Wednesday, May 6, 2026
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पिता के नक्शे कदम पर ही सियासत खेल रहे जयंत

  • अजित सिंह ने भी कई बार भाजपा से किया गठबंधन
  • रालोद के मुस्लिम सपा विधायकों के लिए खड़ी होगी मुसीबत

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: अपने पिता की राजनीतिक विरासत संभालने वाले जयंत चौधरी ने इस बार सियासी दांव पेंच में अपने पिता का ही दांव आजमाया है। ऐन चुनाव के मौके पर वह पलटी मारकर फिर से भाजपा की गोद में बैठ रहे हैं। लेकिन अपने इस सियासी स्वार्थ में वह रालोद के सिंबल पर चुनाव जीतने वाले सपा के मुस्लिम विधायकों के लिए खासी मुसीबत खड़ी कर रहे हैं। जयंत चौधरी के इस दांव से रालोद के सपाई विधायकों के समक्ष अपना वजूद बचाने का संकट खड़ा हो गया है।

चुनाव का मौका करीब है और ऐसे में अपने पुराने साथी को छोड़ना रालोद सुप्रीमो को मुफीद लग रहा हो। लेकिन रालोद के टिकट के सहारे जीतने वाले समाजवादी पार्टी के विधायक अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ी दुश्वारी यह है कि सपा गठबंधन से अलग होने के बाद यह मुस्लिम विधायक आखिर क्या करेंगे।

अखिलेश यादव सीट बंटवारे में जयंत चौधरी को सात सीटें दे रहे थे। लेकिन साथ में यह शर्त भी लगा रहे थे कि तीन सीटों पर सपा के नेता रालोद के सिंबल पर चुनाव लड़ेंगे। झगड़े की मुख्य वजह यही सीटों का बंटवारा रहा। इस बीच भाजपा ने सेंधमारी करते हुए रालोद को अपने खेमे में जोड़ने के लिए दांव पेंच फेंके।

पहले भी हो चुका है भाजपा-रालोद गठबंधन

भारतीय किसान दल से रालोद का गठन हुआ और जनसंघ से बनी भाजपा। वर्ष 2002 में भापा और आरएलजी ने मिलकर यूपी विधान सभा का चुनाव लड़ा। इसके बाद वर्ष 2009 में लोकसभा चुनाव में फिर दोनों दलों का गठबंधन हुआ। भाजपा ने रालोद को ेसात सीटें दी थीं। जिनमें से पांच पर रालोद ने जीत दर्ज कराई थी।

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इनमें बागपत से चौधरी अजित सिंह, बिजनौर से संजय चौहान, मथुरा से जयंत चौधरी, हाथरस से सारिका बघेल और अमरोहा से देवेन्द्र नागपाल सांसद चुने गये थे। अब फिर से भाजपा और रालोद गठबंधन हो रहा है। बस अब नाममात्र की घोषणा होना ही बाकी है।

गठबंधन से जीतने वालों पर रहेगा संकट

समाजवादी पार्टी से गठबंधन होने के बाद राष्ट्रीय लोकदल से जीतने वाले विधायकों के समक्ष बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। मुस्लिम समुदाय से आने वाले यह मुस्लिम विधायक रालोद-भाजपा का गठबंधन होने के बाद यदि पार्टी में ही रहते हैं तो उनका मुस्लिम वोटरों से विश्वास खत्म हो जायेगा। और यदि वह रालोद से बगावत करते हैं तो उनको विधायकी से हाथ धोना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में दोनों ही तरफ से यह सपाई-रालोदी विधायक फंस गये हैं।

थाना भवन से अशरफ अली इसकी मिसाल हैं। वह गठबंधन में समाजवादी पार्टी का टिकट पाकर जीत हासिल करने में कामयाब रहे तो सपा के गुलाम मौहम्मद अपनी पार्टी से इस्तीफा देकर रालोद के सिंबल पर सिवाल खास से विधायक चुने गये थे। इसी तरह अमरोहा से महबूब अली, बेहट से उमर अली खां भी गठबंधन धर्म में विधान सभा तो पहुंच गये। लेकिन अब उनके समक्ष अपनी विधायकी बचाने का संकट खड़ा हो गया है।

रालोद के मुस्लिम नेता भी असमंजस में

राष्ट्रीय लोकदल सुप्रीमो जयंत चौधरी अपने राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए भले ही भाजपा के साथ गलबहियां कर रहे हों, लेकिन वह अपनी पार्टी के उन मुस्लिम नेताओं के लिए खासी बड़ी मुसीबत खड़ी कर रहे हैं। जो चौधरी चरण सिंह के समय से रालोद के साथ जुड़े हुए हैं। अपनी जिंदगी के तमाम उतार-चढ़ाव देखकर मजबूत स्तंभ की तरह डंटे रहने वाले ऐनुद्दीन शाह इसकी बड़ी मिसाल हैं।

बागपत के पूर्व विधायक स्व.नवाब कोकब हमीद ने अपनी पूरी जिंदगी रालोद में ही रहकर गुजारी। अब उनके बेटे अहमद हमीद भले ही सपा के टिकट पर बागपत से चुनाव लड़कर जीत का स्वाद न चख सके हों। लेकिन उनके समक्ष यह संकट खड़ा हो गया है कि वह भाजपा से गठबंधन होने पर रालोद के साथ रहें या नहीं। इसी तरह युवा रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी वसीम राजा के समक्ष भी अपना राजनीतिक कैरियर बचाने की जुगत बनी रहेगी।

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