Monday, January 24, 2022
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सवालों के साथ सरदार सरोवर से वापसी

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बड़वानी और धार क्षेत्र के नए बसे हुए गांवों को देखने और लोगों से मिलने पर पता चला कि उनका नर्मदा और अपनी जमीन के लिए लड़ने का जुनून इतने सालों में फीका नहीं पड़ा है। उनके हौसले उनकी उम्र से कई गुना बड़े हैं, जिसकी वजह से आज 32 साल बाद भी वो अपना हक पुनर्वास के रूप में ले पाए हैं। यह पुनर्वास काफी बड़े स्तर पर लोगों को मिला है जिसमें कुछ की जमीन उनकी पसंद के मुताबिक है तो कई लोगों को राज्य के बाहर बसाया जा रहा है। वहीं हजारों लोग अभी भी पुनर्वास के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्हें 15 दिनों का बोलकर तीन साल से ‘10गुणा10’ के टीनशेड में रखा गया है। ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ की यात्रा कुछ ऐसे सफर की तरह शुरू हुई थी जिसमें किसी नए शहर को देखने, वहां की चीजें समझने, जानने और दोस्तों के साथ मस्ती करने की उत्सुकता रहती है, लेकिन यह सफर बाकी और यात्राओं से बहुत अलग था। यहां की हर एक चीज दिल-दिमाग में हजारों सवाल उठा रही थी। ये वो सवाल थे जिनके जवाब दिल को झिंझोडने वाले थे।

हालांकि बड़वानी पहुंचने पर आंदोलन की वरिष्ठ नेत्री मेधा पाटकर ने ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ के बारे में बहुत सी बातें बारीकी से बतार्इं थीं और ‘सरदार सरोवर’ के डूब क्षेत्र में जाने और लोगों से मिलने, उन्हें जानने की सलाह भी दी थी, लेकिन देखने-सुनने और समझने के बाद जो पता चला वह भौंचक कर देने वाला था। शुरुआत में हम राजघाट पहुंचे जो हाईवे के किनारे बसी एक ऐसी जगह है जहां सरकार की बनाई मजबूत सड़क तो है, पर उस सड़क पर मोटरसाइकिल नहीं, नाव चलाई जाती हैं।

सड़क के बीचों-बीच ‘सरदार सरोवर’ बांध का पानी भर चुका है जिसके कारण आने-जाने का साधन सिर्फ़ नाव है। यहां पानी होते हुए भी पेड़ बुरी तरह सूख गए हैं, बने-बनाए घर पूरी तरह टूट चुके हैं, पर बिना बिजली का खंभा आज भी लगा है। नतीजे में पूरा क्षेत्र बिजली की बाट जोहता रहता है। यहां बने नए मकान हमेशा के लिए नए रह गए हैं, क्योंकि उनकी हालत अब रहने लायक नहीं बची है। कुछ समय पहले तक यह इलाका पूरी तरह से जलमग्न था, अभी कुछ पानी हटा है जिससे उजाड़ का यह दृश्य और भी स्पष्ट हो गया है। लोगों ने बताया कि इस घाट पर ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ का मंच बना करता था। समय-समय पर नर्मदा को बचाने के लिए लाखों की संख्या में लोगों ने इसी जगह सत्याग्रह किया था, जिसके बाद कुछ मांगे तो मानी गईं, बाकी काम आश्वासनों से चलता रहा।

राजघाट के बाद हम नर्मदा किनारे के चिखलदा गांव पहुंचे जहां 2019 की बाढ़ के पहले 800 परिवार रहा करते थे। यहां आज सरकारी योजनाओं के शौचालय तो हैं, पर लोग नहीं। वहां के घरों की दीवारें पहले 2017 में और बची हुर्इं 2019 में पानी के बहाव में बह गर्इं, लेकिन घरों के रंग, भगवान की चिपकी हुईं प्रतिमाएं और खूबसूरत दरवाजे आज भी गांव का अस्तित्व संभाले हुए हैं। इसे देखने के बाद गांव की खूबसूरती का एहसाह हो जाता है। चिखलदा को हमेशा भाईचारे और सांस्कृतिक धरोहर के लिए जाना जाएगा। यहां हर धर्म के लोग मिलजुलकर रहते थे और मस्जिद, मजार, जैन मंदिर, शिव मंदिर, गणेश मंदिर और हनुमान मंदिर आस-पास बसे हुए थे। लोगों ने बताया कि गांव का जैन मंदिर 200 साल से भी पुराना है और शिव मंदिर 11वीं शताब्दी की धरोहर है।

इस गांव की एकता को बरकरार रखती हुई बापू की वो मूर्ति है जो गांव के प्रवेश पर सबसे ऊपर रखी हुई है। बांध के जल-भराव में जब बापू के कंधे जलमग्न हो गए थे तब गांव वालों ने लोहे का फ्रेम बनाकर बापू को तो डूब से ऊपर कर दिया, लेकिन उनका पूरा गांव डूब गया। इस गांव की डूब को एक-एक घर जाकर समझा। इनमें गांव के निवासी रहमत का भी घर था जो ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ का हिस्सा हैं। जब रहमत अपना घर दिखाने पहुंचे तो वहां समतल जमीन थी। उन्होंने नम आंखों से बताया कि बसा-बसाया यह गांव 2019 में पूरी तरह तबाह हो गया था। लोगों को मजबूरन अपने दो-मंजिला, खूबसूरत घरों को छोड़कर आबादी से दूर टीनशेड के टापरा-नुमा मकानों में रहना पड़ रहा है। चिखल्दा को देखकर महसूस हो रहा था कि कैसे हमारी प्राचीन सभ्यता को विकास-रूपी त्रासदी ने बर्बाद कर दिया है।

शाम को टीनशेड में बसे परिवारों से मिलने का मौका मिला जहां के लोग रोजमर्रा की सुविधाओं से वंचित हो गए हैं। उनके बसे हुए घर बांध के कारण उजड़ गए हैं। बच्चे स्कूल दूर होने और गांव का स्कूल डूब में ढह जाने की वजह से पढ़ाई छोड़कर मजदूरी करने के लिए मजबूर हैं। एक शेड में रहने वाली दो बहनों की पढ़ाई छूट गई है। बड़ी बहन 9वीं क्लास में पढ़ती थी और छोटी 6वीं में। उन्होंने बताया की दोनों को पढ़ने का बहुत शौक है, लेकिन बड़ी बहन की सगाई दिवाली के बाद है तो वो आगे पढ़ नहीं पाएगी। दूसरी का कहना था कि अगर स्कूल पास में बन जाएगा तो वह पढ़-लिखकर डॉक्टर बनेगी। पास में साइकिल चलाते हुए लड़कों का कहना था कि सरकार और प्रशासन उन्हें यहां ‘डालकर भूल गया है।’ हमारे लिए न ही साफ पानी का इंतजाम किया गया है और न ही लाइट का। यहां एक शेड छोड़ दूसरे में बिजली होती है और ‘स्कूल-अस्पताल हम तक पहुंचा पाना इनके बस की बात नहीं है।’

बड़वानी और धार क्षेत्र के नए बसे हुए गांवों को देखने और लोगों से मिलने पर पता चला कि उनका नर्मदा और अपनी जमीन के लिए लड़ने का जुनून इतने सालों में फीका नहीं पड़ा है। उनके हौसले उनकी उम्र से कई गुना बड़े हैं, जिसकी वजह से आज 32 साल बाद भी वो अपना हक पुनर्वास के रूप में ले पाए हैं। यह पुनर्वास काफी बड़े स्तर पर लोगों को मिला है जिसमें कुछ की जमीन उनकी पसंद के मुताबिक है तो कई लोगों को राज्य के बाहर बसाया जा रहा है। वहीं हजारों लोग अभी भी पुनर्वास के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्हें 15 दिनों का बोलकर तीन साल से ‘10गुणा10’ के टीनशेड में रखा गया है।

इन सब हालात के बीच एक ऐसी जगह भी है जो अंधेरे में रोशनी का काम कर रही है। ये महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की सीमा के टापू पर बसी ‘जीवनशाला’ है। यहां 80 से ज्यादा बच्चे पढ़ते हैं। कुछ अपने घरों से आठ से 10 किमी पैदल चलकर आते हैं तो कुछ यहीं रहते हैं।

‘जीवनशाला’ केवल मध्यप्रदेश में ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र के डूब प्रभावित क्षेत्रों में भी बनाई गई है। यहां से पढ़-लिखकर निकलने वाले लोग आगे आने वाली पीढ़ी को पढ़ाते हैं। कुछ तो इंदौर, भोपाल जैसे बड़े शहरों में पढ़ाई और नौकरी भी कर रहे हैं। ये जगह गांव के बच्चों को इन हालातों में रहकर जीवन की एक नई दिशा देने का काम कर रही है।
‘जीवनशाला’ में बच्चों के लिए खाना बनाने वाली सुनीता, जो ‘जीवनशाला’ के गुरुजी की पत्नी हैं, बताती हैं कि वे यहां शादी के बाद चार साल से खाना बना रही हैं। सुनीता को पहले तो अकेली महिला होने के नाते यहां रहना पसंद नहीं था, लेकिन अब उनका परिवार इन्हीं बच्चों से बन गया है।

सुनीता को अब यहां अच्छा लगने लगा है, पर आज भी क्षेत्र में बाढ़ आ जाने या बांध का पानी बढ़ जाने के कारण परेशान हो जाती हैं। पानी के कारण दूसरे क्षेत्र में आने-जाने के रास्ते बंद हो जाते हैं और उन्हें महीनों तक कम राशन में काम चलाकर गुजारा करना पड़ता है। पास में अस्पताल और पहाड़ी क्षेत्र में सड़क नहीं होने की वजह से वे स्वास्थ्य के अधिकार से भी वंचित है जिसका खामियाजा सुनीता को अपने सात साल के बच्चे की जान से चुकाना पड़ा था। सुनीता के बच्चे को सही समय पर सही इलाज नहीं मिला था जिससे उसकी जान चली गई, तब से सुनीता सरकार की योजनाओं पर भरोसा नहीं करती हैं।

‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ की सबसे खूबसूरत बात ये है कि इस आंदोलन में क्षेत्र की महिलाओं का योगदान मर्दों के बराबर है। यहां की बच्चियां और महिलाएं अपने हक के लिए आवाज उठाती हैं, अपने अस्तित्व के लिए लड़ती हैं और सबसे अहम बात कि ये महिलाएं सरकार और समाज से सवाल करना जानती है।

मेरे लिए ये यात्रा बस में बैठने से जरूर शुरू हुई थी, पर बस से उतरने पर खत्म हो गई यह मैं नहीं कह सकती क्योंकि वहां मेरी उत्सुकता तो शांत हुई, पर कई सवालों का अंबार मेरे साथ आया है जिसके जवाब मुझे समाज के साथ-साथ अपने आप से भी जानने की जरूरत है। मेरी तरफ से यह यात्रा उस दिन पूरी होगी जब मैं अपनी पहुंच तक वहां के लोगों का संघर्ष, परेशानियां और मेहनत की जीत की जानकारी नहीं दे देती। इन सभी आंदोलनकारियों ने इतिहास में अपना मकां तय किया है जो युवा पीढ़ी के लिए बहुत बड़ा सबब बन सकता है जिसे युवाओं को आगे बढ़कर समाज तक पहुंचाना होगा।


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