Home संवाद रविवाणी कत्ल की रात उर्फ टोबा टेकसिंह!

कत्ल की रात उर्फ टोबा टेकसिंह!

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कत्ल की रात उर्फ टोबा टेकसिंह!


रमेश बत्तरा का नाम जेहन में आते ही साहित्य का पूरा परिदृश्य रिवाइंड होकर आठवें दशक पर ठहर जाता है। रमेश बत्तरा की मृत्यु को 22 साल हो चुके हैं। बेशक उनकी कहानियां भी अब दिलो दिमाग से उतरने लगी थीं। लेकिन पत्रकार-कथाकार हरीश पाठक ने उनकी कहानियों का संचयन व संपादन किया। नतीजतन पाठकों के हाथों में ‘कत्ल की रात’ (प्रलेक प्रकाशन) आ पाई। इस संग्रह में उनकी 24 कहानियां हैं। वरिष्ठ कथाकार महेश दर्पण ने इस पुस्तक की भूमिका लिखी है, जो कथाकार रमेश बत्तरा की एक मुकम्मल तस्वीर पाठकों के सामने रखती है। बकौल दर्पण, ‘आठवें दशक के जेनुइन कथाकारों में रमेश बत्तरा पहली पांत के रचनाकार थे।’
पीछे मुड़कर देखें तो यह वह दौर था, जब आजादी के बाद सपनों के दरकने की आवाज हर व्यक्ति महसूस कर रहा था। लेखन में भी इस आवाज को सुना जा सकता था। बेरोजगारी, काम न मिलने के चलते पिता से मुठभेड़, बहनों की शादी, आर्थिक अभावों का आपसी रिश्तों पर प्रभाव, दहेज हत्या और इसी तरह के पारिवारिक-सामाजिक विषय कहानी के विषय थे।

रमेश बत्तरा भी इन विषयों से इतर नहीं लिख रहे थे। फिर भी उनकी कहानियों में कुछ ऐसा था जो उन्हें अलग बना रहा था। और वह था, उनका सवाल पूछना। यथार्थ को उस रूप में न देखना जिस रूप में वह दिखाई देता है, बल्कि उससे परे जाकर यथार्थ को देखना। अपनी कहानियों में वह सरकार से, व्यवस्था से, परिवार से, पिता से सब से सवाल पूछ रहे थे। वे इन सवालों के जवाब चाहते थे। वह आंख और कान बंद करके काम करने के हिमायती नहीं थे। और जवाब न मिलने ने उनके भीतर कितनी कड़वाहट भर दी थी, ये उनकी कहानियों के नैरेटिव से पता चलता है। गौर फरमाइये:

‘जिस आदमी को भी हाथ लगाता हूं, फोड़ा निकलता है।’ (सिरहाने के सांप)
‘जहां जिंदगी मोहक न हो, वह जगह कभी मोहक नहीं होती, बेहूदी होती है, बल्कि यह बेहूदगी होती है पूरे अवाम के साथ।’ (कत्ल की रात)

‘मां बाप के पास पैसा न हो तो वे भी मां बाप की तरह नहीं सोच पाते।’ (कत्ल की रात)
‘और यह मुझे बहुत कष्टप्रद प्रतीत होता है कि महज इसी वजह से वस्त्र पहने जाते रहें, दूसरों को खुश करने के लिए, जबरदस्ती।’ (नंग मनंग)

‘बेटी को वस्तु की तरह दान करना कब बंद होगा?’ (दूसरी मौत)

सवाल और भी बहुत हैं। रमेश बत्तरा अपनी कहानियों में नंगे सवाल पूछते हैं। ‘सिरहाने के सांप’ कहानी की शुरुआत एक नए बने चौराहे से होती है। यह चौराहा नायक को बचपन से पिलाई जा रही आदर्शों की घुट्टी की तरफ ले जाता है। वे आदर्श जो नायक के लिए अब त्रासदी बन चुके हैं। रमेश बत्तरा पूरी कहानी में उन लोगों के खिलाफ लड़ते दिखाई पड़ते हैं जो उसे अब सिखाए गए आदर्शों के खिलाफ चलने का सबक पढ़ा रहे हैं। लेकिन अब उन आदर्शों के खिलाफ चलना नायक को रास नहीं आ रहा। चाहे पिता हों या पत्नी कहानी का नायक सबके विरुद्ध खड़ा दिखाई देता है।

‘नंग मनंग’ कहानी में नायक पति पत्नी से खुली रोशनी में निर्वस्त्र हो जाने का आग्रह करता है। पूरी कहानी में नायक सवाल उठाता है कि व्यक्ति को नंगा क्यों नहीं रहना चाहिए। वह मां से पूछता है, हम छिप छिपकर क्यों नहाते हैं। दरअसल नायक उस पाखंड का विरोधी है जिसे इंसान हर वक्त ओढ़े रहता है। कहानी के अंत में यह सच सामने आता है कि नग्नता ऐसा माध्यम है जिसका आनन्द के क्षणों में कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। पति पत्नी के संबंधों के सच से रमेश बत्तरा इस तरह पर्दा उठाते हैं। पत्नी पति से यह कहती है, वह बलात्कार नहीं, सहवास चाहती है। इस तरह का बेलौसपन अन्य कहानियों में कम ही मिलेगा।

‘शर्म-बेशर्म’ में दिखाया गया है कि कैसे सामाजिक कठोरता युवा स्वप्नों को जलाकर राख कर रही है तो ‘अधिनायक’ में वह मां को अधिनायक दिखाता है, ‘जिंदा होने के खिलाफ’ फिर बेरोजगारी पर लिखी कहानी है। ‘जरा संभलकर’ में रमेश बत्तरा आॅफिस की दुनिया को चित्रित करते हैं। अंत में वह फिर से सवाल उठाते हैं, जरा सोचिए, कोई दिमागहीन समाज कैसा होगा भला?

क्या नौकरी ही इंसान के लिए सब कुछ है? ‘रेल चली’, ‘मौत की छलांग,’ ‘देश का भविष्य’, ‘पीढ़ियों का खून’ ‘वतन की जुबां’ ‘कुएं की सफाई’ ‘शहर की शराफत’ ‘दूसरी मौत’ ‘जंगली जुगराफिया’ रमेश बत्तरा के मिजाज की कहानियां हैं। ‘गवाह गैरहाजिर’ एक चोर की कहानी है, जो रात के वक्त जय काली माई तेरा आसरा कहकर निकलता है और अपना काम करके लौट आता है। कहानी रमेश बत्तरा यह भी बताते हैं कि यह चोर कभी मेहनतकश इंसान था और किस तरह हालात के चलते उसे चोरी करनी पड़ी। दरअसल रमेश बत्तरा यह कहना चाहते हैं कि चोर यूं पैदा नहीं हो जाते। वे बनाए जाते हैं।

संग्रह की सबसे अहम कहानी शीर्षक कहानी ‘कत्ल की रात है’। इस कहानी को पढ़ते समय अनायास ही मंटो की कहानी टोबा टेकसिंह आपके जेहन में आ जाएगी। आपको लगेगा कि विभाजन के बाद पागलों के इस मुल्क से उस मुल्क और उस मुल्क से इस मुल्क भेजे जाने से ही टोबा टेक सिंह पैदा नहीं होते। आज के समय में भी टोबा टेकसिंह है। या कम से कम आठवें दशक तक थे। ‘कत्ल की रात’ का नायक मौजूदा हालात पर इतनी गंभीरता से सोचता है कि लोग उसे पागल समझने लगते है।

(क्या गंभीरता से सोचना इस समाज में अपराध है?) कहानी के नैरेटर के पिता पत्र में लिखते है: आजकल यहां चुनाव का दौर है। अब सतनाम न तीन में है न तेरह में। पर लगता है कि चुनाव उसे पूरा पागल करके छोड़ेगा। क्या कीजिएगा वोट देकर, आप कहें तो चुनाव वाले दिन हम लोग चिड़ियाघर देखने चलें। सतनाम की दो बड़ी बहनें हैं। बड़ी ब्याहता हैं और छोटी सतनाम के साथ रहती है। पिता ने उसे दसवीं पास करवाई थी लेकिन सतनाम उसे आगे पढ़ा रहा है। सतनाम व्यवस्था से बेतरह असंतुष्ट है। कहने को तो वह एशिया के सबसे सुंदर शहर में रह रहा है, जिंदगी तो उसकी किसी सड़ियल शहर सी ही है।

सतनाम चारों तरफ से भ्रष्ट लोगों से घिरा किरदार है। वोट उसके दिमाग में हैंग कर गये हैं। वह हर समय वोट के बारे में ही सोच रहा है। राजनीतिक कहानी इतनी सहज हो सकती है, यह रमेश बत्तरा से सीखा जा सकता है। आर्थिक अभावों के चलते सतनाम की पत्नी भी उसे छोड़कर चली जाती है। सतनाम लगातार माहौल पर नजर रखे हुए है। वह कहता है, यह कत्ल की रात है, कुछ पता नहीं सुबह तक पासा किधर पलट जाए। हरिजन बस्ती पर पूरी रात निगरानी रखो। दूसरा आकर उन्हें एक रुपया दे तो तुम दो पकड़ा दो।

वोट से पहले जिस कत्ल की रात का रमेश बत्तरा कहानी में इशारा कर रहे हैं, वह दरअसल मतदाताओं की खरीद फरोख्त है। पूरी कहानी में सतनाम के लिए पागल होने लायक सब कुछ मौजूद है। पत्नी का घर से भागना, कमाई ना होना, नेताओं की वोटों की खरीद फरोख्त। हालांकि रमेश बत्तरा पूरी कहानी में सूत्र कहीं नहीं छोड़ते, पाठक लगातार कहानी से जुड़ा रहता है और यह महसूस करता रहता है कि कि सतनाम पागलपन की ओर बढ़ रहा। सतनाम में पाठकों को टोबा टेकसिंह साफ साफ दिखाई देगा, यह इस कहानी की ताकत है।


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