Wednesday, May 6, 2026
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जनपक्षधरता ही पत्रकारिता धर्म

 

Samvad 39


Raju Panday 1प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत के निराशाजनक प्रदर्शन और उत्तरोत्तर गिरती स्थिति पर चर्चा और विमर्श जारी है। हाल के दिनों में पत्रकारों के दमन और उत्पीड़न के समाचारों की आवृत्ति भी चिंताजनक रूप से बढ़ी है। पत्रकारों को निर्वस्त्र करने की दु:खद, शर्मनाक और निंदनीय घटनाओं पर कुछ मित्रों से चर्चा हो रही थी। किराना व्यवसाय से जुड़े एक मित्र की प्रतिक्रिया ने चौंकाया भी और डराया भी। यह मित्र सोशल मीडिया पर निरंतर सक्रिय रहते हैं और व्हाट्सएप विश्वविद्यालय के नवप्रवेशी उत्साही छात्रों में उन्हें शुमार किया जा सकता है। उन्होंने कहा-आजकल जो भी हो रहा है वह बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था, इन पत्रकारों को भी एक बार जमकर सबक सिखाना जरूरी है। मैंने उनसे पूछा कि पत्रकारों के प्रति उनकी इस नफरत का आधार क्या है? क्या वे पत्रकारिता की ओट लेकर भयादोहन करने वाले किसी अपराधी तत्व द्वारा प्रताड़ित किए गए हैं? उनके उत्तर से ज्ञात हुआ कि कोई अप्रिय व्यक्तिगत अनुभव पत्रकारों के प्रति उनकी घृणा के लिए उत्तरदायी नहीं है, अपितु वे उस नैरेटिव के शिकार हैं जिसके अनुसार सत्ता की नजदीकी से वंचित कर दिए गए वामपंथी पत्रकार षड्यंत्रपूर्वक नए भारत के नए तेवरों पर सवाल उठा रहे हैं।

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असहमति की बेबाक अभिव्यक्ति, आलोचना करने का साहस, समीक्षात्मक दृष्टिकोण, तथ्यपरक-तार्किक विवेचना और अप्रिय प्रश्न पूछने में संकोच न करना- यह सभी अच्छे पत्रकार के मूल गुण हैं। सत्ता से सहमत होने के लिए बहुत से लोग हैं यदि पत्रकार भी ऐसा करने लगें तो जनता की समस्याओं और पीड़ा को स्वर कौन देगा? पत्रकार निष्पक्ष से कहीं अधिक जनपक्षधर होता है और किसी घटना के ट्रीटमेंट में जनता, समाज एवं देश का हित उसके लिए सर्वोपरि होता है।

प्रेस की स्वतंत्रता पर गहराते संकट की चर्चा तो हो रही है, किंतु प्रेस के अस्तित्व पर जो संकट है उसे हम अनदेखा कर रहे हैं। अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के मुद्रण आधारित या इलेक्ट्रॉनिक साधनों का उपयोग करने वाले हर व्यक्ति या संस्थान को प्रेस की आदर्श परिभाषा में समाहित करना घोर अनुचित है, विशेषकर तब जब वह पत्रकारिता की ओट में अपने व्यावसायिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और सांप्रदायिक एजेंडे को आगे बढ़ा रहा हो।

आज राजनीतिक दलों तथा उद्योगपतियों से मीडिया के अवैध संबंधों को वैधानिकता प्रदान करने के लिए अब इनके मीडिया सेल सक्रिय दिखाई देते हैं और हम ‘मीडिया प्रबंधन’ जैसी अभिव्यक्ति को लोकप्रिय होते देखते हैं, जिसका शाब्दिक अर्थ ही यह दर्शाता है कि मीडिया को मैनेज किया जा सकता है। हमने वह युग भी देखा है, जब किसी समाचार समूह पर सरकार समर्थक होने के आक्षेप लगा करते थे, लेकिन सरकार समर्थक मीडिया जैसी अभिव्यक्ति में जो द्वैत बोध था, वह इतनी जल्दी तिरोहित हो जाएगा और मीडिया सरकार के साथ तद्रूप हो जाएगा इसकी कल्पना हमें नहीं थी।

उच्चतम और नवीनतम तकनीकी सुविधाओं की उपलब्धता, भव्य स्टूडियो तथा सेलिब्रिटी एडिटरों-एंकरों-रिपोर्टरों के जमावड़े से बनने वाले टीवी चैनलों में पत्रकारिता का कलेवर तो है, लेकिन तेवर नदारद है। ऐसा बहुत कुछ जिसे हम पत्रकारिता समझ कर देख-पढ़ रहे हैं|

और जिसके आधार पर अपने अभिमत का निर्माण कर रहे हैं, वह दरअसल पत्रकारिता की तकनीकों का उपयोग करने वाले चतुर उद्योगपतियों और सत्ताधीशों की भरमाने वाली प्रस्तुतियां हैं, जिनसे जनपक्षधरता, जनशिक्षण और जन अभिरुचि के परिष्कार की आशा करना व्यर्थ है।

वैकल्पिक मीडिया का उदय आशा तो जगाता है, किंतु ‘वैकल्पिक’ शब्द के साथ उसकी सीमाओं का बोध जुड़ा हुआ है और ऐसा बहुत कम होता है कि विकल्प मूल को प्रतिस्थापित कर दे। वैकल्पिक मीडिया संवेदनशील पत्रकारों और पाठकों की शरण स्थली है। यह मुख्य धारा के मीडिया के प्रति उनकी निराशा और आक्रोश की अभिव्यक्ति है।

मुख्य धारा के मीडिया के नाम पर चल रहे पाखंड के प्रति प्रतिक्रिया स्वरूप जन्म लेने वाला वैकल्पिक मीडिया स्वाभाविक रूप इस पाखंड,छद्म और भ्रम जाल को तोड़ने में अपनी सारी ऊर्जा लगा रहा है, यही कारण है कि अनेक बार इसमें सृजनशीलता और रचनात्मकता का अभाव दिखाई देता है।

ऐसा नहीं है कि सोशल मीडिया जमीनी सच्चाइयों को सामने लाने का जरिया नहीं बना है, किंतु इसके द्वारा प्रस्तुत तथ्यों की पुष्टि के वैकल्पिक साधन के अभाव में यह खबरें ‘माय वर्ड अगेंस्ट योर्स’ बनकर रह जाती हैं। सोशल मीडिया पर झूठी और भ्रामक पोस्ट्स की भरमार ने इसकी विश्वसनीयता को घटाया है। अभिव्यक्ति के संयम का अभाव भी यहां इतना अधिक है कि कहा जाने लगा है कि जो कुछ घर-परिवार और समाज में प्रत्यक्ष रूप से नहीं कहा जा सकता वह सोशल मीडिया पर कहा भी जा सकता है|

और उसके लिए सराहना भी प्राप्त की जा सकती है। सोशल मीडिया ने फेक न्यूज के कारोबार को बढ़ावा दिया है और मनोरंजक स्थिति यह है कि जनता को फेक इश्यूज पर दिन रात फंसाए रखने वाले पारंपरिक टीवी चैनल और अखबार इनकी पड़ताल करते देखे जाते हैं।

उस संपादक के लिए-जो किसी घटना से खबर को तराश कर बाहर निकालता था-सोशल मीडिया में कोई स्थान नहीं है। प्रिंट मीडिया में संपादकों का स्थान न्यूज अरेंजर जैसी किसी नई प्रजाति के लोग पहले ही ले चुके हैं। टीवी चैनलों और अखबारों से जुड़े पत्रकारिता के बहुत सारे बड़े नाम शायद यह भ्रम पैदा करने के लिए ही हैं कि जो कुछ उनकी छत्र छाया में हो रहा है|

उसे पत्रकारिता मान लिया जाए। अशोभनीय जल्दबाजी से मूर्द्धन्य का दर्जा हासिल करने वाले असमय विगत शौर्य हो चुके अनेक पत्रकारों के विषय में तो अब यह शंका भी होती है कि उनका पराक्रम कहीं अपना बाजार भाव बढ़ाने की किसी रणनीति का हिस्सा तो नहीं था। जेनेटिक कारणों से होने वाला रोग प्रोजेरिया बचपन में वृद्धावस्था ला देता है, किंतु इन युवा पत्रकारों के वैचारिक प्रोजेरिया का कारण तो सत्ता और संपन्नता की उनकी भूख ही है।

ऐसा बहुत कुछ आज पत्रकारिता के नाम पर परोसा जा रहा है, जो हमें कुछ खास विषयों पर खास दिशा में सोचकर अपनी राय बनाने के लिए बाध्य करने की रणनीति का एक हिस्सा है। सरकार अब सेंसरशिप जैसी आदिम अभिव्यक्तियों पर विश्वास नहीं करती। आज का मीडिया ऐसे बहुविकल्पीय प्रश्न की भांति है जिसके सारे उत्तर सत्ता के पक्ष में हैं और सत्ता बड़े गौरव से यह कह सकती है कि जनता को चुनने की आजादी है।


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