रतिशत पर पहुंच गया, जिसके 8 प्रतिशत के स्तर पर पहुंचने की संभावना है। वैसे, महंगाई के मामले में भारत अपवाद नहीं है। आज महंगाई से दुनिया के कमोबेश सभी देश परेशान हैं। ब्रिटेन और यूरो जोन में महंगाई दर 40 साल के रिकॉर्ड को तोड़कर 8 प्रतिशत से ऊपर के स्तर पर पहुंच गई है। चीन में तालाबंदी खत्म होने से दुनियाभर में कच्चे तेल एवं स्टील जैसे कमोडिटी की मांग में तेजी आई है, जिससे भी कच्चे तेल और स्टील की कीमत में तेजी आई है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बेंचमार्क क्रूड ब्रेंट 120 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर के स्तर पर बना हुआ है और भू-राजनैतिक संकट की वजह से यह आगामी महीनों में भी उच्च स्तर पर बना रह सकता है।

महंगाई का अर्थव्यवस्था और आम आदमी पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। उच्च महंगाई दर से आम लोगों की खरीद क्षमता या क्रय शक्ति में कमी आती है, क्योंकि लोगों की आय में बढ़ोतरी नहीं होती है, लेकिन वस्तु की कीमत में इजाफा हो जाता है। उत्पादों की कीमत ज्यादा होने की वजह से उनकी मांग में कमी आती है और आर्थिक गतिविधियां धीमी हो जाती हैं। इससे रोजगार सृजन और अन्य आर्थिक गतिविधियों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

रेपो दर के बढ़ने या घटने का सीधा असर महंगाई और ऋण दर पर पड़ता है। रेपो दर बढ़ने से ऋण दर में इजाफा होता है, वहीं महंगाई में कमी आने की संभावना बढ़ जाती है, क्योंकि रेपो दर बढ़ने से बैंक महंगी दर पर कर्ज देते हैं, जिससे लोगों के पास पैसों की कमी हो जाती है। कम आय और उत्पादों की ज्यादा कीमत होने की वजह से मांग में कमी आती है और जब किसी उत्पाद की मांग में कमी आती है तो उसकी कीमत में भी कमी आ जाती है।

चूंकि, बैंकों ने विविध कर्ज दरों को रेपो दर से जोड़ दिया है, इसलिए, रेपो दर के कम या ज्यादा होने का तत्काल प्रभाव कर्ज दरों एवं ऋण की किस्तों पर पड़ता है। इसलिए, माना जा रहा है कि रिजर्व बैंक के ताजा रुख से गृह,कार आदि ऋण के ब्याज दरों में बैंकबढ़ोतरी करेंगे, जिससे नए ऋण और मौजूदा ऋण की किस्त एवं ब्याज दोनों में वृद्धि होगी।

मौद्रिक समीक्षा के दौरान रिजर्व बैंक ने यह भी कहा कि आने वाले दिनों में क्रेडिट कार्ड को यूपीआई से लिंक कर दिया जाएगा और इसकी शुरुआत रुपे क्रेडिट कार्ड से की जाएगी। भारतीय रिजर्व बैंक के इस पहल से यूपीआई से लेनदेन में आसानी होगी साथ ही साथ इसके लेनदेन के वॉल्यूम में भी जबर्दस्त इजाफा होगा। अभी सेविंग और करंट खाते को ही सिर्फ यूपीआई से लिंक करने की सुविधा उपलब्ध है। चूंकि,करंट व ओवरड्राफ्ट खाता पहले से ही यूपीआई से जुड़ा हुआ है, इसलिए क्रेडिट कार्ड को अभी तक यूपीआई से नहीं जोड़ने का कोई औचित्य नहीं था। रिजर्व बैंक का यह पहल निश्चित रूप से एक स्वागत योग्य कदम है।

को-आॅपरेटिव बैंक के लिए गृह ऋण सीमा में 100 प्रतिशत का इजाफा किया गया है। अब ग्रामीण को-आॅपरेटिव बैंक भी रियल एस्टेट को ऋण दे सकेंगे। रिजर्व बैंक के इस पहल से गृह ऋण वितरण में तेजी आयेगी और देश में मौजूद आवास समस्या थोड़ी कम हो सकेगी।

हाल में निर्यात के मोर्चे पर भारत ने बढ़िया प्रदर्शन किया है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने भी वित्त वर्ष 2021-22 में बढ़िया प्रदर्शन किया है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत है। केंद्रीय बैंक ने माना है कि ग्रामीण मांग और शहरी मांग दोनों में सुधार दिख रहा है। यह इस बात का संकेत है कि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार मंद नहीं हुई है। विकास की गति थोड़ी धीमी जरूर है, लेकिन वह निरंतर आगे की ओर बढ़ रही है।

रिजर्व बैंक के नियमों के अनुसार बैंकों के ऋण मार्जिनल कॉस्ट लेंडिंग रेट (एमसीएलआर) और रेपो लिंक्ड लेंडिंग रेट (आरएलएलआर) से लिंक्ड होते हैं। वर्ष 2019 में भारतीय रिजर्व बैंक ने सभी बैंकों को कहा था कि वे कुछ ऋणों को एक्स्टर्नल बेंचमार्क से लिंक करें, क्योंकि बैंक रेपो दर में कटौती का पूरा फायदा ग्राहकों को नहीं दे रहे थे। तदुपरांत,बैंकों ने ऋण को आरएलएलआर से जोड़ दिया। उल्लेखनीय है कि बैंक के सभी प्रकार के ऋण आरएलएलआर से नहीं जुड़े हुए हैं। इसलिए, महंगाई के पंख को कतरने के लिए सभी प्रकार के ऋणों के ब्याज दरों में बढ़ोतरी की जा सकती है।

मार्च 2020 में रेपो दर में 0.75 बेसिस पॉइंट और मई 2020 में 0.40 बेसिस पॉइंट की कटौती की गई थी। कोरोना महामारी की वजह से रिजर्व बैंक ने मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन स्थापित करने और विकास दर को कायम रखने के लिए रेपो दर में यह कटौती की थी। महामारी से पहले रेपो दर 5.15 प्रतिशत था। चूंकि, महंगाई के तुरत-फुरत में कम होने के आसार नहीं हैं, इसलिए, इसे नियंत्रण में रखने के लिए केंद्रीय बैंक धीरे-धीरे रेपो दर को कोविड से पहले वाले स्तर से ऊपर लेकर जा सकता है।

फिलहाल, उच्च महंगाई दर के घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय दोनों कारण हैं, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय कारण ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। भू-राजनैतिक संकट का अभी भी समाधान निकलता नहीं दिख रहा है। रूस और यूक्रेन अभी भी अपने-अपने ईगो पर अड़े हुए हैं। वर्ष 2022 में मानसून कैसी रहेगी का अभी आकलन नहीं किया जा सका है। अस्तु, फिलवक्त महंगाई कम होती नजर नहीं आ रही है। ऐसे में वर्ष 2022 में रेपो और कर्ज दर दोनों में वृद्धि होने की संभावना बनी हुई है।


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