Tuesday, June 9, 2026
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बॉलीवुड में झंडा बुलंद करने वाले बागपत के लाल सत्येंद्र

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केपी मलिक

सत्येंद्र पाल चौधरी ने अपने संघर्ष से फिल्मी दुनिया में जो करिश्मा कर दिखाया, उससे आज की युवा पीढ़ी, खास तौर पर गांव के बच्चों और उनमें भी उन बच्चों को सीखने की जरूरत है, जिनके अंदर किसी न किसी कला में बेहतर करने का हुनर है। सत्येंद्र पाल चौधरी बागपत जिले के बड़ौत कस्बे के बसी गांव में जन्मे और उस जमाने में मेरठ कालेज में बीए की पढ़ाई के दौरान लंबे समय तक रैगिंग करने वाले एक सीनियर छात्र की पिटाई करने पर विवाद होने पर डर से वह मुंबई भाग गए।

दुनिया में जितनी भी बड़ी हस्तियां हुई हैं, उनका अगर हम देखें, तो पता चलेगा कि उनमें से ज्यादातर बडी हस्तियां गांवों से निकली हैं। ऐसे लोगों की सोच पर अफसोस होता है, जो ये सोचते हैं कि शहरों के लोग सभ्य और पढ़े-लिखे होते हैं और गांवों के अनपढ़ और गंवार होते हैं। ज्यादातर शहरी लोगों का जीवन दर्शन भी बहुत छोटा ही होता है। वहीं गांव के लोग भले ही कपड़ों और भाषा से उतने सभ्य न लगते हों, लेकिन उनका जीवन दर्शन गहरा होता है और वो प्रयोग करने, संस्कृति और मानव सभ्यता को सींचने वाले होते हैं।

हिंदुस्तान की असली संस्कृति, तीज-त्योहार और असली विद्वान, लेखक, बुद्धिजीवी, गणितज्ञ, वैज्ञानिक और असली हीरो गांवों से ही निकलते हैं। इसी को लेकर कहावत बनी है- गुदड़ी के लाल। ऐसे ही एक प्रकांड विद्वान, बड़े फिल्म निर्माता, निर्देशक और सिनेमा जगत को ब्लाक बस्टर फिल्में देने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश की शान और बागपत के लाल, सत्येंद्र पाल चौधरी भी हुए हैं। सत्येन्द्र पाल चौधरी ने एक निर्माता के रूप में शराबी, हेरा-फेरी, नमक हलाल जैसी टाइमलेस बॉलीवुड ब्लॉकबस्टर फिल्में  बनाई, जिनमें अमिताभ बच्चन मुख्य भूमिका में थे और प्रकाश मेहरा निर्देशक थे। सुप्रसिद्ध फिल्म निर्देशक प्रकाश मेहरा उसके साथी थे इन 30 सालो के दोस्ती के सफर में 70 और 80 के दशकों में उन्होंने भारत में गुस्से वाले नौजवान (एंग्री यंग मैन) की अवधारणा को समाज के सामने प्रस्तुत किया।

सत्येंद्र पाल चौधरी ने अपने संघर्ष से फिल्मी दुनिया में जो करिश्मा कर दिखाया, उससे आज की युवा पीढ़ी, खास तौर पर गांव के बच्चों और उनमें भी उन बच्चों को सीखने की जरूरत है, जिनके अंदर किसी न किसी कला में बेहतर करने का हुनर है। सत्येंद्र पाल चौधरी बागपत जिले के बड़ौत कस्बे के बसी गांव में जन्मे और उस जमाने में मेरठ कालेज में बीए की पढ़ाई के दौरान लंबे समय तक रैगिंग करने वाले एक सीनियर छात्र की पिटाई करने पर विवाद होने पर डर से वह मुंबई भाग गए। हालांकि किशोरावस्था और नासमझी में उठाए उनके इस एक कदम से उनके परिवार को तकरीबन 4 साल का समय उनके खो जाने के दुख में गुजारना पड़ा, जिससे एक खाता-पीता संपन्न परिवार, खासतौर पर उनके मां-बाप को बहुत दुख हुआ और वो इनते साल तक रोते-बिलखते रहे। हालांकि बाद में उन्हें सत्येंद्र पाल का पता चला और उनके पिता उन्हें वापस लाने के लिए मुंबई भी गए, लेकिन तब तक वह फिल्मी दुनिया की राह पकड़ चुके थे और उसमें एक बड़ा मुकाम हासिल करना चाहते थे।

उस समय ये उनके स्ट्रगल के दिन थे और उनकी मेहनत, लगन और फिल्मों की कुछ कर गुजरने की जिद के आगे उनके पिता चौधरी वीरनारायण सिंह भी हार गए और घर लौट आए। मुंबई में सेट पर काम करने वाले तमाम लोगों का भुगतान समय पर करने और अपनी ईमानदारी के लिए जाने जाते थे। बताते हैं कि एक बार जब सनी देओल अपनी फिल्म के लिए एक फाइनेंसर से सस्ती ब्याज दरों पर फाइनेंस कराने गए तो फाइनेंसर ने कहा क्या आपको लगता है कि आप सत्येंद्र पाल चौधरी हैं? क्योंकि न्यूनतम ब्याज दरें केवल उस व्यक्ति को मिलती थीं, जिनका रिकॉर्ड साफ सुथरा हो, जो आज के भारतीय के फिल्मी व्यापार क्षेत्र में तो दुर्लभ है।

पश्चिमी यूपी के ही जिले बिजनौर के प्रकाश मेहरा के साथ इनकी जोड़ी बनी और इस जोड़ी ने एक से एक सुपरहिट फिल्में, फिल्मी दुनिया को दीं, जिनमें नमक हलाल, हेरा-फेरी, जुल्मी, शराबी, एक हसीना दो दीवाने जैसी जबरदस्त सुपरहिट फिल्में हैं। प्रकाश मेहरा और सत्येंद्र पाल चौधरी के बीच इतनी मजबूत दोस्ती थी कि एक बार अमिताभ बच्चन ने प्रकाश मेहरा से सत्येंद्र पाल के व्यवहार और उसके छोटे भाई अजिताभ के साथ झगड़े की शिकायत की और प्रकाश मेहरा को धमकाया कि वह फिल्म ‘नमक हलाल’ में काम नहीं करेगा, जिस पर प्रकाश मेहरा ने कहा, अगर तुम काम नहीं करते, तो मैं किसी और हीरो को ले लूंगा, लेकिन सत्येंद्र चौधरी जैसा दोस्त कहां से लाऊंगा? बाद में ‘नमक हलाल’ समय पर बनी और यह एक सुपर हिट और धमाकेदार साबित हुई। सत्येंद्र पाल चौधरी ने पूरा जीवन सादगी से बिताया और कभी भी अपने इलाके के लोगों से दूरी नहीं बनाई। वो भले ही जीवन भर मुंबई रहे, लेकिन जब भी घर आते थे, तो हर व्यक्ति से एक अजीज दोस्त की तरह मिलते थे।

29 अप्रैल, 2014 को उनका निधन हो गया। उनकी धर्मपत्नी मंजू चौधरी और दो बच्चे हैं। जिसमें से उनका बेटा वरदान चौधरी मेरे संपर्क में रहता है और अपने पिताजी की तरह ही बहुत ही स्वाभिमानी, मिलनसार और मेहनती है। आज के सामाजिक परिपेक्ष में जिस प्रकार से है समाज के नाम को गौरवान्वित करते हुए व्यापार में नाम कमाने का काम कर रहा है। वह उसके पिता के संस्कार ही हैं जो उसे इस रास्ते में हौसला दे रहे हैं। लेकिन मेरे लिए अफसोस की बात ये है कि आज भी मुंबई के फिल्मी जगत में तो चौधरी साहब को सम्मान के साथ याद किया जाता है, परंतु पश्चिमी उत्तर प्रदेश और खासतौर पर बागपत के भी अधिकतर लोग इतने बड़े फिल्म निर्माता के विषय में अनभिज्ञ हैं।


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