Wednesday, June 10, 2026
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इंटरनेट कनेक्टिविटी के अभाव में बच्चे कैसे करें पढ़ाई


अनुजा भट्ट


अगर सरकार की नीतियों की दिशा ये है कि डिजिटल एजुकेशन से काम चलाया जाएगा, तो इसके लिए तीन काम करने होंगे। एक, देश में इंटरनेट और स्मार्टफोन की सुविधा का विस्तार करना होगा और लैपटॉप या टैबलेट हर छात्र को मिल सके, ऐसी व्यवस्था करनी होगी। दो, छात्रों से भी पहले शिक्षकों को डिजिटल एजुकेशन के लिए तैयार करना होगा और उनकी ट्रेनिंग करानी होगी। तीन, डिजिटल एजुकेशन के लिए सिलेबस को बदलना होगा और नए टीचिंग मैटेरियल तैयार करने होंगे। ये सब फटाफट नहीं हो जाएगा। चूंकि इसमें समय लगना है, इसलिए सरकार सिर्फ डिजिटल एजुकेशन की बात करके अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकती।

 

कोविड-19 ने आईटी क्रांति का जाप करने वाले इस देश का डिजिटल डिवाइड उजागर कर दिया है। संकट के इस दौर में देश का एजुकेशन सेक्टर इस असमानता का सबसे बड़ा उदाहरण बन कर उभरा है।
लॉकडाउन के ऐलान के साथ ही देश के लगभग 32 करोड़ छात्र-छात्राओं को स्कूल-कॉलेज जाने से रोक दिया गया था। सरकार ने ऐलान किया था कि स्कूल-कॉलेज उनके लिए आॅनलाइन शिक्षा का इंतजाम करें। लेकिन देश के बड़े शहरों और संभ्रांत वर्ग से आने वाले बच्चों की पढ़ाई शुरू करने के लिए भी स्कूल-कॉलेजों का खासा वक्त लग गया। ये वे स्कूल थे, जिनके पास फंड की कमी नहीं थी।
ऐसे में आप सोच सकते हैं कि देश के छोटे शहरों, कस्बाई और ग्रामीण इलाकों में क्या हाल हो रहा होगा, जो पढ़ाई-लिखाई के खराब स्तर और इंटरनेट कनेक्टिविटी के मामले में ‘गरीबी’ के शिकार हैं। लॉकडाउन ने घर में बैठे उन 32 करोड़ छात्र-छात्राओं के बड़े हिस्से के लिए आर्थिक और सामाजिक बराबरी की दौड़ को और कठिन बना दिया है, जिनके पास इंटरनेट कनेक्शन तो दूर ढंग से क्लासरूम और टीचर भी नहीं हैं।
देश में सिर्फ दो राज्य ऐसे हैं, जहां ग्रामीण इलाकों में 40 फीसदी घरों में इंटरनेट सुविधा है। ये राज्य हैं हिमाचल और केरल। यह आंकड़ा यह अंदाजा लगाने के लिए काफी है कि जिन बच्चों के पास इंटरनेट की सुविधा नहीं है, वो स्कूल-कॉलेज न खुलने से किस कदर पढ़ाई में पिछड़ रहे हैं।
द एनुअल स्टेट आॅफ एजुकेशन यानी असर की 2018 की रिपोर्ट बताती है कि देश के ग्रामीण इलाकों में पांचवीं क्लास के आधे बच्चे ही दूसरी क्लास की किताबें पढ़ पाते हैं। सर्वे के दौरान सिर्फ 28 फीसदी बच्चे ही गुणा-भाग के सरल सवाल का हल निकाल सके। इस सर्वे में एक मार्के की बात यह थी कि वे बच्चे पढ़ाई-लिखाई में ज्यादातर कमजोर दिखे, जिन्हें घरों में पढ़ाई के दौरान सपोर्ट नहीं मिलता था। यानी घरों में उनकी पढ़ाई-लिखाई की दिक्कतें दूर करने वाला कोई नहीं था। अब आप कल्पना कर सकते हैं ऐसे बच्चों को कौन इंटरनेट से पढ़ने में मदद करेगा?
गंभीर बात यह है देश के नीति-निर्माता बच्चों की शिक्षा को लेकर गंभीर नहीं दिख रहे हैं। अभी तक स्कूलों को खोलने की कोई प्लानिंग नहीं दिख रही है। ऐसे में सबसे ज्यादा नुकसान ऐसे बच्चों की पढ़ाई का हो रहा है, जो आॅनलाइन शिक्षा के संसाधनों से महरूम हैं। अगर स्कूल खुलने लगें तो ऐसे बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के नुकसान की कुछ भरपाई हो सकती है।
स्कूल बंद रहने का असर बच्चों के पोषण पर भी पड़ रहा है। देश में 12 करोड़ स्कूली बच्चों को मिड डे मील दिया जाता है। स्कूल बंद होने से इनमें से बड़ी तादाद में बच्चों को यह खाना नहीं मिल पा रहा है। कुछ राज्यों ने घरों में यह मील पहुंचाने की शुरूआत की है लेकिन अभी कई राज्य यह सुविधा नहीं दे पा रहे हैं।
सिर्फ भारत में ही नहीं दुनिया भर में बच्चों की पढ़ाई के नुकसान पर चिंता जताई जा रही है। एक अमेरिकी आकलन में कहा गया कि इस बार जब बच्चे स्कूल लौटेंगे तो उनकी रीडिंग लेवल 30 फीसदी तक घट सकता है और गणित में दक्षता के मामले में तो वह एक साल तक पिछड़ सकते हैं। वर्ल्ड बैंक ने ब्राजील में जो स्टडी की है, उसके मुताबिक तीन महीने की स्कूलबंदी 48 हजार बच्चों को ‘लर्निंग पॉवर्टी’ में डाल सकती है।
अगर सरकार की नीतियों की दिशा ये है कि डिजिटल एजुकेशन से काम चलाया जाएगा, तो इसके लिए तीन काम करने होंगे। एक, देश में इंटरनेट और स्मार्टफोन की सुविधा का विस्तार करना होगा और लैपटॉप या टैबलेट हर छात्र को मिल सके, ऐसी व्यवस्था करनी होगी। दो, छात्रों से भी पहले शिक्षकों को डिजिटल एजुकेशन के लिए तैयार करना होगा और उनकी ट्रेनिंग करानी होगी। तीन, डिजिटल एजुकेशन के लिए सिलेबस को बदलना होगा और नए टीचिंग मैटेरियल तैयार करने होंगे। ये सब फटाफट नहीं हो जाएगा। चूंकि इसमें समय लगना है, इसलिए सरकार सिर्फ डिजिटल एजुकेशन की बात करके अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकती।
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