Tuesday, January 25, 2022
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मनुष्य से मनुष्य तक की यात्राएं!

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यात्राएं पहाड़ों, नदियों, जंगलों, दुर्गम क्षेत्रों, मंदिरों-मस्जिदों और पर्यटन स्थलों की ही नहीं होतीं। बल्कि कुछ यात्राएं या संस्मरण आपको मनुष्य तक की भी यात्रा कराते हैं। आप जहां की भी यात्रा करते हैं, वहां का समाज, उनका पहरावा, उनकी संस्कृति, उनकी जीवनशैली, उनकी तकलीफें आपको दिखाई पड़ती हैं। और इस सबको देखने की प्रक्रिया में कहीं न कहीं आपकी सोच भी उजागर होती है। कह सकते हैं कि यात्राओँ में एक तरफ आप बाहरी दुनिया को देखते हैं तो दूसरी तरफ आप अपने अवचेतन की दुनिया को बाहर खोजते हैं। वरिष्ठ कथाकार अशोक अग्रवाल का यात्रावृत्त: किसी वक्त किसी जगह (संभावना प्रकाशन) पढ़ते हुए बार बार यह महसूस हुआ कि यह आम यात्रा वृतांत नहीं है। यह आपको उन लोगों से रूबरू कराती है जिनके बारे में आप या तो नहीं जानते या बहुत कम जानते हैं। अशोक अग्रवाल ने दूरस्थ दुर्गम क्षेत्रों की इन यात्राओं को करते हुए वहां के विकट, कष्टप्रद जीवन का चित्र खींचा है। उन्होंने दिखाया है कि किस तरह यहां रहने वाले स्थानीय लोगों के भीतर जिजीविषा उन्हें अंत तक बचाए रखती है। इन यात्रा वृतांतों को पढ़ते हुए आपको इस बात का इल्म नहीं होगा कि ये यात्राएं कब की गईं।

अशोक अग्रवाल खुद स्वीकार करते हैं कि ये यात्राएं पिछले ढाई दशक के दौरान की गईं हैं। आप कहां की यात्रा कर रहे हैं वह भी आपको ठहरकर सोचना होगा। लेकिन जो चीज इन यात्राओं को दिलचस्प बनाती है, वह है इन यात्राओं के दौरान मिलने वाले किरदार। इन्हीं किरदारों के माध्यम से अशोक अग्रवाल उस समाज की गहन पीड़ा और दर्द को जुबान देते हैं। ‘झुलसे साल-वनों का नाद’ में आपको सुक्कू और मासा मिलेंगे। चारों तरफ साल, सागौन और बांस के झुरमुट। गीले पत्तों की ऊबड़खाबड़ चादर बिछी हुई है। पैरों के निशान तक नहीं। किसी बस्ती या आदमी का दूर-दूर तक कोई चिह्न नहीं। इसी कारण इसे अबूझमाड़ कहा जाता है-यानी वे पहाड़ियां जिन्हें बूझा नहीं जा सकता।

अशोक अग्रवाल यहां की पूरी दुनिया को जीवंत कर देते हैं। ‘जाने के रास्ते हैं बंद, लेकिन…’ यात्रा वृतांत में नागा समाज देखने को मिलता है। पता चलता है चौदह नागा जनजातियों की प्राचीन जीवन शैली, उनका जीवन दर्शन क्या है। यहां की स्त्रियों को उनकी शॉलों से पहचाना जा सकता है। विवाहित महिला की शॉल अलग और अविवाहित की अलग। नागा जीवन का सारा दर्शन मानव मुंडों के ही इर्दगिर्द घूमता है। शिल्पों, नक्काशियों और परंपरागत पोशाकों में अधिकांश को मूलभाव नरमुंडों का शिकार ही है।

इन यात्राओं की कोई तरतीब नहीं है। जब जहां मन हुआ निकल गए वाली शैली मे लिखी गई हैं ये यात्राएं। शायद यही इनकी खूबसूरती भी है। लेखक अजमेर गढ़ पहुंचते हैं और जालेश्वर महादेव के खुले आंगन में पुजारी की खाट पर बैठ जाते हैं। दरीचें खुलते हैं और लेखक की मुलाकात अजित से होती है। एक और कहानी खुलती है। अशोक अग्रवाल ने बाड़मेर-जैसलमेर में सीमांत रेगिस्तान में जूझते लोगों का जीवन भी दशार्या है।

उन्होंने बताया है कि सूखे के चलते किस तरह उनकी गायें मर रही हैं। एक स्थान पर लेखक लिखते है: ये मूक मवेशी नहीं, इनकी मां बहनें और पुत्रियां हैं। कोई भी बेनाम नहीं…सेना, काली, कजरी। दुर्भाग्य से लोग अकाल, भूख, बीमारी और मौत के पारस्परिकर संबंध को नहीं समझते। लेखक अपनी यात्राओं में इन्हें समझने की कोशिश करता है। केवल इस संबंध को ही नहीं, वह अन्य राज्यों की साहित्यिक दुनिया को भी जानना चाहता है।

इसके लिए अशोक अग्रवाल आपको कालीकट के दूसरे छोर बेपोर ले जाते हैं-‘बशीर के बहाने’। यहां वे मिलते हैं कुंजुंपातुम्मा के दादाजी वायकोम मुहम्मद बशीर से। बशीर कथाकार हैं। वे लम्बी कहानियां या छोटे उपन्यास लिखते हैं। उनसे मुलाकात केरल की साहित्यिक दुनिया का चित्र खींचती है। बशीर कथाकार हैं। वे बताते हैं‘केरल में प्रतिदिन तीन सौ दैनिक प्रकाशित होते हैं, उनकी हर किताब का पहला संस्करण 5000 छपता है। दूसरे तीसरे साल नया संस्करण छप जाता है। रायल्टी इतनी आ जाती है कि जीवनयापन सुगमता से हो जाता है। हिन्दी पत्र पत्रिकाओं की तरह अभी यहां साहित्य बहिष्कृत या खारिज नहीं हुआ है।’ यह अशोक अग्रवाल का बात कहने का अपना ढंग है। लेकिन वह कहीं न कहीं हिन्दी साहित्य की दुनिया पर ही टिप्पणी कर रहे हैं।

‘तीन महाकवियों का केरल’ में मलयालम कविता को चरमोत्कर्ष पर पहुंचाने वाली महाकवि त्रय की जानकारी मिलती है। ये कवि हैं कुमारन आशान्, वल्लतोल नारायण मेनन और उल्लूर परमेश्वर अय्यर। उल्लूर से मिलने अशोक अग्रवाल ‘उल्लूर स्मारक पुस्कालय शोध संस्थान’ जाते हैं, कुमार आशान् से मिलने के लिए महाकवि कुमार आशान् स्मारक और वल्लतोल नारायण मेनन को समझने के लिए केरल कला मंडल के उस कक्ष में पहुंचते हैं, जहां मेनन की निजी वस्तुएं जमा हैं। इस शब्द चित्र को पढ़कर बार बार मन में यह सवाल उठा कि हिन्दी में ये स्थिति क्यों नहीं है या क्यों नहीं हो पाई। केरल से हमें अपने कवियों-लेखकों का सम्मान करना सीखना चाहिए।

अशोक अग्रवाल इन यात्राओं में केवल जीवित व्यक्तियों से ही नहीं कब्रिस्तान में सोये अहम लोगों से भी आपकी मुलाकात कराते हैं। ‘तामाबोचि’ में वह मानवीय उहापोह और संवेगों से परे प्रकृतिमय स्थल पर पहुंचते हैं, जहां छोटे छोटे घरों में निवासी चिरनिद्रा में सोये हुए हैं। ये कब्रिस्तान है। यहां मिशिमा युकिओ लेटे हैं। 1966 में मिशिमा ने एक नाटक लिखा था-योकोकू। इस पर बनने वाली फिल्म के अभिनेता भी मिशिमा ही थे।

तामाबोचि कब्रिस्तान में मिशिमा की बेचैनी और छटपटाहट की प्रतिध्वनियां सुनाई पड़ रही हैं-जापान भौतिक समृद्धि के नशे में डूब रहा है-आध्यामिक रूप से एकदम खाली। सत्ता की भूख राजनीतिज्ञों को एकदम खा गई है। कब्रें और भी हैं। ऐसी कब्रें जो जापान के दूसरे विश्वयुद्ध की तरफ ले जाती हैं, जहां जापान के सम्राट ने भर्राई हुई आवाज में कहा था, यदि हम लड़ते रहे तो समस्त जापानी जाति ही नहीं मानवजाति का विनाश हो जाएगा। अपने करोड़ों नागरिकों की प्राणरक्षा के लिए हमने विपक्षी देशों की मांगें स्वीकार कर ली हैं। यात्रा वृतांत और भी हैं। यह आप पर निर्भर करता है कि आप कहां की यात्रा करना चाहते हैं और कहां का समाज देखना चाहते हैं।

‘किसी वक्त किसी जगह’ में आपको यात्रा वृतांत ही नहीं शब्द चित्र भी मिलेंगे। यह पूरी किताब आपको नये मनुष्य से मिलवाएगी। यानी मनुष्य से मनुष्य की यात्रा है यह पुस्तक, यही इसकी खूबी है।


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