Saturday, October 23, 2021
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Homeसंवादसप्तरंगकलाओं का जन्म आनन्द की प्यास से होता है

कलाओं का जन्म आनन्द की प्यास से होता है

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हृदयनारायण दीक्षित

विश्व मानवता का सतत विकास हुआ है। मनुष्य ने सुख स्वस्ति और आनन्द के लिए लगातार प्रयत्न किये हैं। प्रकृति और मनुष्य के बीच अंगांगी सम्बन्ध हैं, लेकिन तमाम अन्तर्विरोध भी हैं। प्रकृति सत्य है, हम मनुष्य प्रकृति सत्य के मध्य जीवनयापन करते हैं। लेकिन मनुष्य ने शिव और सुन्दर की भी अभिलाषा की है। विषम परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने का काम किया है। उसने संस्कृति गढ़ी। कलाएं संस्कृति का अंग है। सभी कलायें मनुष्य की सौन्दर्य चेतना का विकास है। मनुष्य को प्रकृति के रूप में सुन्दर लगते हैं। कुछ रूप ज्यादा सुन्दर लगते हैं, कुछ रूप कम। लेकिन सौन्दर्य सबको आकर्षित करता है। कलाओं का जन्म सौन्दर्य की बीज चेतना से हुआ है। मनुष्य लगातार जिज्ञासा करता रहा है।

सत्य सहज है। सरल है। प्रत्यक्ष है। अनुभूत है। विराट जगत में एक ही सत्य भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट होता है। सत्य हमेशा सुखदायी ही नहीं होता। सत्य कभी दुखी करता है तो कभी सुखी। सत्य शिव और सुन्दर भी होता है। जान पड़ता है कि पहले कभी प्रत्यक्ष सत्य को सुन्दर बनाने की भी आवश्यकता अनुभव की गयी होगी और इसी में से अनेक कलाओं का जन्म हुआ। वैसे मनुष्य के सामान्य जीवन में भी कला का विकास होता रहता है। आदिम मनुष्य ने कभी पत्थर की खोहों से निकल कर घास-फूस के घर बनाये। उसने इन्हें सुन्दर बनाने के लिए भिन्न-भिन्न तरीके अपनाये। छोटे-छोटे घरेलू उत्सवों में घर को फूलों से सजाना कला चेतना का ही विस्तार है। घर की बैठकी या ड्राइंगरूम में रंग-बिरंगे कपड़े या अन्य वस्तुओं को सजाना भी मनुष्य की कला अभिलाषा का परिणाम है। विवाह के समय दूल्हे की कार या कन्या को सजाना भी कला चेतना का अंग है। कला की चेतना आदिमकाल से लेकर आधुनिककाल तक प्रवाहमान है।

हम सबके मस्तिष्क में शब्द हैं। शब्दों के अर्थ हैं। अर्थ के अनुसार शब्दों को स्थापित करने और उनमें अन्तर्निहित लोकमंगल के भाव को व्यक्त करने की कला ही साहित्य है। कला संस्कृति का महत्वपूर्ण भाग है। विद्वानों का एक वर्ग भारत में सौन्दर्यबोध की शास्त्रीय परम्परा नहीं देखता। ऐसे लोग ऋग्वेद के कवियों ने सौन्दर्यबोध नहीं देखते वह वाल्मिीकि, कम्बन, रवीन्द्रनाथ टैगोर, तुलसीदास और निराला के साहित्य से सौन्दर्यबोध की सघन उपस्थिति नहीं देखते। यह प्रकृति सृष्टि भी अति सुन्दर कला है। मनमोहिनी है। इस कला के रचनाकार के सम्बन्ध में अनेक विचार हैं। प्रकृति की रचना करने वाले कलाकार की जिज्ञासा स्वाभाविक है। कुछ लोगों के मतानुसार प्रकृति ने ही प्रकृति को बनाया है। प्रकृति स्वयंभू है। सदा से है। प्रकृति सर्वांग सुन्दरी है। भारतीय चिन्तन में प्रकृति सृष्टि के रचनाकार ब्रह्मा, विश्वकर्मा या ईश्वर माने गये हैं। उपनिषदों में यह बात भी बड़े कलात्मक ढंग से कही गयी है। कहा गया है कि परमात्मा एकाकी था। एकाकी होने के कारण उसे आनन्द नहीं आया। सो उसने लोक बनाये, परलोक बनाये, धरती गढ़ी। प्राणी बनाये सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र बनाये। ऋग्वेद में विश्वकर्मा भी जगत बनाने वाले देवता कहे जाते हैं।

प्रकृति अति सुन्दर जटिल और विशिष्ट कलाकृति है। समझ में नहीं आता कि किसने करोड़ों वर्ष तक प्रकाश देने वाले सूर्य को रचा। इसके भीतर अनंत काल तक ताप देने वाला ईंधन किसने रखा? किसने आकाश बनाये, किसने नक्षत्रों की तारावली या आकाश गंगा बनाई? किसने दिन-रात बनाये? किसने भिन्न-भिन्न प्रकार के जीव बनाये? किसने वनस्पतियॉं बनायी। किसने अंतरिक्ष में चन्द्रमा को स्थापित किया और मंगल, बुद्ध, बृहस्पति, शुक्र, शनि को। प्रश्न उठता है कि क्या एक ही देव या कलाकार ने प्रकृति जैसी सुन्दर कलाकृति को गढ़ा है या कई कलाकारों देवों ने सृष्टि का सृजन किया है। यह सृजन अद्वतीय है। एक बार बन जाने या बना देने के बाद यह अपने आप अपने भीतर से नयी सृष्टि गढ़ती जाती है। पुराना अपने आप विदा होता है। नया अपने आप उगता जाता है। यह कला विस्मय पैदा करती है। तुलसीदास ने विनय पत्रिका में लिखा है ‘केशव कहि न जाय का कहिये/ देखत यह रचना विचित्र अति समुझि मनहि मन रहिये।’

प्रकृति को सुन्दरतम कलाकृति बनाने का मानवीय प्रयास सहस्त्रों वर्षों से जारी है। कला मनुष्य को सुख से भरती है। अच्छा साहित्यकार या कलाकार दुख के चित्रण में भी सुख सृजित करता है। कला और साहित्य से जुड़े सजग रचनाधर्मी उदात्तभाव का सृजन करते हैं। कलायें मनुष्य को संवेदनशील बनाती हैं। कलाओं के प्रभाव में संस्कृति के उदात्त तत्व मजबूत होते हैं।

मनुष्य काव्य और कलाओं के माध्यम से अपने वातावरण को सुखमय व आनन्दपूर्ण बनाना चाहता है। कलाओं के लिए भी माध्यमों का उपयोग होता है। सामाजिक विकास के क्रम में धीरे-धीरे नये माध्यम जुड़ते गये। साहित्य के लिए पहला माध्यम भाषा है। भाषायें लगातार विकासशील रही हैं। बिना किसी माध्यम के स्वंय को माध्यम बनाकर बोलना या गीत गाना धीरे-धीरे विकसित हुआ है। नृत्य कला भी बिना माध्यम के संभव है। स्वयं नाचने के लिए अपनी ही इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। दूसरा माध्यम जरूरी नहीं होता। घर जरूरी रहा है वह कच्चे मिट्टी की दीवारों पर भी चित्र बनाता रहा है। मनुष्य अपनी संवेदनशीलता और जानने की इच्छा से तमाम अनुभव एकत्रित करते हैं। वे कलाओं में इस अनुभव और ज्ञान को व्यक्त करते हैं। यह ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानान्तरित होता रहता है।

कलाओं का जन्म आनन्द की प्यास से होता है। आनन्द आपूरित व्यक्ति सृजन किये बिना नहीं रह सकता। आनन्द से जन्मी कला समाज को भीतर व बाहर से आनन्द आच्छादित करती है। यह मनुष्य की सृजनशीलता का परिणाम है। भारत के मन्दिर और उनके स्थापत्य दर्शनीय हैं। ये मनुष्य की सृजनशीलता के स्मारक हैं। इसी तरह गीत और संगीत की कलायें भी आनन्द बढ़ाती है। भिन्न-भिन्न कलाओं के माध्यम से समाज में संवेदनशीलता बढ़ती है। आनन्द बढ़ता है और कोई भी आनन्दित व्यक्ति विध्वंस नहीं कर सकता है। आनन्द से भरा पूरा व्यक्ति सृजनशील ही होता है।

 


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