Thursday, April 30, 2026
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तड़पते रहिए कतारों में, डाक्टर गैरहाजिर

  • सोशल डिस्टेंसिंग तार-तार, मास्क को लेकर भी गंभीर नहीं मरीज और तीमारदार

  • मरीजों की लंबी-लंबी कतारें, फिर भी ओपीडी में डाक्टर उपलब्ध नहीं

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: कोरोना की बेलगाम सेकेंड वेव और जिला अस्पताल में सिस्टम की लारवाही से हालात डरावने ही नहीं विस्फोटक भी नजर आते हैं। संक्रमण रोकने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग को यहां उमड़ी मरीजों और तीमारदारों की भीड़ ने पैरों तले कुचल दिया है।

हालात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां उमड़ रही भीड़ कोरोना विस्फोट करा सकती है। कुल मिलाकर हालात चिराग तले अंधेरा सरीखे हैं। ढ़िढोरा पीट-पीटकर सोशल डिस्टेंसिंग व मास्क की बात करने वाला स्वास्थ्य विभाग जिला अस्पताल में कोरोना गाइड लाइन को लेकर पूरी तरह से लापरवाह बना है।

कोरोना रिटर्न के चलते लगातार केसों की संख्या बढ़ती जा रही है, इसके इतर जिला अस्पताल की यदि ओपीडी की बात की जाए तो वहां सस्ते इलाज के नाम पर जमा होने वाली भीड़ के चलते संक्रमण के फैलने का खतरा बना हुआ है। ओपीडी के बाहर मरीजों की लंबी-लंबी कतारें संक्रमण को न्योता देती नजर आती हैं। हालात का अंदाजा यहां इसी बात से लगाया जा सकता है कि मरीजों में मारामारी सरीखे हालात हैं।

संक्रमण के खतरे के बीच जान जोखिम में डालकर मरीज जिला अस्पताल तक पहुंच रहे हैं, लेकिन संक्रमण से खतरा मोल लेने के बाद भी मरीजों के लिए इस बात की कोई गारंटी नहीं कि ओपीडी में जिस डाक्टर की ड्यूटी लगी है वो अपने केबिन में बैठेंगे। या फिर मरीजों को अटैंड करेंगे ही।

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जिला अस्पताल की ओपीडी में कई डाक्टर ऐसे भी हैं जो बजाय ईमानदारी से ड्यूटी को अंजाम देने के बजाय अक्सर गायब ही रहते हैं। इस बात की तस्दीक दैनिक जनवाणी के छायाकार के कैमरे में बुधवार की सुबह कैद हुए फोटो को देखकर की जा सकती है।

वहीं, इस संबंध में जिला अस्पताल की सुप्रीटेंडेन्ट डा. मीनाक्षी विज ने बताया कि 24 घंटे एनाउंस कराया जा रहा है। लोगों को बताया जा रहा है कि सोशल डिस्टेंसिंग व मास्क का पालन करें। जरा-सी लारवाही घातक साबित हो सकती है।

पर्चा बनवाना भी नहीं आसान                                                        

बीमारियों के चलते इन दिनों उमड़ रही भारी भीड़ की वजह से मरीजों व तीमारदारों के लिए पर्चा बनवाना भी किसी जंग जीतने से कम नहीं। कोविड गाइड लाइन की धज्जियां उड़ने की शुरूआत जिला अस्पताल में ओपीडी के पर्चा काउंटर से ही होती है। स्वास्थ्य मंत्रालय बार-बार सोशल डिस्टेंसिंग पर जोर देता है, लेकिन जिला अस्पताल प्रशासन इसको लेकर कितना गंभीर है, इसका अंदजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारी भीड़ के बाद भी ओपीडी के पर्चो काउंटर पर नए काउंटर नहीं खोले जा रहे हैं। यदि नए काउंटर खोल दिए जाएं तो शायद सोशल डिस्टेंसिंग कायम की जा सकेगी।

दवा के लिए जंग                                                                        

ओपीडी में डाक्टर जो दवाएं सरकारी अस्पताल की ओर से लेने के लिए लिखते हैं। उनको पाने के लिए भी मरीजों व तीमारदारों को दवा काउंटर पर भी जंग लड़नी पड़ती है। दवाओं के लिए मारामारी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई बार तो नौबत मारपीट व गाली-गलौज तक पर आ जाती है। कई बार ऐसा भी हुआ है कि धक्का-मुक्की में दवाओं की शीशी नीचे गिरकर टूट गयी हैं।

न कोई रोके, न कोई टोके                                                             

सोशल डिस्टेंसिंग को लेकर जारी गाइड लाइन तार-तार होने के बाद भी जिला अस्पताल में ऐसा कोई नजर नहीं आता जो भीड़ को टोकता या रोकता हो। ऐसा नहीं कि ओपीडी से होकर जिला अस्पताल के चिकित्सा अधिकारी नहीं गुजरते हैं। या डाक्टरों व दूसरे स्टाफ की नजर इन तक नहीं पहुंचती है, लेकिन इसके बाद भी न कोई रोकने वाला है न ही कोई टोकने वाला है।

हालात का अंदाजा इसी बबात से लगाया जा सकता है कि यह भी अंतर नहीं हो पा रहा है कि इस भीड़ में कौन कोरोना कॅरियर हो सकता है। साथ ही सबसे बड़ी आशंका कोरोना की चेन के बनने को लेकर जतायी जा रही है। खुद जिला अस्पताल का स्टाफ भी इस खतरे से अंजान नहीं। नाम न छापे जाने की शर्त पर उनका कहना है कि यदि हालात नहीं संभले तो चेन बन जाएगी।

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